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धूमल के ‘मिशन रिपीट’ की राह में कांटे

मुख्यमंत्री प्रो. प्रेमकुमार धूमल के ‘मिशन रिपीट’ की राह में लगातार कांटे बिछते जा रहे हैं और उनके लिए बड़ी परेशानी वाली बात यह है कि अब डैमेज कंट्रोल के लिए भी समय अधिक नहीं बचा। दिलचस्प बात यह है कि इस मिशन को विपक्ष से नहीं, बल्कि विद्रोहियों से ही अधिक खतरा है। शांता समर्थकों की फजीहत करने की रणनीति सरकार को भारी पड़ती जा रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए नए जिलों के गठन का शोशा छोड़ा गया है, लेकिन वह भी सिरे चढ़ता नजर नहीं आ रहा। कांगड़ा जिले में इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री पर सरकार व संगठन में फेरबदल के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है। माना जा रहा है कि उन्हें शीघ्र ही कुछ अप्रत्याशित निर्णय लेने पड़ सकते हैं।

मुख्यमंत्री प्रो. प्रेमकुमार धूमल के ‘मिशन रिपीट’ की राह में लगातार कांटे बिछते जा रहे हैं और उनके लिए बड़ी परेशानी वाली बात यह है कि अब डैमेज कंट्रोल के लिए भी समय अधिक नहीं बचा। दिलचस्प बात यह है कि इस मिशन को विपक्ष से नहीं, बल्कि विद्रोहियों से ही अधिक खतरा है। शांता समर्थकों की फजीहत करने की रणनीति सरकार को भारी पड़ती जा रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए नए जिलों के गठन का शोशा छोड़ा गया है, लेकिन वह भी सिरे चढ़ता नजर नहीं आ रहा। कांगड़ा जिले में इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री पर सरकार व संगठन में फेरबदल के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है। माना जा रहा है कि उन्हें शीघ्र ही कुछ अप्रत्याशित निर्णय लेने पड़ सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश भाजपा में लंबे समय से शांता कुमार और प्रो. प्रेमकुमार धूमल के मध्य तीखी धड़ेबंदी चल रही है और प्रदेश का सबसे बड़ा जिला कांगड़ा इसका मुख्य अखाड़ा है। प्रो. धूमल के पिछले मुख्यमंत्रित्वकाल में भी छह मंत्रियों-विधायकों ने अपनी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए खुला विद्रोह कर दिया था। उस समय मुख्यमंत्री ने हाईकमान की सहायता से सख्ती बरतते हुए विद्रोह को शांत कर लिया था। प्रो. धूमल के सामने लगभग वही स्थिति फिर से खड़ी है। फर्क मात्र इतना है कि खुला विद्रोह वो असुंष्ट भाजपाई कर रहे हैं जो सरकार का हिस्सा नहीं हैं। और जो असंतुष्ट सरकार में हैं वो पर्दे के पीछे से डोर खींच रहे हैं।

वास्तव में प्रो. प्रेम कुमार धूमल जब वर्ष 2007 में दोबारा मुख्यमंत्री बने तो पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार को परिस्थितिवश काफी समय तक शांत रहना पड़ गया था। इसका नतीजा यह हुआ कि धूमल समर्थकों ने अति उत्साह में शांता समर्थक मंत्रियों, विधायकों व नेताओं को एक-एक कर हाशिए पर धकेलने के प्रयास तेज कर दिए। शांता समर्थकों के क्षेत्रों में सरकारी समारोहों में मंच पर धक्का मुक्की होने लगी। उनके स्थान पर टिकट के नए दावेदारों को आगे किया जाने लगा। इसमें सबसे अधिक आरोप धूमल समर्थक मंत्री रविंद्र सिंह रवि पर लगे, जिनका थुरल विधानसभा क्षेत्र नए सीमांकन में समाप्त हो गया है। भुक्तभोगियों में उद्योगमंत्री किशन कपूर और खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रमेश धवाला प्रमुख हैं। लेकिन चुनावी वर्ष में परिस्थितियां एकाएक बदल गई हैं।

भाजपा में खुले विद्रोह के चलते हाल ही में पूर्व सांसद महेश्वर सिंह के नेतृत्व में हिमाचल लोक हित पार्टी (हिलोपा) का गठन हो चुका है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शांता कुमार भी अपने समर्थकों की उपेक्षा के चलते लगातार आक्रामक होते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार पर उनके सधे हुए व्यंग्यबाण अपनी ही सरकार को लहूलुहान कर रहे हैं। कांगड़ा से भाजपा सांसद डा. राजन सुशांत ने भी पिछले दिनों जब प्रदेश सरकार को कोसते हुए अलग राह पकड़ ली तो उन्हें पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। इन दिनों डा. राजन सुशांत सरकार पर तीखे हमले करते हुए जनजागरण अभियान छेड़े हुए हैं। उनकी जनसभाओं में जय प्रकाश कंपनी का बघेरी थर्मल प्लांट प्रकरण, अनाडेल मैदान प्रकरण, भूमि की अवैध खरीद-फरोख्त आदि का खूब मंत्रोच्चार हो रहा है। आईपीएच मंत्री रविंद्र सिंह रवि, स्वास्थ्य मंत्री राजीव बिंदल और परिवहन मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर विरोधियों के मुख्य निशाने पर हैं। हिमाचल लोक हित पार्टी (हिलोपा) को इंतजार है कि कब भाजपा से एक और भाग टूटकर उससे आ मिले।

कांगड़ा जिला भाजपा ने गत दिवस धर्मशाला में प्रस्ताव पारित कर हाईकमान से रविंद्र सिंह रवि को पद से हटाने का मांग कर डाली। इस बैठक में जिला भाजपा अध्यक्ष रणजीत पठानिया, महामंत्री विनय शर्मा, मीडिया सह प्रभारी राकेश शर्मा सहित उद्योगमंत्री किशन कपूर, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रमेश धवाला, भाजपा के प्रदेश महासचिव विपिन परमार, विधायक प्रवीण शर्मा व देशराज, एचआरटीसी के उपाध्यक्ष डा. राजीव भारद्वाज आदि शामिल थे। इससे पूर्व शांता कुमार भी हाईकमान से रविंद्र सिंह रवि की शिकायत कर चुके हैं। उन्होंने सांसद राजन सुशांत के जनजागरण अभियान पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाई कमान को उनके खिलाफ तुरंत कदम उठाना चाहिए ताकि पार्टी की हो रही फजीहत को रोका जा सके। प्रदेश में इस वर्ष के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में चल रही नेतृत्व की लड़ाई के कारण प्रो. धूमल के ‘मिशन रिपीट’को काफी बल मिल रहा था। माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री अपने पिछले कार्यकाल की तरह विद्रोहियों से निपट लेंगे, लेकिन समय तेजी से बीतता जा रहा है। मुख्यमंत्री के ‘मिशन रिपीट’ को कांग्रेस से नहीं, बल्कि ‘अपनों’ से ही अधिक खतरा है।

लेखक एच आनंद शर्मा शिमला से संचालित न्यूज़ पोर्टल ‘हिम न्यूज़पोस्ट. कॉम’ के संपादक हैं।

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