मुंबई. पानी की किल्लत के चलते जिस गांव के लोग कभी अपना घर बार छोड़कर मुंबई व पुणे जैसे शहरों की ओर रुख कर रहे थे, आज वह गांव पूरी दुनिया के लिए ग्राम विकास की पाठशाला बन चुका है. अहमदनगर जिले का यह गांव हिवरे बाजार जल संरक्षण के क्षेत्र में किए गए अपने कामों की वजह से दुनियाभर में अपनी पहचान बना रहा है. सह्याद्री की पहाड़ियों में बसा हिवरे गांव महाराष्ट्र के आदर्श गांवों में से एक है. पर, 25 साल पहले इस गांव की तस्वीर कुछ और थी. जनवरी शुरू होते ही पानी की किल्लत शुरू हो जाती थी. खेती के लिए पानी को कौन कहे, पीने के पानी के लिए भी लोगों को परेशान होना पड़ता था. पर, 1989 में इस गांव के सरपंच चुने गए पोपटराव पवार ने अपने गांव की तस्वीर बदलने की ठानी और इसके लिए गांव के युवाओं को एकजुट किया. पवार और अन्य युवाओं ने सबसे पहले गांव की कौन-कौन सी समस्याएं हैं, उनका खाका तैयार किया. उनके कारणों को जानने की कोशिश की तथा उनके निवारण पर विचार किया. पवार ने एक स्वयंसेवी संस्था का गठन कर पंचसूत्री कार्यक्रम तैयार किया. इसमें पीने व खेती के लिए पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, पशुओं के लिए चारा, सड़क, बिजली और रोजगार को प्राथमिकता दी गई.
पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद गांव में ही रहकर खेती करने वाले हबीब सैयद बताते हैं कि 1994 में हिवरे बाजार की ग्रामसभा ने इस पंचसूत्री कार्यक्रम को हरी झंडी दी. पाणलोट विकास कार्यक्रम के अंतर्गत दो तालाब, 42 मातीनाला बांध, पांच सीमेंट बांध, 9 सीमेंट संरक्षित जल डैम का निर्माण किया गया. इससे स्थिति में बदलाव आया और भूजल का स्तर 20 से 70 फीट तक ऊपर आ गया. फसल उत्पादन के चक्र में बदलाव आया. ज्वार और बाजरा के बजाय किसान प्याज, आलू और बागवानी फसलों का उत्पादन करने लगे. इसके कारण उनका आर्थिक स्तर और जीवनस्तर बढ़ गया. हबीब ने बताया कि 1991 में पूरे गांव में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन (बीपीएल) करने वाले 53 परिवार थे. पर, अब हिवरे बाजार में केवल 3 बीपीएल परिवार हैं. ग्रामसभा ने लक्ष्य रखा है कि 2012 के अंत तक गांव में कोई भी परिवार बीपीएल नहीं रहेगा.
सालाना कमाई : 732 से 99,000
1990 के पहले गांव के लोगों की औसत कमाई 732 रुपये सालाना थी. पर, आज यह कमाई 99,000 रुपये तक है. इस साल गांव वालों ने 3.5 करोड़ का प्याज बेचा है. ग्रामसभा की ओर से भूमिहीन किसानों को जमीन दी गई है. इस गांव में तंबाकू व शराब का सेवन प्रतिबंधित हैं. गांव में जो दुकानें हैं, उसमें ये चीजें नहीं बेची जा सकतीं. इस गांव में ऐसा कोई घर नहीं है, जहां शौचालय न हो.
दूध : 300 से 3000 लीटर
भविष्य की योजनाओं की बाबत पूछने पर हबीब बताते हैं कि पहले दूध उत्पादन 300 लीटर प्रतिदिन था, जो 3000 लीटर तक पहुंच गया है. पर, अब इसकी और अच्छी मार्केटिंग की योजना तैयार की जानी है. जिससे अपने दूध की मार्केटिंग गांव वाले खुदकर सकें.
दहेज पर पाबंदी
इस आदर्श गांव में दहेज लेने पर पूरी तरह से पाबंदी है और गणेशोत्सव में एक ग्राम एक गणपति के सिद्धांत का पालन किया जाता है. वल्र्ड बैंक, यूनेस्को सहित कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों के अलावा तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद, सीपी जोशी, पर्यावरणविद सुनीता नारायण सहित कई हस्तियां इस गांव की सफलता की कहानी देखने यहां आ चुकी हैं. हाल ही में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी हिवरे बाजार का दौरा किया था. इस गांव के सरपंच रहे पोपटराव पवार राष्ट्रपति भवन सहित अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी अपने गांव की सक्सेज स्टोरी सुना चुके हैं.
हिवरे बाजार से लौटकर विजय सिंह की रिपोर्ट.


