राहत इंदौरी की लिखी पंक्तियां हैं- ‘मेरी निगाह में वो शख्स आदमी ही नहीं, जिसे लगा है जमाना खुदा बनाने में। ’ इंदौरी साहब ने ना जाने किसका ख्याल कर ये शेर लिखा था, लेकिन उनके ये अलफाज आज मायने हासिल कर रहे हैं। तरक्की की राह में अपना मुकाम तलाश रहे इस देश में अनगिनत बाबा पैदा हो गए हैं जो सब-कुछ ठीक कर देने के दावे बढ़-चढ़ कर करते हैं। कुछ समय पहले कमाई का एक बड़ा जरिया बने निर्मल बाबा शायद अब टीवी चैनलों के लिए किसी काम के नहीं। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया पर निर्मल बाबा अध्याय के कमज़ोर पड़ने का मतलब यह नहीं है, कि चैनलों को अपने किए पर अफसोस हो रहा है और वे अब सुधर गए हैं।
बीती रात अलग-अलग चैनलों पर नजर डाली, तो सब जगह कुछ न कुछ बिक रहा था। एक बड़ा चैनल विनय बजरंगी की भाग्य संहिता बेच रहा था, जिसके जरिए जिंदगी खुशहाल होने की सौ फीसदी गारंटी दी जा रही थी। शादी नहीं हो रही, तो हो जाएगी; बच्चे नहीं हो रहे तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं, भाग्य संहिता गोद भर देगी; जो छात्र परीक्षा में बार-बार फेल हो रहे हैं, वे पास हो जाएंगे। चोरी गया माल भी भाग्य संहिता की मदद से वापस आ जाता है; बिजनेस का घाटा फायदे में तब्दील होना तो तय है! अब किसकी मजाल, जो विनय बजरंगी की संहिता ना खरीदे!
एक दूसरे चैनल पर बॉलीवुड की एक कलाकार कश्मीरा शाह ‘पावर प्राश’ का नगाड़ा बजाती नजर आईं। जिस्म की नुमाइश करने वाले लिबास में कश्मीरा ‘पावर प्राश’ की तारीफों के पुल बांध कर रख देती हैं। आधे घंटे के विज्ञापन में बताया जाता है, कि देश में नपुंसकता बहुत बड़ी समस्या है, जिसे मिटाने के लिए ‘पावर प्राश’ से बेहतर कोई दवा नहीं; और ना जाने कितने लोग इसके इस्तेमाल से खुशहाल शादीशुदा जिंदगी बिता रहे हैं। भारत की जनसंख्या बढ़ रही है, उसे देख कर तो नहीं लगता कि नपुंसकता देश के लिए बड़ी परेशानी का सबब है! और अगर यह इतनी जबरदस्त दवा है, तो इसके प्रचार में लाखों-करोड़ों फूंकने की क्या जरूरत है? इस विज्ञापन के दावों में भी काफी विरोधाभास है। एक तरफ तो इसे सात सौ साल पुराना नुस्खा बताया जाता है, तो दूसरी तरफ, सबसे बड़ा शोध और आविष्कार। जाहिर है कि दोनों में से कोई एक ही बात सही हो सकती है। लेकिन जब सोचना मना हो तो इस पर भी सोचने की क्या जरूरत!
इसी तरह बॉलीवुड में अपनी पारी खेल चुके दो अदाकार, गोविंदा और जैकी श्रॉफ के कमजोर कंधों पर ‘संधि सुधा’ के प्रचार का जिम्मा है। इसके विज्ञापन में इस बात का खूब शोर मचाया जाता है कि जोड़ों और कमजोर हड्डी से जुड़ी तकलीफों के लिए ‘संधि सुधा’ रामबाण है। अस्सी और नब्बे साल के उन बुज़ुर्गों से भी मिलवाया जाता है, जो पहले चलने से लाचार थे। वे अब इस दवा के इस्तेमाल से चुस्ती में जवानों को भी मात दे रहे हैं। एक और चैनल रात साढ़े ग्यारह बजे से ही ऐसे भ्रामक विज्ञापनों का प्रसारण शुरू कर देता है। शुरुआती आधा घंटा उन अंत:वस्त्रों के लिए तय है जिसे पहनने के बाद शरीर की बनावट में चमत्कारिक बदलाव होता है। विज्ञापन में दिखाई गई महिलाओं का आत्मविश्वास इसे पहनते ही बढ़ जाता है।
दरअसल इन चैनलों में काम करने वाले लोगों को ऐसे उत्पादों की असलियत पता होती है। उनके परिवार वाले इनके ग्राहक नहीं बनते, लेकिन लाखों लोग ऐसे हैं, जो ऐसे प्रचार से खूब प्रभावित होते हैं और अपने कम से कम कुछ हजार रुपए इनमें जरूर फूंक देते हैं। बाद में परिणाम नहीं मिलता तो
उन्हें पछतावा होता है। इस मामले में प्रिंट मीडिया भी पीछे नहीं है। मसाज पार्लर, करिश्माई बाबा, फोन-फ्रेंड, अनोखे कारोबार और ना जाने क्या-क्या। पता नहीं कितने लोग फंसते हैं इस भंवरजाल में। कुछ तो अपना सब-कुछ लुटा बैठते हैं। बेशक कुछ मीडिया संस्थान आज भी सरोकारों से परे नहीं हैं। लेकिन लाखों की कमाई के लिए ज्यादातर चैनल और अखबार जनता के करोड़ों-अरबों रुपए बर्बाद करवा रहे हैं। सरोकार और ईमानदारी की बात करने वाले अधिकारी टाइप पत्रकारों की अधखुली आंखों में नोटों की खुमारी रहती है। कंपनी को मुनाफा देना उनकी मजबूरी है और व्यापार में कुछ भी बुरा नहीं। सारी दुनिया में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की नींव पर खड़ी बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं दम तोड़ रही हैं। भारत में भी आसार अच्छे नहीं हैं। लेकिन यहां उप्भोक्तावाद चरम पर है और इसे इस हद तक लाने में गैर-जिम्मेदार खबरिया चैनलों सहित समूचे मीडिया का बड़ा हाथ है।
लेखक शोऐब अहमद खान श्रीएस7 न्यूज चैनल में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. वे ईटीवी, जनसंदेश, महुआ न्यूज लाइन को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनका यह लेख जनसत्ता में भी प्रकाशित हो चुका है.


