करीब 1000 हत्याएं ! 35 वर्ष ! लगभग 100 से ऊपर हमले ! सभी हमले जाति-संघर्ष की उपज ! स्थान- देश का सबसे गरीब इलाक़ा बिहार ! देश के संविधान के अनुरूप अपराध-न्याय प्रणाली अपना काम करती रही पर न हत्याएं रुकीं न यह पता लगा कि गलती कहां हुई है। सिलसिला शुरू होता है बेल्छी कांड में 14 दलितों की हत्या से। जाति-आधारित सेनाएं बनती हैं और लोग खून के प्यासे हो जाते हैं। हरबर्ट वेसलर ने कहा था कि दंडात्मक कानून व्यक्ति के जीवन को नियंत्रित करने के लिए सबसे बड़ी ताकत माना जाता है लेकिन जहां एक ओर यह समाज की सुरक्षा का सबसे बेहतरीन उपकरण हो सकता है वहीं समाज को नष्ट करने की भी एक बड़ी ताकत हो सकता है। समूचे कानूनी क्षेत्र में व्यक्ति या समाज के सृजन या विध्वंस के लिए इससे बड़ा उपादान नहीं हो सकता। इन्हीं सब को देखते हुए न्यायविद फाली.एस नरीमन ने अपराध न्याय प्रणाली को सुधारने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था- शायद यह आखिरी बस है जिसको अगर हम नहीं पकड़ सके तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा।
भारत में प्रचलित अपराध-न्याय-प्रणाली विरोधात्मक(एडवरसेरियल) सिद्धान्त पर आधारित है। इसकी खामियों पर भारत के राष्ट्रपति डॉ. वेंकटरमण ने कहा था- “विरोधात्मक पद्धति भारत के मूल चरित्र के खिलाफ है। जहां पंचायत न्याय सत्य तक पहुंच जाता था जबकि विरोधात्मक पद्घति में जज सत्य तक नहीं पहुंचता बल्कि केवल यह फैसला करता है कि अभियोजन आरोप को सिद्ध करने में सफल रहा या नहीं। जज की चिंता यह नहीं है कि सत्य क्या है, उसकी चिंता यह है कि साक्ष्य क्या हैं। नतीजा यह होता है कि वो लोग जो जानते हैं कि आरोपी को अदालत ने छोड़ दिया है लेकिन दरअसल वही असली अपराधी है, उनका प्रणाली से विश्वास उठ जाता है”। सुप्रीम कोर्ट ने रामचन्द्र बनाम हरियाणा में कहा था- “यह दुर्भाग्यपूर्ण आदत बनती जा रही है कि जज, रेफरी या अंपायर की भूमिका निभाने लगता है और अभियोजन और बचाव पक्ष एक-दूसरे से उलझते हुए पूरी प्रक्रिया को दूषित कर देते हैं।
बथानी टोला या इसके पहले के तमाम सामूहिक हत्याओं में बरी करने का आधार था- “साक्ष्य का अभाव”। 22 मामलों में 277 स्त्री-पुरुष-बच्चों की हत्या लेकिन समय के साथ 16 मामलों में अभियुक्त साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए। प्रश्न यह उठता है कि क्या भारतीय अपराध-न्याय-प्रणाली से 277 लोगों के यतीम बच्चे या परिवार यह नहीं पूछेंगे कि रात में सोते समय मेरे बाप को, मेरे बच्चे को, मेरी मां को किसने मारा ? क्या इन प्रश्न के जवाब न आने पर व्यापक समाज का न्याय-प्रणाली से विश्वास नहीं उठेगा और तब क्या रक्तबीज की तरह एक वर्ग पैदा नहीं होगा जो हथियार उठाएगा और कहेगा- तुम साक्ष्य की पुख्तगी देखो और हम प्रतिशोध देखेंगे।
ठीक उसी तरह नाधी, भोजपुर में जब माले ने उच्च-जाति के लोगों पर हमला करके आठ लोगों को 1996 में मारा तो क्या उनके बच्चे यह नहीं पूछेंगे कि उच्च-जाति में पैदा होने का क्या यह खामियाजा होता है? अगर एक तरफ बथानीटोला, हैबासपुर, इकबारी, खदासीन, लक्ष्मणपुर बाथे, नगरी, शंकरविभा, नारायणपुर, सेन्दानी में एक जाति-विशेष के लोगों की सैकड़ों हत्याएं हुयीं वहीं नाधी, चौराम, उसरीबाज़ार, सेनारी, अफसार में कुछ अन्य उंची-जाति के लोगों की निर्मम हत्याएं हुयीं। 1977 से चलने वाला यह सिलसिला एक मकाम पर निजी सेनाओं के रूप में तब्दील हुआ। न्याय-प्रकिया सत्यमेव जयते के शीर्ष वचन को अक्षरश: आत्मसात करती हुयी निर्विकार भाव में सब कुछ देखती रही।
प्रश्न यह भी नहीं है कि किसी मुखिया या किसी सेना ने मारा या किसी जाति-विशेष के लोगों को पहले तथाकथित क्रांतिकारी हथियारबंद लोगों ने मारा और जिसके फलस्वरूप वह जाति-समूह ने एकत्रित होकर प्रतिशोध लिया। प्रश्न यह भी नहीं है कि ज़मीनदारों के शोषण का जवाब हथियार से लैस गोलबंद होकर हत्याएं करना सही है या ग़लत ? मुख्य प्रश्न यह है कि क्या “हम भारत के लोग…, हमारा संविधान, हमारी व्यवस्था और व्यवस्थापक यह सब कुछ देखते रहेंगे महज यह कह कर कि ज़मीनदार शोषण करता है, नक्सली हथियार उठाता है, प्रतिक्रिया में रणवीर सेना बनती है, हत्या-दर-हत्या होती है और अंत में वही व्यवस्थापक न नक्सली को रोक पाता है न रणवीर सेना के खिलाफ साक्ष्य जुटा पाता है और अंत में एक ब्रह्मेश्वर मुखिया और मार दिया जाता है और इस तरह से फिर शुरू होती है जातीय-संघर्ष की एक नई श्रृंखला”। बाड़ा में 37 ऊंची जाति के लोगों की हत्या होती है तब पता लगता है यह नरसंहार नक्सलियों ने किया है। कुछ ही दिन बाद लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार होता है तब पता चलता है कि उच्च-जाति(भूमिहार) की रणवीर सेना ने 58 दलितों को मारा। लगता है पिछले दो दशक से क्रिकेट मैच में रन स्कोर करने के भाव में दोनों खेल रहे हैं। बंटा हुआ समाज या तो इस तरफ ताली बजाता है या उस तरफ। अपराध-न्याय-प्रणाली ही नहीं बल्कि समूचा सिस्टम अंपायर का काम कर रहा है और सिर्फ यह बता रहा है कि कब चौका लगा, कब छक्का और कभी-कभी मामले को थर्ड-अंपायर को भेज दे रहा है।
प्रशासनिक सुधार आयोग की दूसरी रिपोर्ट के पेज नं 33 पर आयोग ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि 1961 में जहां सजा की दर 64.8 प्रतिशत थी वहीं 2005 तक आते-आते यह घट कर 42.4 प्रतिशत हो गयी। ऊपर से तुर्रा यह कि आपराधिक मामलों में चार्जशीट का प्रतिशत इसी काल में 53.6 से बढ़कर 81 प्रतिशत हो गया। क्या यह समझा जाए कि अभियोजन में गुणात्मक गिरावट हुयी है या फिर यह समझा जाए कि फैसलों की गुणवत्ता में बड़ा परिवर्तन हुआ है ? ब्रिटिश न्यायविद जर्मी बेन्थम ने आज से 170 साल पहले कहा था कि “अगर सभी वर्ग के अपराधी एक जगह इकट्ठा होकर अपनी सुविधा एवं अपनी इच्छा से एक व्यवस्था विकसित करें तो क्या यह सही नहीं है कि जो सबसे पहला कानून वो बनाएंगे वह अपनी सुरक्षा का बनाएंगे और क्या यह सच नहीं है कि निर्दोष इसका कभी भी लाभ नहीं ले पाएगा।
कहीं भारत में ऐसा ही तो नहीं हो रहा है ? एक आम धारणा पनपती जा रही है कि अपराध-न्याय-प्रणाली राज्य का एकाधिकार है जिसमें अपराध का शिकार व्यक्ति पूरी प्रक्रिया में मूकदर्शक बन एक छोटी सी कड़ी के रूप में रहता है क्योंकि राज्य से पलट कर यह नहीं पूछा जा सकता है कि दोनो पक्षों से जो सैकड़ों लोग मरे उन्हें मारा किसने और उन्हें सज़ा कौन देगा ? न्यायविद नरीमन ने अपनी किताब ‘भारत की न्याय-व्यवस्था: क्या इसे बचाया जा सकता है ?’ में लिखा है- “एक आम धारणा बनती जा रही है कि अपराध करो कुछ नहीं होगा। बढ़ते हुए अपराध से एक यह भी भाव आया है कि आपराधिक गतिविधियों से जबर्दस्त रिटर्न मिल रहा है और रिस्क बहुत कम है”। फाली ने आगे कहा है कि “भारत में अपराध-न्याय-पद्धति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रायल जज के लिए सत्य को पहचानने के प्रति ललक नहीं है। उपादान(टूल्स) हैं लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं किया जाता”। उन्होंने आगे कहा कि दण्ड-प्रकिया-संहिता(सी.आर.पी.सी) की धारा 311 में यह प्रावधान है कि अदालत जांच, ट्रायल या कार्यवाही के दौरान किसी भी व्यक्ति को गवाही के लिए बुला सकती है। पूरे देश में व्यावहारिक रूप में कोई ट्रायल मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायाधीश नहीं है जो अपनी तरफ से किसी गवाह को बुलाता हो। इस काम की जिम्मेदारी वह अभियोजन पर पूरी तरह से छोड़ देता है और नतीज़ा यह होता है कि अगर अभियोजन ने मुख्य गवाहों को पेश नहीं किया तब आरोपी छूट जाता है।
क्या ऐसा ही बिहार के जाति-संघर्ष के फैसलों में नहीं हुआ है ? क्या अदालत के फैसलों में यह कमी नहीं रही है? आज देश के सभी हाईकोर्टों में करीब 42 लाख मुकदमे लंबित हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय में करीब 55 हज़ार। निचली अदालतों की स्थिति और बुरी है जहां करीब दो करोड़ 80 लाख मामले लंबित हैं। जबकि निचली अदालतों की क्षमता हर साल मात्र 16 लाख केस निपटाने की है। यही वजह है कि आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के एक जज की मशहूर टिप्पणी है कि- “अगर भारतीय न्यायपालिका सभी लंबित और रोज़ आने वाले मामलों को निपटाना शुरू करें तब उसे 320 साल लग जाएंगे”।
भारतीय अपराध-न्याय-पद्धति अभियोजकीय (एक्यूज़िटोरियल) एवं विरोधात्मक (एडवरसेरियल) सिद्धान्त पर आधारित है जिसमें अभियोजन पक्ष व बचाव पक्ष एक-दूसरे को चुनौती देते हैं जबकि अपराध से पीड़ित व्यक्ति अगर ज़िंदा है तब एक मूकदर्शक के भाव में देखता है और अगर मर गया है तब उसके परिजन महज गवाह की भूमिका में रहते हैं और दूसरी ओर अदालत तटस्थ अंपायर के हिसाब से देखता है। फ्रांस, जर्मनी, इटली सहित कई देशों में जिज्ञासात्मक सिद्धान्त पर अपराध-न्याय-प्रक्रिया आधारित की गयी है जिसमें स्वयं जज ही इस बात का पता करता है कि अपराधी कौन है और इसके लिए वह स्वयं जांच करता है और स्वयं ही फैसला करता है। उसे यह कहने का कोई आधार नहीं होता कि साक्ष्य के अभाव में आरोपी को छोड़ा जा रहा है। अगर यह भाव देश की अदालतों में आ जाए तब यह पता चल सकता है कि बिहार के बाड़ा में ऊंची जाति को मारा गया हो या बथानी टोला में नीची जातियों को, अपराधी कौन है ?
वरिष्ठ पत्रकार और साधना न्यूज के एडिटर इन चीफ एनके सिंह का विश्लेषण.


