: बनारस में बदहाल है पर्यटन : जापान से पर्यटक भेजने वाली सबसे बड़ी ट्रैवेल एजेंसी सराय इंक के प्रमुख नाकामूरा बहुत परेशान हैं। उन्हें काशी पहुंचे अपने तीन जापानी पर्यटक दम्पति को टिकाना है, लेकिन दिक्कत यह है कि इन तीनों नवविवाहित दम्पत्तियों को दो कमरों में कैसे टिकाया जाए। लेकिन यह परेशानी केवल नाकामूरा की ही नहीं है, बल्कि यह आईना है यूपी में पर्यटन की बदहाली का। खासकर देश की धार्मिक राजधानी वाराणसी में। अखिलेश यादव सरकार अब पर्यटन के विकास के लिए अब मथुरा-वृंदावन को विकसित करने की बात कर रही है। इससे पर्यटन क्षेत्र के प्रबंधक चिंतित हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में छुटपुट पर्यटक ही आते हैं। वरिष्ठ गाइड डॉक्टर शैलेष त्रिपाठी के अनुसार हाल ही स्विसलैंड की एक विश्वस्तरीय पत्रिका में दुनिया के जिन पांच सौ पर्यटन-स्थलों का जिक्र किया गया है, काशी इसमें पांचवें पायदान पर है। जबकि डॉक्टर अजय सिंह के मुताबिक काशी पहुंचने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या हर साल दस की फीसदी से ज्यादा बढ़ रही है, लेकिन पर्यटन बदहाल है। पिछले सात साल से यहां एक भी नया होटल नहीं बन सका।
यूपी के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने सोमवार को कई विभागों के अफसरों की बैठक की थी। लेकिन इस बैठक में बातचीत यूपी के पर्यटन नक्शे में मथुरा-वृंदान के सौंदर्यीकरण तक ही सिमट गयी, सरकार की प्रतिबद्धता की कमी के चलते काशी फिर सूनी रही। हैरत बात की बात है कि सपा-सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने पिछली अपनी सरकार में पूर्वांचल और उसमें भी खासतौर पर वाराणसी के लिए एक खासा फंड बनाया था। यह और बात है कि यह फंड कभी भी किसी मतलब के इस्तेमाल नहीं हो पाया। वीडीए के प्रमुख रहे हिमांशु कुमार और मुख्य वास्तुविद ने काशी के लिए सन 06 में दिल्ली की तर्ज पर मेट्रो चलाने की प्राथमिक रिपोर्ट तैयार की थी, लेकिन सत्ता शीर्ष ने न जाने क्यों उसे रद्दी में डाल दिया। वाराणसी की कई प्रमुख सड़कों पर यातायात की स्पीड ढाई-तीन किलोमीटर प्रतिघंटा से भी कम है। सफाई और पर्यावरण का तो इस शहर से बरसों से नाता टूट चुका है।
अस्सी नदी पहले नाले में बदली और अब वह पटकर नाली बन गयी है। यही हाल वरूणा नदी का है। करीब आधा दर्जन साधु-मुनि और तपस्वियों द्वारा किये जा रहे अन्न-जल त्यागने के आंदोलन से गंगा नदी की हाल जगजाहिर कर दिया है। अरबों की रकम से अफसरों ने जिन पर्यटन स्थल और हाट जैसी योजनाएं बनायीं, वहां अब मवेशी सुस्ताते हैं। नये काशी के नाम पर योजनाएं भी भूमि-माफियाओं और नेताओं के गठजोड़ की नजर हो गयी। काशी को सुधारने-विकसित करने वाले किसी भी योजना पर पिछली सपा सरकार के दौरान काम नहीं किया गया। बाद की बसपा सरकार ने पांच साल में बस दो फ्लाईओवर का तोहफा जरूर दिया। लेकिन बाद की अखिलेश यादव सरकार ने फिर को काशी पर सुधि नहीं ली। पूर्वांचल फंड अब कहां है, किसी को नहीं पता।
जावेद उस्मानी का कहना है कि अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कुशीनगर और बौद्ध परिपथ से सटे अन्य पर्यटन स्थलों का विकास कराया जाएगा, जबकि एक
प्रमुख पर्यटन प्रबंधक एसके सिंह का सवाल है कि देश के इस सर्वश्रेष्ठ काशी का नाम सरकार कभी क्यों नहीं ले रही है। मथुरा-वृन्दावन-गोवर्धन क्षेत्र तो मौसमी पर्यटन क्षेत्र है, जबकि काशी सदाबहार होने के बावजूद सर्वाधिक उपेक्षित और बदहाल है। वह भी तब, जबकि देश में पर्यटन से सर्वाधिक विदेशी मुद्रा कमाता है काशी। किसी भी बनारसी से पूछ लीजिए कि काशी को अब तक सरकारों ने क्या दिया है, हर शख्स जवाब देगा: सिर्फ घंटा।
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.


