कानपुर : सरकार द्वारा पेश दो लाख एक सौ दस करोड़ के बजट में होमगार्ड्स को पुलिस के बराबर वेतन देने के लिए 1997 में देश भर के कमान्डेंट जनरलों व प्रमुख सचिवों द्वारा पारित प्रस्ताव को लागू कराने के लिए श्री विजय सिंह द्वारा माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद में योजित रिट – ए न० .: 68717 / 2011 में माननीय न्यायमूर्ति वी० के० शुक्ला ने 30/11/2011 को आदेश पारित कर आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त होने के चार माह के अन्दर 1997 से लंबित प्रस्ताव का चार माह के अन्दर विधि सम्मत निस्तारण करने के लिए प्रमुख सचिव होमगार्ड्स उत्तर प्रदेश, लखनऊ को निर्देशित किया था।
याचिकाकर्ता श्री विजय सिंह ने 20/12/2011 प्रमुख सचिव होमगार्ड्स उत्तर प्रदेश, लखनऊ को पंजीकृत डाक से प्रेषित प्रत्यावेदन के साथ माननीय उच्च न्यायलय के आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि मूलरूप में संलग्न कर होमगार्ड्स को पुलिस के समान वेतन देने व अन्य सुविधाए देने का अनुरोध किया था। प्रत्यावेदन पर कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने 01/05/2012 व 31/05/2012 को दो अनुस्मारक पत्र डाक से भेज कर माननीय उच्च न्यायलय के आदेशानुसार भेज कर पुनः दो बार होमगार्ड्स को पुलिस के सामान वेतन देने व अन्य सुविधाएं देने का अनुरोध किया था। विश्व मानव कल्याण संस्थान के राष्ट्रीय महामंत्री श्री प्रदीप सिंह ने 02/06/2012 को वार्ता में बताया कि माननीय उच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बाद भी होमगार्ड्स को पंद्रह वर्षों के लंबित उनका हक देने के लिए बजट में कोई व्यवस्था न करना अत्यंत दुखद है और बजट के बाद से प्रदेश में सेवारत एक लाख सत्रह हजार से अधिक होमगार्ड्स में सरकार की उपेच्छा से घोर निराशा व्याप्त है।
सरकार ने अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए बनाये गए बजट में एक लाख सत्रह हजार से अधिक होमगार्ड्स के परिवारों का करीब तीस लाख से अधिक का वोट बैंक दिखाई न देने के कारण ही वर्तमान और पूर्व सरकारों तथा नेताओं ने होमगार्ड्स के कल्याण के बारे में शायद कभी सोचने की आवश्यकता ही नहीं समझी। नेताओं और सरकारों ने यह भी कभी नहीं सोचा कि एक मजदूर से भी कम दैनिक भत्ते 160 में कैसे एक होमगार्ड अपने परिवार का भरण पोषण और अपने बच्चों की शिक्षा व्यवस्था कर रहा है वह भी तब जब कि अधिकांश होमगार्ड्स/ मानदेय अधिकारियों को साल में छह माह से अधिक ड्यूटी नहीं मिलती है।


