कांग्रेस और उसके सिपहसालारों को आखिर हो क्या गया है? इनके मोहरे लगातार पिट क्यों रहे हैं? इनकी चालें उल्टी-सीधी क्यों हो रही हैं? कहीं रिटायरमेंट की दहलीज तक तो ये नहीं आ गये हैं? ये ऐसे कुछ सवाल है जिस पर पार्टी के भीतर मंथन चल रहा है। उसके बाद इन्हें ठिकाने लगाने की कवायद शुरू हो जाएगी। हालांकि इसको लेकर पार्टी में बेचैनी है क्योंकि कांग्रेस हाईकमान का साफ कहना है कि कोई भी कितना ही कद्दावर क्यों न हो, स्केल पर फिट नहीं बैठे तो उन्हें जाना होगा। इसलिए देर-सवेर किसी बडे़ नेता के साइडलाइन की खबर मिले तो चौकियेगा मत। कांग्रेस ने ऐसे नेताओं की लिस्ट तैयार कर ली है और उन्हें संगठन की जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी में है। पार्टी का साफ मानना है कि अब अगर और देर की तो फिर उठ पाना मुश्किल होगा। कांग्रेस हाईकमान पार्टी के गिरते ग्राफ को लेकर काफी चिंतित है क्योंकि उसे लगने लगा है कि उसके प्रति जनता का विश्वास पिछले कुछ महीनों में तेजी से कम हुआ है।
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावी नतीजों से भी इस बात की तस्दीक हो चुकी है। इसलिए कांग्रेस अब समय गंवाने के मूड में नहीं है। वह इमेज सुधारो अभियान में जुट गयी है। माना जा रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार और अपने संगठन में भारी फेरबदल करेगी। इसके तहत अब चेहरा देखकर नहीं काम देखकर जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। कई ऐसे बडे़ नामों पर चर्चा चल रही है जिसके बारे में आप और हम कभी सोच भी नहीं सकते। इसबार पार्टी का नजरिया साफ है और वह रत्तीभर पुनर्विचार के मूड में नहीं है। कहा जा रहा है कि पार्टी हाईकमान हर उन फैसलों पर गौर कर रही है जिस वजह से पार्टी का ग्राफ (जनाधार) गिरा है। इनमें अन्ना आंदोलन प्रमुख रूप से शामिल है। पार्टी का साफ कहना है कि शुरुआत में बेवजह कड़ाई की गयी जिसकी सहानुभूति आंदोलनकारियों को मिल गयी और सरकार का इमेज विलेन वाला बन गया।
याद रहे कि उस समय कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी अपने इलाज के सिलसिले में देश से बाहर थी और उस दौरान इस आंदोलन को दबाने की पूरी कमान मौजूदा दो केंद्रीय मंत्रियों के हाथों में थी। इन्होंने तब क्या किया यह किसी से छिपा नहीं है। दो कदम आगे बढ़ाकर चार कदम पीछे हटना या दूसरे शब्दों में यह कहें कि अपने ही फैसले को 24 घंटे के भीतर पलटना इनकी जरूरत बन गयी थी। कमोवेश योगगुरु रामदेव के आंदोलन के दौरान हुई पुलिसिया कार्रवाई को भी इसी नजरिये से देखा जा रहा है। हालांकि पार्टी के भीतर इस बात पर सहमति है कि जिस तरह भड़काऊ भाषण रामदेव के मंच से दिये जा रहे थे उससे पार्टी की फजीहत हो ही रही थी लेकिन कार्रवाई के तरीके पर आपत्ति जरूर है।
इसी तरह पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव विशेषकर उत्तर प्रदेश चुनाव में पार्टी के भीतर की गुटबाजी को भी नहीं भुलाया गया है। उस दौरान कैबिनेट मंत्रियों ने ताबड़तोड़ बयान जारी किये, जिसमें ढेरों बयान एक दूसरे के खिलाफ थे। अपसी खींचतान में किसी ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जिसको जितनी बन पायी उतनी एक-दूसरे को काटने की कोशिश की। इन बातों पर भी पार्टी हाईकमान की नजर है और इसका असर हाल फिलहाल में देखने को मिलने की पूरी संभावना है। हालांकि ये तो पुरानी गलतियां है लेकिन जानकारों की मानें तो कांग्रेस का आत्मघाती कदम अभी भी जारी है। सरकार बचाने के लिए उसे जिस तरह पापड़ बेलने पड़ रहे हैं उससे भी उसके इमेज को काफी धक्का लगा है। कन्नौज लोकसभी सीट से सपा को वाकओवर को इसी नजरिये से देखा जा रहा है। जनता के बीच इसका मैसेज कहीं से भी अच्छा नहीं गया।
जनता समझ नहीं पा रही कि क्या उत्तर प्रदेश के विरोधी दल सत्ताधारी सपा से इतनी घबरा गयी कि मुख्यमंत्री की पत्नी डिम्पल के खिलाफ उम्मीदवार तक उतारने का साहस नहीं जुटा पायी? या अगर ऐसा नहीं तो क्या सेटिंग हुई, जनता को समझ नहीं आ रहा है। वह जानना चाहती है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी दिल्ली में अपनी सरकार चलाने के लिए सपा के एहसान का बदला कन्नौज में चुका रही है। बसपा के बारे में कहा जा रहा है कि उसने इसलिए प्रत्याशी खडे़ नही़ किये क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे बसपा के नेता मुख्यमंत्री की दया चाहते हैं।
इसके अलावा आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर के बेटे जगनमोहन रेड्डी के खिलाफ जिस तरह से केंद्र सरकार ने सीबीआई को छोड़ रखा है उससे भी कांग्रेस की फजीहत हो रही है। कहा जा रहा है कि आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई उससे पूछताछ कर रही है लेकिन वहां की जनता को कांग्रेस के तर्क पर विश्वास नहीं हो रहा है। उसका कहना है कि जब उसके पिता कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे तब आखिर क्यों नहीं इस तरह के सवाल उठाये गये। क्या उनकी मौत के बाद ही इसने (जगन) सम्मत्ति अर्जित की। कहा जा रहा है कि जगन के प्रति सहानुमुभूति लहर चल पड़ी है जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पडे़गा। जगन की पार्टी ने भी उपचुनाव में जोरदार प्रदर्शन करके इसे साबित भी कर दिया है। जगन समर्थक इस बात को भी जोर-शोर से उठा रहे हैं कि चारा घोटाले के उजागर हुए 18 साल से ऊपर हो चुका है और लालू यादव के खिलाफ चार्जशीट तक दाखिल हो गया लेकिन सीबीआई और सरकार कदम नहीं बढ़ा रही है। इसी तरह आय से अधिक संपत्ति के मामले में मुलायम सिंह पर भी सालों से मुकदमा चल रहा है और इस मामले को भी केंद्र सरकार (कांग्रेस) ठंडे बस्ते में डाले हुए है। आखिर क्या मजबूरी है। जनता को भी अब लगने लगा है कि सरकार निष्पक्ष नहीं है।
यह एक बडा सवाल है जिसका जवाब ढूंढना होगा क्योंकि यह पार्टी के लिए परेशानी का सबसे बड़ा कारण बन सकती है। इसका असर देश के साथ-साथ वैश्विक पटल पर भी झलकने लगा है। ऐसे ढुलमुल फैसलों से सरकार व कांग्रेस की खूब किरकिरी हो रही है। भारत की रेटिंग घटाने की चेतावनी दी जा रही है। ग्लोबल रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्स एंड पुअर्स ने भी चेतावनी दे डाली है कि वह भारत की क्रेडिट रेटिंग को कमतर कर सकती है। रेटिंग एजेंसी के
मुताबिक आर्थिक सुधारों की जो राजनीतिक बाधा है, उसकी असली वजह केंद्र सरकार के भीतर है न कि काबू से बाहर सहयोगी दलों और असहयोगी विपक्ष के कारण। आर्थिक नीतियों पर कांग्रेस पार्टी खुद बंटी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास काफी राजनीतिक ताकत है लेकिन वह कैबिनेट में नहीं है जबकि सरकार की अगुवायी मनमोहन सिंह कर रहे हैं जिनका जनाधार नहीं है। इन दोनों की भूमिकाओं के बंटवारे की नीति बनाने में कमजोरी पैदा की है। प्रधानमंत्री अकसर मंत्रियों को समझा नहीं पाते हैं और अपनी पसंद के आर्थिक सुधारों को आगे नहीं बढ़ा पाते हैं।
लेखक कुमार समीर पिछले दो दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक में समान पकड़ रखने वाले कुमार समीर सहारा समेत कई बड़े संस्थानों के हिस्सा रह चुके हैं.


