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राष्ट्रपति पद, प्रणब मुखर्जी और चुनौतियां

देश की आन-बान-शान को एक व्यक्ति में देखना हो तो, राष्ट्रपति को देखिए, भारत सरकार की ताकत को देखने की सारी ख्वाहिशें पूरी हो जाएंगी। भारत में राष्ट्रपति पद के महत्व को कम आंकने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि राष्ट्रपति भारतीय लोकतंत्र का पहरुआ है। ये सोच लोकतंत्र के पहले पहरुये के राजनीतिक फैसलों में सुस्ती दिखाने के चलते बनी। अब बदलाव की घड़ी है। प्रणब मुखर्जी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए आगे आने के बाद अब ऐसी सोच रखने की कोई हिमाकत भी नहीं कर सकेगा।

देश की आन-बान-शान को एक व्यक्ति में देखना हो तो, राष्ट्रपति को देखिए, भारत सरकार की ताकत को देखने की सारी ख्वाहिशें पूरी हो जाएंगी। भारत में राष्ट्रपति पद के महत्व को कम आंकने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि राष्ट्रपति भारतीय लोकतंत्र का पहरुआ है। ये सोच लोकतंत्र के पहले पहरुये के राजनीतिक फैसलों में सुस्ती दिखाने के चलते बनी। अब बदलाव की घड़ी है। प्रणब मुखर्जी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए आगे आने के बाद अब ऐसी सोच रखने की कोई हिमाकत भी नहीं कर सकेगा।

स्वतंत्रता सेनानी परिवार से आने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के एक गांव में हुआ। इस सपूत को 1984 में ही दुनिया के पाँच शीर्ष वित्तमंत्रियों की सूची में स्थान दिया गया। केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री के तौर पर मुखर्जी ने विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपनी सोच को लेकर अडिग रहने वाले प्रणब मुखर्जी को एक बार राजीव गांधी से अनबन के चलते 1984-89 तक कांग्रेस से बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा, जो प्रणब मुखर्जी के कठपुतली राष्ट्रपति होने की धारणा को ध्वस्त करता है। असल में प्रणब मुखर्जी का नाम कांग्रेस सामने लाकर उन तमाम राजनीतिक सहयोगियों का भी भरोसा जीत लिया है, जो कांग्रेस पर भरोसा करने से कतराते हैं। इनमें मुलायम सिंह यादव, मायावती, शरद पवार से लेकर ममता बनर्जी तक शामिल हैं। आम लोगों के अंदर भी प्रणब मुखर्जी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए सामने आते एक भरोसा जगा है। भरोसा एक ईमानदार नेतृत्व मिलने का। भरोसा देश की मान-मर्यादा समझने और उसे सर्वोपरि रखने का। भरोसा एक ऐसे राष्ट्रपति मिलने का, जो भारत के इतिहास में संभवत: पहली बार प्रधानमंत्री को देश की तमाम परेशानियों को लेकर सलाह और दिशा निर्देश देने का माद्दा रखता है, जिसमें जनता भी भरोसा करती है।

राष्ट्रपति पद को अगर प्रणब मुखर्जी अगर  नये तरीके से परिभाषित करने में कामयाब रहें तो, सशक्त लोकपाल की मांग बेमानी हो सकती है, लोकतंत्र के पहले पहरुये में इतना सामर्थ्य है कि देश में पनपे अवैध संपत्ति (काले धन) को विदेशों से और देश के अंदर से निकाल कर देश को नई दिशा दे सके, गुरबत से दो चार हो रहे आम आदमी की बेबसी को खत्म करने के लिए नई योजना ला सकें। प्रणब दा की थोड़ी भी सक्रियता देश को विकास के नए पथ पर ले जा सकती है। सरकार और विपक्ष को दो पहिए बनाकर देश के विकास रथ को दौड़ने में बहुमूल्य योगदान दे सकते हैं। इसके लिए प्रणब दा को राष्ट्रपति पद के लिए बनी अब तक की सोच को बदलना होगा। जिससे संसद के बाहर बन रहे दबाव समूहों (गैर लोकतांत्रिक संगठनों) का प्रभाव भी कम होगा, लोगों के अंदर लोकतंत्रात्मक ढ़ांचे को लेकर भरोसा भी पैदा होगा। इस बात को लेकर कांग्रेस नेतृत्व भी तैयार दिख रहा है। जो अभी तक रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों को लेकर बैकफुट पर दिख रहा है। असल में अब वक्त की भी मांग है कि राष्ट्रपति की सशक्त भूमिका को फिर से परिभाषित किया जाये, जो लोकतंत्रात्मक ढ़ांचे में बिना टकराव पैदा किये देश के लिए नई आशा का संचार करे।

अंतरराष्ट्रीय मंचों  पर भी प्रणब दा की साख बेमिसाल  है। वित्त मंत्रालय के अलावा भी सरकार को प्रणब  दा के अनुभवों से लाभ मिलता  रहता है। उनकी कूटनीति  के चलते ही आतंकवाद की पनाहगाह  बना पाकिस्तान आज उस अमेरिका  के निशाने पर है, जो कभी जिगरी  दोस्त होने का दम भरता था। रक्षामंत्री का दायित्व निभा चुके प्रणब दा की नई भूमिका सेना के उन तमाम विवादों को भी दरकिनार करने में मदद करेगी, जिसके चलते देश के इतिहार में पहली बार सेना और सरकार में तकरार की खबरें आम आदमी की जुबान पर आया। स्मृद्ध राजनीतिक अनुभवों, सामाजिक दायित्वों का अथक निर्वाह करने वाले प्रणब मुखर्जी एक लेखक की भूमिका में भी सामाजिक और राजनीतिक सरोकारों को ध्यान में रखते हैं। इस बात की गवाही प्रणब की लिखा हुई तमाम किताबें देती हैं। संवेदनशील प्रणब मुखर्जी के पूरे व्यक्तित्व को देखते हुए आशा कर सकते हैं कि राष्ट्रपति पद की गौरवशाली परिपाटी को एक नया मुकाम देंगे और ‘पीपुल्स प्रेसीडेंट’ साबित होंगे।

लेखक प्रसून शुक्ला कई चैनलों व अखबारों में वरिष्ठ पद पर रह चुके हैं. इन दिनों मैजिक टीवी के संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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