: दोनों ही ग्राम समाज की जमीनों को कब्जाने के शातिर खिलाड़ी : आयुर्वेद के नाम पर रामदेव ने हरिद्वार में तो निशंक ने ऋषिकेश में कब्जाई बेशकीमती 56 बीघा जमीनः सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं छोड़ रहे जमीन : उत्तराखंड में ग्राम समाज की जमीनों की खुली लूट हो रही है। सरकार चाहे वह कांग्रेसियों की रही हो, या अब भाजपाइयों की। ग्राम समाज की जमीनों को लूटने-लुटाने के खेल में कोई किसी से पीछे नहीं है। इतना जरूर है कि इस खेल में भाजपा की मौजूदा सरकार के मुख्यमंत्री निशंक सबसे आगे हैं। तिवारी की कृपा से आयुर्वेदिक कालेज के नाम पर ग्राम समाज की करोड़ों की जमीन पर मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का फेमिली ट्रस्ट तो कब्जा जमाए बैठा ही है, निशंक दरियादिली से ग्राम समाज की जमीनों को लुटाते जा रहे हैं। यह तब हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट हाल ही में एक मामले में ग्राम समाज की जमीनों को राजनेताओं और माफिया द्वारा अपने ताकत के बल पर कब्जाने पर एक सख्त फैसला सुना चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ग्राम समाज की जमीनों का उपयोग केवल ग्रामीणों के हित में ही होना चाहिए, न कि कुछ लोगों को अपना धंधा चलाने के लिए दान में दिया जाना चाहिए। अदालत इस मामले में राज्यों के मुख्य सचिवों को आदेशित कर ऐसी सभी जमीनों से कब्जा हटवाने का आदेश जारी कर चुकी है। लेकिन इसके बावजूद उत्तराखंड में अदालत के आदेश पर अमल तो दूर, जमीनों की लूट का खुला खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। जो काम ग्राम समाज की जमीनों को कब्जाते हुए रामदेव कर रहे हैं, वहीं धंधा निशंक भी कर रहे हैं। मुफ्त की जमीनों को घेरने के मामले में दोनों ही धुरंधर खिलाड़ी हैं। आयुर्वेद के नाम पर दोनों ही यह धंधा कर रहे हैं।
देशभर में सरकारी जमीनों की अंधाधुंध लूट पिछले कई सालों से चल रही है। उत्तराखंड के अस्तित्व में आने के साथ ही यहां भी सरकारी जमीनों की लूट तेज हो गई। राज्य में कांग्रेस की पहली निर्वाचित एनडी सरकार के कार्यकाल में जमीनों को कब्जाने का यह खेल परवान चढ़ा। 2002 के विधानसभा चुनाव में थलीसैंण से जनता की अदालत में मुंह की खाने के बाद बेरोजगार रहते हुए मौजूदा सीएम रमेश पोखरियाल निशंक ने तब पुत्री आरूषी और दूसरे सगे-संबंधियों को मिलाकर 16 फरवरी 2005 में हिमालयन आयुर्वेदिक योग एवं चिकित्सा संस्थान, ऋषिकेश नाम से अपना फेमिली ट्रस्ट गठित कर आयुवेर्दिक मेडिकल कालेज के नाम पर जमीन घेरने की योजना बनाई। ट्रस्ट में निशंक की पुत्री आरूषी, उनका भतीजा मनोज पोखरियाल को बतौर सदस्य और डा. प्रदीप भारद्वाज को इसका चेयरमैन बनाया गया। इसके बाद तब बेरोजगारी की मार झेल रहे निशंक ने ऋषिकेश तहसील के ग्राम फतेहपुर डांड में ग्राम समाज की साढे़ चार हेक्टेयर जमीन घेरने के लिए एनडी तिवारी के दरबार में दस्तक दी। तब ग्राम समाज की जमीन मुफ्त में ट्रस्ट को देने का विरोध करते हुए राजस्व एवं वित्त विभाग ने अपनी आपत्ति दर्ज की थी।
राजस्व विभाग ने साफ-साफ कहा था कि ‘सर्किल रेट के हिसाब से उक्त जमीन की कीमत 15 लाख हेक्टेयर के हिसाब से 60,70,500 रूपये बैठता है। निजी उददेश्यों के लिए नियमानुसार यह जमीन दोगुनी कीमत पर 1 करोड़ 21 लाख रुपये में ही दी जा सकती है।’ लेकिन तत्कालीन प्रमुख सचिव नपलच्याल ने विभाग को इस पर पुनर्विचार करने की सलाह देते हुए फाइल लौटा दी। इसका तत्कालीन प्रमुख सचिव चिकित्सा एसके दास ने भी ग्राम समाज की जमीन निःशुल्क ट्रस्ट को देने का विरोध किया था। लेकिन निशंक ने एनडी तिवारी से ऐसा दोस्ती गांठी कि करीब 56 बीघा जमीन ट्रस्ट के नाम सीएम से सीधे मुफ्त में करा ली। एनएस नपलच्याल के हाथों ही इस जमीन आवंटन का शासनादेश भी जारी किया गया। बाद में एनएस नपलच्याल को डा. टोलिया के रिटायरमेंट के बाद मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी पर बैठाकर निशंक ने उपकृत भी किया। सत्ता से बाहर रहते हुए निशंक ने इस तरह ग्राम समाज की करोड़ों की जमीन कब्जाने का खेल तो खेला ही, जब से वे मुख्यमंत्री बने तब से वे कई लोगों को पटटे पर जमीनें दे चुके हैं।
एनडी के शासन में निशंक ही एकमात्र ऐसे खिलाड़ी नहीं थे, जो ग्राम समाज की जमीनों को कब्जाने के खेल में लगे हुए थे, बल्कि उन्हीं के संघ परिवारी राकेश ओबराय ने भी 2005 में ही ग्राम डांडा नूरीवाला में सरकार से हेक्टेयर से ज्यादा जमीन हिमालयन स्कूल सोसायटी की आड़ में कब्जा ली। जो रामदेव आज कांग्रेस को फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं, उन्हें भी कांग्रेसी सरकार ने हरिद्वार में जमीनों का आवंटन किया। जब भाजपा सत्ता में आई तो उसने रामदेव पर दरियादिली से कई बीघा जमीन लुटा दी। अब सीएम निशंक कभी रूद्रपुर किच्छा में दुधिया बाबा को तो कभी तरह-तरह की संस्थाओं को जमीन देते जा रहे हैं। भाजपा राज में अब तक कई मीडिया संस्थानों को भी ग्राम समाज की जमीन दी जा चुकी है।
यह तब हो रहा है जब देश की सर्वोच्च अदालत करीब छह माह पहले अपने आदेश में साफ कर चुकी है कि ग्राम समाज की जमीनों से इस तरह के कब्जे तत्काल हटाए जाने चाहिए। 28 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मार्केंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की संयुक्त बेंच ग्राम समाज की जमीन से जुड़े एक मामले पर ऐसी कब्जोदारी पर सख्त टिप्पणी करते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुना चुकी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि राजनेता और लैंड माफिया किस्म के लोग सत्ता तक अपनी पहुंच के कारण देशभर में ग्राम समाज की जमीनों पर कब्जा करते जा रहे हैं। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ग्राम समाज की जमीनों का उपयोग केवल ग्रामीणों की भलाई के लिए ही होना चाहिए, न कि ताकत के बल पर राजनेता और लैंड माफिया को ग्राम समाज की जमीनें दी जानी चाहिए। नियमानुसार ग्राम समाज की जमीनों को भूमिहीन दलित व आदिवासियों में बांटा जाना चाहिए। अदालत ने देशभर के सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को आदेश दिया कि ऐसी सभी जमीनों से कब्जा हटाया जाय।
अदालत ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव से भी इस बाबत रिपोर्ट तलब की। लेकिन सर्वोच्च अदालत के इस आदेश पर उत्तराखंड में आखिर कार्रवाई होती भी तो कैसे, जब राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का फेमिली ट्रस्ट करोड़ों की बेशकीमती ग्राम समाज की जमीन पर खुद कब्जा जमाये बैठा हो। कायदे के अनुसार इस जमीनों को ग्राम पंचायत के उन लोगों में बांटा जाना चाहिए जिनके पास सिर छुपाने के लिए झोपड़ी तक नसीब नहीं है।
देहरादून से दीपक आजाद की रिपोर्ट.


