उत्तर प्रदेश के विधन सभा चुनावों में झटका खाकर राजनैतिक बनवास में चली गई मायावती के लिये उनके ही सहयोगियों पर सीबीआई की छापेमारी ने संकेत दे दिये हैं कि आने वाले दिन उन पर भारी पड़ेंगे। किसी हॉरर शो की तरह हो गया एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई जिस तरह मायावती के दाहिने हाथ सतीश मिश्र के रिश्तेदार पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अंटू मिश्र पर शिकंजा कस रही है उससे यह तो साफ हो गया है कि अगर कांग्रेस की कृपा में थोड़ी सी भी कमी हुई तो सीधे-सीधे मायावती भी लपेटे में आयेंगी। हाल के दिनों में अंटू मिश्र के घर पर हुई छापेमारी में सीबीआई के हाथ कुछ ऐसे सबूत लगे हैं, जिससे एनआरएचएम के खेल की बड़ी मछली को सीबीआई ने करीब-करीब सूंघ लिया है। हालांकि घोटाले के समय प्रमुख विपक्षी पार्टी सपा और भाजपा ने तो सीधे-सीधे मायावती पर ही उंगली उठाई थी। लेकिन उस माया सरकार ने इसे राजनैतिक दुष्प्रचार बताकर खारिज कर दिया था। लेकिन घोटाले की छोटी मछलियों और ईमानदार अधिकारियों की हत्या ने इतना तो इशारा जरूर कर दिया था कि बिना शीर्ष स्तर की जानकारी के बिना बाबू सिंह और अंटू मिश्रा की हिम्मत नहीं कि वह एनआरएचएम की पूरी मलाई चट कर जायें।
हालांकि उत्तर प्रदेश में पुनर्जीवन की कोशिशों में लगी कांग्रेस इस घोटाले के जरिये मायावती को घेरना चाहती थी, लेकिन राहुल गांधी सिर्फ वोटों की खींचतान में ही लगे रहे। अब जब राजनैतिक परिदृश्य उल्टा हो चुका है तो लगता है कांग्रेस अब इस स्वास्थ्य योजना के जरिये मायावती का स्वास्थ्य ठीक करना चाहती है। सत्ता से बाहर हो चुकी मायावती भी इस घोटाले की गम्भीरता को समझती हैं, लिहाजा उन्होंने तुरत-फुरत उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार को समर्थन दे दिया ताकि बाकि के दिन चैन से बैठकर दिल्ली में बिताया जा सके। लेकिन लगता है कांग्रेस माया के इतने अहसान से संतुष्ट नहीं होने वाली। अगर सीबीआई ने ऐसे ही अपना कार्य जारी रखा तो ताज कॉरिडोर के बाद माया की यह सबसे बड़ी शामत होगी। दूसरी तरफ पूर्ण बहुमत की सरकार पाकर समाजवादी पार्टी भी बसपा राज में हुए उस हर निर्माण, डील और फैसलों को जांच रही है जहां कुछ न कुछ खिचड़ी पकी है। अब दोतरफा वार से बसपा सुप्रीमों कितने दिन बचेगी यह बड़ा सवाल है। लेकिन कहते हैं न कि राजनीति में कुछ भी सम्भव है। केन्द्रीय सरकार की हालत आज कल ठीक नहीं चल रही है। रुपया दिनों दिन गिर रहा है, महंगाई तो अब लाइलाज हो गयी है। सहयोगी आर्थिक सुधर की गाड़ी को पटरी से उतार चुके हैं।
देश की अवाम वैसे भी पेट्रो वृद्धि से तिलमिला कर सरकार को ठिकाने लगाने को तैयार है। रही सही कसर रामदेव और अन्ना के भभकते आन्दोलनों ने पूरी कर दी है। सहयोगी समर्थन वापसी की धमकी दे रहे हैं क्योंकि वह जानते हैं कि 2014 तक अगर सरकार के साथ वह रहे तो उनकी संख्या ऐसे गायब होगी जैसे गधे के सिर से सींग। ऐसी स्थिति में कांग्रेस ने भी मन बना लिया है कि अगर वह मायावती को बांधे रखती है तो बाकी के कार्यकाल को भी पूरा किया जा सकता है और तमाम महत्वपूर्ण विधेयकों को भी पारित कराया जा सकता है। मुलायम सिंह पहले से ही सरकार में शामिल होने को तैयार हैं क्योंकि उनकी दुखती रग आय से अधिक सम्पत्ति रखने का मामला भी सीबीआई देख रही है। लेकिन दुख भी इस बात का है कि सत्ता बचाने के इस नूरा कुश्ती में इस घोटाले का भी वही हश्र न हो जाये जो बोफोर्स समेत तमाम उन्हीं मामलों का हुआ है जो सीधे-सीधे राजनैतिक दिग्गजों से ही जुड़ा था। अब ऐसी स्थिति में जाहिर बात है कि आगे भी बड़ी-बड़ी योजनायें राजनैतिक हित साधने के काम में पैकेज की तरह इस्तेमाल की जायेंगी। और जनता सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तरह आगे भी सड़ती रहेगी।
लेखक संजय पांडेय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


