मौसम किसी की परवाह नहीं करता। वैसे तो वह बदलता रहता है पर उसके बदलने का कोई गणित नहीं है। किसी को चाहे जितनी शिकायत हो, पर इसका उस पर कोई असर नहीं होता। कोई नहीं कह सकता कि मौसम कब बदलेगा। बहुत धूप है, तेज धूप है, जला देने वाली। इतनी धूप भी अच्छी नहीं कि बाहर निकलना ही मुश्किल हो जाये, पर इससे मौसम को क्या। वह किसी की सुविधा, असुविधा नहीं देखता, वह किसी की परेशानी की चिंता नहीं करता। मौसम को कोई डिक्टेट नहीं कर सकता। बहुत कोशिशें हुई हैं लेकिन उस पर काबू करना अभी भी एक पहेली बना हुआ है।
आदमी अभी तक मौसम के बारे में बहुत मामूली चीजें जान सका है। तमाम उपग्रहों और दूरबीनों के बावजूद मौसम के भीतर के तापमान तक पहुंचने में आदमी को ज्यादा कामयाबियाँ हासिल नहीं हो सकी हैं। वह ज्यादा से ज्यादा इतना जान सका है कि मौसम खुश्क रहेगा या पानी की बौछारें पड़ेंगी या फिर बादल छाये रहेंगे। आदमी के इस अनुमान को भी मौसम कई बार धता बता देता है। जब आदमी बारिश का अनुमान लगाता है तो वह उसे गलत साबित करके आग भरी धूप उलीचने लगता है। जब आसमान में बादलों के छाये रहने की बात कही जाती है तो वह कई-कई दिन अपने खामोश नीलेपन के साथ उपस्थित रहता है।
दुनिया भर में मौसम के रहस्य को भेदने केलिए हजारों दिमाग काम कर रहे हैं, अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं। धरती का कंपन नापने के लिए जगह-जगह उपकरण लगाये गये हैं, ग्रहों की गतियाँ समझने के लिए अंतरिक्ष में विशालकाय टेलिस्कोप लगाये गये हैं, सागर का आलोडऩ समझने के लिए तटों के पास बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएं स्थापित की गयी हैं लेकिन मौसम है कि दगा देता रहता है। दुनिया भर के ज्वालामुखियों की मैपिंग कर ली गयी है। उनके दहकते लावे और सूख कर ठोस हो चुकी चट्टानों के नमूनों से पता लगाने की कोशिशें हो रही हैं कि अगला ज्वालामुखी कब फटेगा। बावजूद इसके उसके गर्भ की खदबदाहट को सटीक तरीके से मापने की कोई तकनीक विकसित नहीं की जा सकी है।
असल में प्रकृति में कोई भी तत्व पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। आप नहीं कह सकते कि पहाड़ का केवल नदी से संबंध है या केवल जंगलों से संबंध है। आप यह भी नहीं कह सकते कि बादलों का केवल सागर से रिश्ता है, जंगलों और पहाड़ों से नहीं। बहुत मुश्किल है यह कहना कि धरती केवल जंगल, पानी और मिट्टी है, इसके अलावा कुछ और नहीं। समूची प्रकृति अपने विभिन्न जैविक और अजैविक तत्वों के गहन अंतरसंबंधों और उनके बीच एक गतिशील अंतरक्रिया में रची-बसी है। आदमी जब प्रकृति के साथ रहने की कला जानता था तो उसे इसका तात्विक बोध था। वह जानता था कि उसके लिए प्रकृति अपना सारा सौंदर्य, अपना सारा जीवन भंडार खोले हुए है। संपूर्ण निर्बंधता और खुलेपन के साथ, कोई रोक-टोक नहीं। पर उसे उतना ही लेना है, जितनी उसकी जरूरत है। माँ के स्तनों में दूध है और माँ बच्चे को प्रेम से सब कुछ देने को तत्पर है तो क्या वह उसका सीना फाड़ डालेगा? नहीं बच्चे को भी उतना ही लेना है, जितनी उसकी भूख है, उससे ज्यादा नहीं।
पर वह समझ अब कहाँ? अब तो प्रकृति के संसाधनों की लूट मची हुई है। कीमती धातुओं के लिए धरती खोदी जा रही है, उसके सीने में गहरे घाव करके आदमी सोने, हीरे, पन्ने, माणिक की तलाश कर रहा है। पहाड़ तोड़े जा रहे हैं, चट्टानों को घिसकर, तराशकर घर की सजावट में लगाया जा रहा है, जंगलों को काटकर आदमी अपने बसने के लिए या उद्योगों के लिए जमीन निकाल रहा है, नदियाँ रोकी जा रही हैं, बाँधी जा रही हैं ताकि बिजली से शहरों में उजाला किया जा सके। इस उजाले के पीछे हहराते घने अंधकार को आदमी अभी साफ भले न देख पा रहा हो, पर मौसम ने उसे चेतावनियाँ देना शुरू कर दिया है।
अपनी बड़ी-बड़ी मशीनों से लैस आदमी उस समय कुछ नहीं कर पाता है, जब सागर की पचास मीटर ऊंची लहरें किनारों को रौंदती हुई विकास और ताकत के आधुनिक दानव के मंसूबे ध्वस्त करती हुई उसकी सारी जगमगाहट पर मिट्टी और कीचड़ डाल कर चली जाती हैं। उसके सारे उपग्रह और दूरबीनें बेकार साबित होती हैं, जब बिना किसी सूचना के एक ज्वालामुखी राख उगलने लगता है, धमाके के साथ फटता है और आसमान को चिनगारियों में तबदील पत्थरों से भर देता है, जेट की तरह लाखों टन राख और लावा शहरों और बस्तियों के ऊपर से गुजरता है और दंभोन्मत्त सभ्यता के हाथों गढ़ी गयी सड़कों के किनारे बसी आधुनिक हाई-टेक बस्तियों को अपने विशाल काले पंजों से पलटकर दफना देता है। कैटरीना अमेरिकन्स के लिए बहुत खूबसूरत नहीं है। वे नहीं जानते कि कब शांत समुद्र के भीतर से एक दैत्य अपनी विशालकाय हथेलियों से पानी का एक ऐसा कटोरा उसके ऊपर पलट देगा, जिससे बाहर निकल पाना मुमकिन नहीं होगा।
सच में आदमी अभी भी नहीं जानता मौसम को। उसने जो गलतियाँ की है, उसका पश्चाताप भी उसे नहीं है। निरंतर चेतावनियों के बाद भी उसकी गलतियाँ जारी हैं। लालच में वह लगातार प्रकृति के अंतरसूत्रों से छेड़-छाड़ कर रहा है। कितने जीव विलुप्त हो गये, कितनी वनस्पतियाँ मिट गयीं लेकिन उसे इसकी चिंता नहीं है। वह शायद यह समझ रहा था कि जो मिटने वाली चीजें हैं या जो मिट रही हैं, उनकी धरती के जीवन में कोई भूमिका नहीं है। पर नहीं, यह उसकी नासमझी थी, यह उसका लालची पागलपन था। एक पागल की क्या नियति हो सकती है? उसे तो निश्चित ही नष्ट होना होगा। कुछ लोगों की नींद टूटी है, कुछ वैज्ञानिक खतरनाक भविष्य से लोगों को आगाह भी कर रहे हैं लेकिन अपनी ताकत के दर्प में खुद को दुनिया का नियामक समझने वाले अभी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। वे अंतरिक्ष में कोई ऐसी जगह तलाश रहे हैं, जहाँ इस धरती के नष्ट होने के बाद बस सकें। प्रकृति बहुत सहज है पर वह किसी विकराल दंभ को अपनी लगाम कसने की इजाजत शायद नहीं देगी। उसके हाथ में अभी भी सागर है, विशाल पर्वत हैं, झीलें हैं और बहुत कुछ है। कभी सागर अगर धरती के ऊपर पलट जाय तो मनुष्य के क्षुद्र दंभ का क्या होगा? कभी हिमालय टुकड़े-टुकड़े होकर उडऩे लगे और
घर्षण से दहककर शहरों पर गिरने लगे तो आदमी क्या कर पायेगा? यह आदमी, जो सख्त धूप, तेज बारिश और बर्फीली हवाओं से परेशान हो उठता है, वह क्या कर पायेगा, अगर एक ग्रहीय उल्का फिर आकर धरती से टकरा जाये? दुनिया की भलाई इसी में है कि एक बार फिर पूरी समझदारी से हम प्रकृति के साथ हो लें। बस यही एक उपाय है, सिर्फ यही।
लेखक डा. सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 09455081894 के जरिए किया जा सकता है.


