एक पुरानी कहावत कई बार दुहराने योग्य है, और बार-बार प्रासंगिक. कहते हैं, जब व्यक्ति को किसी बात का घमंड हो तो ज्ञान उसे दूर कर देता है, लेकिन उसका क्या करें जब किसी को ज्ञान का ही घमंड हो जाय. ऐसे ज्ञानियों में एक खतरनाक बात यह भी पायी जाती है कि विषय चाहे जो हो लेकिन सामूहिक अवधारणा के विपरीत, बहुसंख्यकों के विचार के विपरीत अपना कोई ज्ञान बघार दो ताकि लोगों का ध्यान आकृष्ट किया जा सके. गत गुरुवार को जब पेट्रोल की कीमत में की गयी तुगलकी मूल्यवृद्धि के खिलाफ लगभग तमाम गैर कांग्रेसी दलों ने अभूतपूर्व भारत बंद का आयोजन किया था तब ऐसे ही एक ज्ञानी संपादक की टिप्पणी थी कि बंद का आयोजन और पेट्रोलियम मूल्य कम किया जाना (उनके शब्दों में सब्सीडी देना) ये दोनों गरीब विरोधी कारवाई है. उनके ‘व्यापक’ समझ के अनुसार पेट्रोलियम पदार्थ केवल अमीरों के उपयोग की चीज़ है इस पर ज्यादे हाय-तौबा मचाने की ज़रूरत नहीं है. अपने तर्क में उन्होंने ये भी जोड़ दिया कि डीजल का भी उपभोग पचास-साठ लाख की गाड़ी चलाने वाले भी करते हैं अतः इन पदार्थों पर किसी तरह की सब्सिडी ना दिया जाय.
ज्यादा आंकड़ों में ना उलझते हुए सबसे पहले तो इसी तथ्य को समझना होगा कि सरकारें पेट्रोल पर कोई अनुदान नहीं देती बल्कि उसपर सरचार्ज ही लगाती है. उसके अलावा डीजल जैसे पदार्थों पर भी इस हाथ दे उस हाथ ले वाली कहावत लागू होती है. सबसे बड़ा झूठ तो ये कहना है कि इतना दाम बार-बार इस लिए बढ़ाया जा रहा है ताकि पेट्रो कंपनियों का घाटा कम किया जा सके. तथ्य तो यह है कि ये कंपनियां भारी मुनाफ़ा कमा रही है और सरकारें भी जम कर विभिन्न करों के मद में प्रचुर पैसा चूस रही है. इसके अलावा लाभांश के रूप में पेट्रो कंपनियों से भी पैसा मिलता ही है. तथ्य तो यह है कि 2006-07 से 2009-10 के बीच चार वर्षों की अवधि में ही सरकारी सार्वजनिक क्षेत्र की तीन तेल विपणन कंपनियों का सम्मिलित लाभ 36653 करोड़ रुपए था. भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड ये तीनों जम कर मुनाफ़ा कूट रही है. आप कभी इन कंपनियों के अधिकारियों की शानो-शौकत देखें तो पता चले. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी अभी तेल की कीमत गिरी ही है.
अगर केन्द्र सरकार रुपयों के अवमूल्यन को बहाना बना कर इस मूल्य वृद्धि को सही ठहरा रही है तो सवाल यह है कि उसके कु-प्रबंधन का खामियाजा देश के गरीब क्यूं भुगते? अर्थव्यवस्था पर किसी तरह के संकट का कोई जायज़ कारण नहीं है. अनाज का उत्पादन बंपर हुआ है. सेवा क्षेत्र में भी वृद्धि ही देखी जा रही है. हां बावजूद इसके अगर देश की साख गिरी है तो वो भ्रष्टाचार, जमाखोरी, महंगाई और काला धन के कारण. हाल ही में सरकार द्वारा काले धन पर जारी श्वेत पत्र में स्वीकार किया गया है कि लगभग 60 खरब रुपया केवल विदेशों में जमा है. कोयला, टू जी और कोमन्वेल्थ घोटाले आदि तो साबित हो ही गए हैं जिसमें कई लाख करोड़ का घोटाला हुआ है. इसी तरह सत्ता समर्थित बुद्धिजीवियों द्वारा बार-बर यह कहा जा रहा है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने से गरीबों का कोई नुकसान नहीं होता. उन्हें शायद यह पता नहीं कि दूध वाले से लेकर सब्जी वाले तक परिवहन के लिए अब पेट्रोल चालित वाहनों का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा दाम बढ़ने पर मुद्रास्फीति बढ़ने और फलतः अंतिम रूप से महंगाई से कराह रहे जनता को आम उपभोग का सामान और महँगा होना इसी से तो जुड़ा विषय है.
तेल के खेल में किस तरह राजनीति की जाती है यह इस बात से और साबित होता है कि यूपीए समर्थित लोग कहते हैं कि राज्य सरकारों को वैट आदि कर कम कर देना चाहिए. यहां सवाल यह है अगर यही करना उचित हो तो कांग्रेस शासित राज्यों में ऐसा क्यूं नहीं किया जा रहा है. इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है कि केन्द्र सरकार दामों में मनमाना वृद्धि करती रहे और राज्यों को, जिनके पास संसाधन खुद ही सीमित होती हैं करों की दर कम करने को कहा जाय. यह कुछ-कुछ वैसा ही हुआ कि रेल किराया बढ़ाने का विरोध करने पर यह कहा जाय कि आखिर राज्य सरकारें हर टिकट पर सब्सिडी क्यूं नहीं दे देती? अगर केन्द्र सरकार की नीयत साफ़ हो तो सीधे तौर पर हर तरह के कर से पेट्रो पदार्थों को मुक्त कर दे. ना खुद इस जनोपयोगी पदार्थ पर किसी तरह का कोई कोई टैक्स ले और ना ही राज्यों को लेने दे. केवल इस एक कदम से ही पेट्रोल की कीमत आधी हो जायेगी. ना इस पर किसी तरह की सब्सिडी देने का ढोंग करे ना ही सरचार्ज लगाया जाय और ना ही उत्पाद कर बिक्री कर आदि. एक अधिकृत आंकड़े के अनुसार आज पेट्रोल को हम जिस कीमत पर खरीदते हैं उसका केवल 48 प्रतिशत ही बेस मूल्य है. यानी इस 48 प्रतिशत कीमत में ही कच्चे तेल के दाम से लेकर उसे आयात करने, रिफायन करने और कंपनियों का प्रोसेशिंग शुल्क सभी शामिल होता है. बहरहाल.
तो यूपीए सरकार किस तरह के जनविरोधी निर्णय लगातार लेती जा रही है यह अब किसी से छिपा नहीं है. ऐसे में विपक्ष और जनता के पास अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए बंद, प्रदर्शन, चक्का जाम आदि आंदोलन करने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रहता. अगर ऐसे आंदोलनों को उस बात से बड़ा अपराध बताया जाय जिसके लिए प्रदर्शन आदि किया जा रहा है, तब तो कल होकर किसी बड़ी आतंकी घटना होने पर विरोध प्रदर्शन किये जाने को भी आतंकी घटना जैसा ही कह दिया जाएगा. दुखद यह है कि इस तरह की बातें वैसे बुद्धिजीवी ही करते हैं जो अन्य समय पर लोकतांत्रिक अधिकारों का रोना रोते आपको कहीं भी मिल जायेंगे. निश्चय ही गुरुवार का यह बंद वास्तव में जनता के स्वाभाविक आक्रोश का
प्रकटीकरण था. यह इस मामले में भी अनोखा था कि क्या भाजपा, क्या वाम, क्या सपा क्या अन्य, सबने अपने राजनैतिक-वैचारिक मतभेद को परे रख कर इसे समर्थन दिया था. ढोंग ही सही लेकिन यूपीए के तृणमूल और द्रमुक जैसे घटक दलों ने भी इस विरोध प्रदर्शन में जम कर हिस्सा लिया. मजदूर संगठनों से लेकर कई व्यावसायिक चेंबरों तक ने, और तो और नक्सलियों तक ने इस बंद का बढ़-चढ कर समर्थन ही किया. इतने के बावजूद भी किसी मसिजीवी से ऐसा लिखवाने के बदले केन्द्र को चाहिए कि वह जनाक्रोश को समझ जनता को राहत प्रदान करे. उस आम आदमी को, महंगाई के जाल से मुक्त करे जिसके साठ होने का वादा कर वो दूसरी बार सत्ता में आयी है.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ से प्रकाशित भाजपा के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.


