लखनऊ। सूबाई सत्ता का ताज कांटों भरा है। और कुर्सी शेर की सवारी की तरह। यूपी की हालत वेन्टीलेटर में रखे सांसे भर रहे मरीज की तरह है। सत्तासीन सरकार की भूमिका डाक्टर की तरह है। राज्य बीमार है। पहली कसौटी एक नहीं कई हैं। जिनमें सबसे प्रमुख है बिजली, प्राथमिक माध्यमिक शिक्षा, बन्द होते उद्योग इन सबको मिलाकर जो आर्थिक मोर्चा बनता है वह इतना कमजोर है कि इलाज करने वाले ही कांप जायेंगे। कानून व्यवस्था दुरूस्त रखने के लिये पुलिस व प्रशासन तभी सफल हो पायेगा जब न्यायिक प्रणाली सही काम कर रही होगी। अब कानून व्यवस्था दुरूस्त रखने के लिये न्यायिक प्रणाली को दुरूस्त रखना टेढ़ी खीर होगा। जिस अंदाज में प्रदेश की जनता ने सत्ता सौंपी है उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की ऐसी चुनौतियां अब सामने खड़ी है जो कि पिछले बसपा कार्यकाल के दौरान से कहीं ज्यादा विकट है।
चन्द चुनौतियां एकदम सामने है जो आग के दरिया की तरह है इन्हें पार करके ही सुशासन की शुरुआत करनी होगी। इन्हीं प्रमुख समस्याओं को लेकर विपक्ष सरकार की नाक में दम करता रहेगा और सरकार के पास इन समस्याओं का फौरीतौर पर कोई समाधान नहीं है। बजट तो बयान मात्र होता है। एक खाका होता है। जिस पर बाद में अमल होता है। फिलहाल तो प्रदेश बिजली बिन तड़प रहा है। यह बिजली रोज ब रोज प्रदेश को अराजकता की ओर धकेलती जा रही है। वह दिन दूर नहीं जब यही हालत रही तो बिजली की वजह से यूपी में दंगे जैसे हालात हो जाएगे। इससे काम नहीं बनने वाला कि मायावती सरकार ने बिजली खरीद में भारी घोटाला किया है। किया तो है क्योंकि बिजली के मद में ही करीब 25000 करोड़ पानी में बहा दिये गये हैं। अखिलेश सरकार अगर नहीं चेती तो इस माह के अंत तक प्रदेश के लोग सड़कों पर होंगे।
बिजली की स्थिति
पिछले पांच वर्षो में सिर्फ मंडल मुख्यालयों में 2 घण्टे और जिलास्तर पर 1 घण्टे 40 मिनट वर्ष 2006 के सापेक्ष बिजली देने में बढ़ोत्तरी हो पायी है। बिजली की यह समस्या आज की नहीं है, वर्ष 1989-90 में बिजली व्यवस्था चौपट होनी शुरू हुयी थी जो आज तक बद्दस्तूर है। जबकि 19 विद्युत परियोजनाएं ऐसी चल रही है जिनमें वर्ष 2014 से पहले बिजली उत्पादन संभव ही नहीं है। अभी बिजली की मांग 11 हजार मेगावाट के ऊपर है और प्रदेश के 95 लाख 75 हजार बिजली कनेक्शन धारकों व 1 करोड़ 25 लाख उपभोक्ताओं को सालाना सिर्फ 346 यूनिट ही बिजली मिल पा रही है, जबकि देश में बिजली उपलब्धता का औसत 717 है। ऑल इंण्डिया पावरर्स इंजीनियर्स फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी शैलेन्द्र दुबे के मुताबिक वोट की राजनीति के चलते बिजली चोरी पर अंकुश नहीं लग पा रहा और न ही लागत वाले रेट में बिजली की कीमत वसूली जा रही है। जबकि राजनीति के केन्द्र बिन्दु में बिजली प्रमुख मुद्दा है। बिजली देने का वादा करके हर पार्टी वोट मांगती है लाख कोशिश कर ले आंकडे़ बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में मांग होगी 17243 और उपलब्धता हो पायेगी 13830। इन परिस्थितियों मे नई सरकार लोगों को सिर्फ बिजली देने का आश्वासन दे सकती है वाकई में मांग के मुताबिक आपूर्ति सम्भव ही नहीं है।
उद्योगों की हालत
उत्तर प्रदेश उद्योगो की कब्रगाह बन गया है केन्द्र सरकार ने 2007-08 व 08-09 में जो सर्वेक्षण कराया उसके मुताबिक सूक्ष्म व मध्यम दर्जे के 75660 उद्योग बंद मिले। उद्योगों के नाम पर जमकर राजनीति होती है। वर्ष 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने भारतीय उद्योग परिसंघ के बाद लखनऊ-कानपुर के बीच औद्यौगिक गलियारा विकसित करने का फैसला किया था। साथ ही लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण के गठन की अधिसूचना भी जारी कर दी थी। छह वर्ष बीत जाने के बाद अभी यह प्राधिकरण खड़ा नहीं हो पाया है। 2004 में प्रदेश की सूचना प्रौद्यौगिकी (आइटी) नीति घोषित करने वाली राज्य सरकार ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा के अलावा लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद और आगरा को आईटी सिटी के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया था। आइटी नीति घोषित होने के सात साल बाद भी प्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी की कारोबारी गतिविधियां नोएडा और ग्रेटर नोएडा तक ही सीमित है। बाकी चार शहरों को आईटी सिटी के तौर पर विकसित करने का दावा छलावा साबित हुआ। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के प्रमुख परामर्शदाता जयंत कृष्ण कहते है “अन्य राज्यों में कंपनियां दूसरे दर्जो के शहरों की ओर रूख कर रही है। दुर्भाग्य से यूपी में नोएडा-ग्रेटर नोएडा के बाहर ऐसा कुछ हुआ नहीं। असली चीज है निवेश। यदि आईटी कंपनियां यूपी में नोएडा-ग्रेटर नोएडा के बाहर निवेश करने से हिचक रही है तो इसकी मुख्य वजह शासन के तौर-तरीकों पर उनका भरोसा न होना है। ” यही नहीं बैंको में जमा प्रदेशवासियों की बचत का बहुत बड़े हिस्से से दूसरे राज्य मजा कर रहे हैं। और ऋण जमा अनुपात भी डगमगाया हुआ है। यह चुनौती कही से भी कमजोर नहीं है।
लेखक पीयूष त्रिपाठी लखनऊ में साप्ताहिक पत्रिका इतवार के ब्यूरोचीफ हैं.


