: मत भूलिए, जनता सब देख रही है : कभी उत्तम प्रदेश तो कभी उल्टा प्रदेश…। देश के सबसे बड़े प्रांत का दर्जा रखने और देश की राजनीति को दिशा देने वाले यूपी का देखो तो नेताओं ने क्या हश्र कर दिया। कन्नौज में हुए संसदीय उपचुनाव में समूचे विपक्ष ने नतमस्तक होकर नया इतिहास रच दिया। विपक्षी दल इस कदर कमजोर कि वहां अपना प्रत्याशी तक नहीं उतार सके। सीएम अखिलेश यादव की पत्नी व सपा मुखिया मुलायम सिंह की पुत्रवधू डिंपल के आगे सारे विपक्षी दल के नेताओं ने जिस तरीके घुटने टेक दिए, वह चौंकाने वाला कम और चिंतित करने वाला ज्यादा है। विपक्षी राजनीतिक दलों की इस नीति और नीयत के क्या मायने लगाए जाएं। यह चुनाव महत्वपूर्ण इसलिए भी था, कि विधानसभा चुनाव के चार महीने बाद हो रहा था। इसके अलावा करीब डेढ़ साल बाद लोकसभा चुनाव भी होने वाला है।
विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित होने वाले कांग्रेस, भाजपा, बसपा सरीखे विपक्षी दलों की हैसियत का अंदाजा तो लगता। पर यह क्या, विपक्ष तो पहले ही मैदान छोड़कर भाग निकला। विपक्ष के राजनीतिक धर्म का निर्वाह तक नहीं कर सके। मैदान में उतरने की बजाए पहले ही पराजय स्वीकार कर ली। यह राजनीति का दोगलापन है, या अपनी-अपनी फंसी गोट को चुपचाप बाहर निकालने की चतुराई। काहे कि कांग्रेस को केंद्र में सपा का समर्थन
चाहिए तो घोटालों में आकंठ डूबी बसपा को जांच में राहत की दरकार है। उधर, भाजपा के कुछ बड़े नेताओं के मलायम सिंह के साथ मधुर रिश्ते…। क्या यह वही यूपी है, जहां सत्ता पक्ष से ज्यादा विपक्ष महत्वपूर्ण हुआ करता था? तगड़े विपक्ष के बीच चलती थी सरकार। लोकसभा और विधानसभा में विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका दिखा भी करती थी। तर्क और बहसों के बल पर घंटों हगामा होता। सरकार को जवाब नहीं सूझता था। सदन में हंगामा तो अब भी होता है पर उस तरह तर्क और बहस के बल पर नहीं बल्कि लात-घूंसा और माइक के आपसी हमलों से। सवाल उठता है, तो क्या यूपी में सपा सरकार विपक्ष विहीन होगी? विपक्षी दल सिर्फ कहने भर के लिए रह जाएंगे? कहां है विपक्षी धर्म और उनकी महत्वपूर्ण भूमिका। मत भूलिए, जनता सब देख रही है। आने वाले समय में चुपचाप अपना निर्णय सुना देने में कतई नहीं हिचकती।
लेखक शिवाशंकर पांडेय इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत कई संस्थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.


