यूपी का विधान सभा सत्र जारी है। एक जून को सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपना पहला बजट पेश किया। मुझे व्यक्तिगत रूप से सबसे ज्यादा उम्मीद थी कि पूर्वांचल में फैले दिमागी बुखार को इस बार सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर उससे निपटने की कारगर नीति बनाई जायेगी और इस बीमारी से मर रहे बच्चों को बचाने की कोशिशें तेज की जायेंगी। मगर लगभग सप्ताह बीत जाने के बावजूद कोई ऐसी प्रभावी पहल नहीं की गयी जिससे लगे कि इन बच्चों की मौत को लेकर गंभीर है। मेरी यह आशा बेमानी भी नहीं थी। अखिलेश यादव की कार्यशैली से कई लोगों को उम्मीदें जगती हैं। चुनाव से पहले और उसके बाद भी उन्होंने अपने व्यवहार से सभी को आकर्षित भी किया है। इसी शैली को देखकर लगता है कि वह सामाजिक सरोकारों और गरीबों के दर्द को बेहतर तरीके से समझेंगे और उसका निदान करेंगे। वह युवा हैं और उनकी टीम में भी समझदार युवा हैं। इस सदन में युवाओं की संख्या बड़ी है और अच्छी बात यह है कि युवाओं के अन्दर संवेदनशीलता बढ़ी है।
मगर दुख की बात यह है कि दस हजार से अधिक बच्चों की मौत भी इन नेताओं के लिए सबसे बड़ा कारण नहीं बन पा रही। दुनिया के किसी भी देश में अगर ऐसी किसी भी बीमारी से इतने बच्चे मर गये होते तो हाहाकार मच गया होता। मगर पिछले कई सालों से मौतों का यह तांडव जारी है और इसके निदान के लिए कोई भी सार्थक पहल नहीं हो पा रही है। पूर्वांचल में पिछले कई सालों से यह बुखार अपने पैर पसारता जा रहा है। इस बीमारी में बच्चे को हल्का-हल्का बुखार आता है। यह बुखार कुछ ही दिनों में तेज हो जाता है और बच्चा तड़प-तड़प कर मर जाता हैं। यह बात सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते है कि इस बीमारी से पूर्वांचल में दस हजार से अधिक बच्चे मौत के मुंह में जा चुके हैं। यह सिलसिला अभी भी जारी है। तेज गर्मी के बाद बरसात तक मौतों का सिलसिला जारी रहता है।
पूर्वांचल के सरकारी अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिलते परिणामस्वरूप अस्पतालों के अन्दर और बाहर जमीन पर इन बच्चों के मां-बाप अपने बच्चों को लेकर बैठे रहते हैं। चिकित्सकों को भी पता है कि बच्चा अब कुछ ही दिनों का मेहमान है। लिहाजा वह भी इन बच्चों का मामूली ढंग से इलाज करते हैं। मां बाप असहाय होकर बच्चे को निहारते रहते हैं और उसके पैदा होने से लेकर अस्पताल के बरामदे में लेटने तक की बातें याद करते रहते है और रोते रहते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि अब उनका बच्चा एक या दो दिन का ही मेहमान है। मेरे विचार से दुनिया में इससे बड़ी पीड़ा कोई और नहीं हो सकती कि आपका मासूम बच्चा आपकी गोद में आपके सामने ही तड़प-तड़प कर मर रहा हो और लाख चाहकर भी आप उसको बचाने के लिए कुछ नही कर पायें। पूर्वांचल के हजारों परिवारों ने इस दर्द को झेला है और अभी भी इस दर्द को झेल रहे हैं। मगर वह असहाय हैं। कोई भी सूरत ऐसी नजर नही आती जिससे वह अपने बच्चों को बचा पायें।
पूर्वांचल की इस महामारी को रोकने के लिए कोई भी राजनैतिक दल प्रभावी ढंग से अपनी भूमिका का निर्वहन नहीं कर पा रहा। यह बच्चे किसी भी राजनैतिक दल के लिए बड़ा मुद्दा इसलिए नही बनते क्योंकि वह बेहद गरीब परिवार के बच्चे होते हैं। वह किसी का वोट बैंक नहीं होते हैं और न ही इस हैसियत के होते है कि इन बच्चों की मौत के बाद राजनेताओं पर किसी भी तरह का कोई प्रभाव पड़े। लिहाजा कोई भी प्रभावी रणनीति नहीं बन पाती। पिछले कई सालों से पूर्वांचल में फैली यह महामारी केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए विवाद का विषय भी रही है। राज्य सरकार को नीचा दिखाने के लिए केन्द्र ने एक आध बार अपने स्तर से दवाओं का छिड़काव कराने की कोशिश भी की मगर राज्य सरकारों ने उस पर अपना अड़ंगा लगा दिया। लिहाजा यह कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं। नतीजा हर बार राज्य सरकारें केन्द्र पर आरोप लगाती हैं कि केन्द्र उन्हें सहयोग नहीं कर रहा और केन्द्र यही आरोप राज्यों पर लगाता रहता हैं मगर कोई प्रभावी समाधान नहीं निकल पाता। लिहाजा इस राजनीति का शिकार यह बच्चे लगातार होते रहते हैं। लगता भी नहीं कि दोनों मे से कोई प्रभावी समाधान की कोशिशें भी कर रहे हैं।
एक जून को जब अखिलेश यादव ने अपना बजट पेश किया तो उसमें इस बीमारी के निपटने के कोई उपाय का जिक्र नहीं था। प्रेस वार्ता में दो पत्रकारों ने यह मुद्दा उठाया भी कि बजट में सैफई में बनने जा रहे स्टेडियम का तो जिक्र है, मगर पूर्वांचल में मर रहे हजारों बच्चों की मौत के रोकथाम का कोई प्रभावी जिक्र नहीं है। हांलाकि मुख्यमंत्री ने कहा कि वह इस स्तर पर प्रभावी कार्यवाही करायेंगे कि किसी भी बच्चे के इलाज में कोई कोताही न बरती जाय। हम सब दुआ कर सकते हैं कि मुख्यमंत्री अपने वायदे पर कायम रहे और अफसरों को निर्देशित करें कि हर हालत में यह व्यवस्था की जाय कि कोई भी बच्चा इस बीमारी के कारण मौत के मुंह में न जा पाये।
इसी सप्ताह बिल गेट्स लखनऊ आये थे। वह स्वास्थ्य के मामले में राज्य सरकार को सहयोग करना चाहते थे। उन्होंने कुछ गरीब मोहल्लों को देखा भी। अच्छा होता कि अफसरों का उच्च स्तरीय दल पूर्वांचल की इस बीमारी के विषय में उन्हें पूरी रिपोर्ट सौंपता और उनके साथ मिलकर व्यापक अभियान चलाता कि इस इलाके में इस
बीमारी से कोई और बच्चा न मरे। मगर अफसोस कि कोई ऐसी सार्थक पहल होती दिखाई नहीं दी। इस सार्थक पहल न हो पाने के कारण भी हैं। मरने वालों में किसी पूंजीपति, किसी नेता, किसी अफसर का बच्चा नहीं है। लिहाजा गरीब की जो स्थिति लगातार इस देश में चलती आ रही है वही स्थिति अब भी इस बीमारी में होती नजर आ रही है। मगर हमारे राजनेताओं को समझ में आना चाहिए कि ईश्वर से बड़ी कोई सत्ता नहीं होती। उसकी लाठी में आवाज भी नहीं होती। अगर सत्ता चला रहे लोगों को इन बच्चों की मौत और उनके परिवार की चीखें सुनाई नहीं दे रही तो उन्हें यकीन करना चाहिए कि ईश्वर उन्हें जल्दी ही वह सब सुनवा देगा जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ से प्रकाशित वीकेंड टाइम्स के संपादक हैं.


