देश का दूसरा सबसे बड़ा समुदाय भी आरक्षण के लिए उठ खड़ा हुआ है. उसे भी आरक्षण नामक बैसाखी चाहिए. मुसलमान भारत का दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक वर्ग है. लेकिन आजादी के बाद ६५ सालों तक देश की आजादी में “महान योगदान’ देने वाली कांग्रेस ने उन्हें अल्पसंख्यक होने का झुनझुना पकडाए रखा और उन्हीं के दम पर उसे सत्ता की मलाई मिलती रही. मुसलमान भी जज़्बात के दरिया में गोते लगाते रहे. कांग्रेस ने भी उन्हें कभी इस्लाम को खतरे में होने का डर दिखाया तो कभी उर्दू ज़ुबान को खतरे में डाला. मुसलमान जज्बाती होते रहे और इस्लाम और उर्दू को बचाने में ही अपनी सारी ताक़त झोंकते रहे. जब देश की दूसरी सारी कौमें स्कूल और कॉलेजों में अपने बच्चों को भेजने में लगी थीं, तब मुसलमान कांग्रेस के दिए झुनझुने बजाने में लगे थे.
आजादी के बाद नब्बे फीसद पढ़ा लिखा मुसलमान तो पाकिस्तान चला गया. जो दस फीसद बचा उसके सामने अपनी पहचान का संकट खड़ा था. बाक़ी बचा मुस्लिम वर्ग जिसे पाकिस्तान से कोई मतलब नहीं था और उसके लिए अपनी रोटी का इंतज़ाम करना ही मुख्य उद्देश्य था. यह तबका अनपढ़ था और राजनैतिक चेतना से भी शून्य था. कांग्रेस ने इसी का फायदा उठाया और इसकी भावनाओं का जमकर दोहन किया. इस वर्ग के लिए पढ़ाई का मतलब मदरसे में जाकर थोड़ी उर्दू और थोड़ी सी अरबी पढ़ लेना था और उसके बाद मजदूरी करना था. लेकिन सन अस्सी और नब्बे के दशक में भारतीय जनता पार्टी के उदय और हिंदुत्व के उभार ने मुसलमानों में भी चेतना का संचार किया. जब भाजपा ने हिंदुत्व का नारा दिया तो मुसलमान जागा. इससे पहले मुसलमान अपने आप में ही सिमटा हुआ था और तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के खोल में बैठा हुआ अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रहा था. लेकिन जब इस तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की पोल खुली तो उसने अपने आप को ठगा पाया.
बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले ने उसे सोचने पर मजबूर किया. उस विवाद का सबसे ज्यादा नुकसान उसे ही उठाना पड़ा. जगह-जगह हुए दंगों ने मुसलमानों को हिला कर रख दिया. इस दौरान मुसलमानों में भी कई राजनैतिक दुकानें खुली. उसने सबको देखा और परखा. मौलाना बुखारी, ज़फरयाब जिलानी और शहाबुद्दीन जैसे कई नेता उठ खड़े हुए. जिन्होंने जमकर सियासी रोटियाँ सेंकी. लेकिन आम मुसलमान की हालत वैसी ही रही. कांग्रेस ने अब उसे एक नया झुनझुना पकड़ा दिया. भाजपा और संघ के हव्वे का. डरता मुसलमान एक बार फिर कांग्रेस के साथ हो गया. लेकिन जब केंद्र में वाजपेयी सरकार बनी और पांच सालों में कहीं कोई साम्प्रदायिक नजरिया देखने में नहीं आया तो देश का मुसलमान सोचने पर मजबूर हुआ और उसके कई नेताओं ने एक ही पार्टी का वोट बैंक बने रहने की नीति को नकार दिया. उन्हें लगने लगा की ज़माने के साथ चलना ही अक़लमंदी है.
जैसे जैसे ये चेतना मुसलमानों में आती गयी वैसे वैसे उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ भी बढ़ने लगी. केंद्र में डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार बनने के बाद जागृत हुए मुसलमानों को फिर से चारा फेंका गया और सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट्स को संसद पटल पेश किया गया. जिनमें भारत के मुसलमानों की हालत को दलितों से भी बदतर बताया गया था और उन्हें आबादी के हिसाब से आरक्षण देने की बात कही गयी थी. बस यहीं से फिर एक नया झुनझुना पकडाया जाने लगा. अब मुसलमानों का मकसद ज़माने के साथ चलकर तरक्की करना नहीं बल्कि येन-केन आरक्षण हासिल करना था. नयी दुकानें खुलने लगी और कांग्रेस को भी इस नए खेल में मज़ा आने लगा. चूँकि भाजपा धर्म के आधार पर आरक्षण देने के खिलाफ रही तो कांग्रेस के पास भी मुसलमानों को अपने से छिटकने नहीं देने का हथियार आ गया और उसने फिर से सियासी दांवपेंच शुरू कर दिए. कुछ समय पहले ही उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में मुसलमानों को आरक्षण देने के बड़े-बड़े वादे होने लगे और एक नेता ने तो अपने मुस्लिम होने की दुहाई देकर और आरक्षण दिला ही देने की बात कह कर अपनी बेगम के लिए वोट मांगे. लेकिन शायद मुसलमानों के तथाकथित हिमायती लोग ये भूल गए कि अब मुसलमानों की वैसी स्थिति नहीं रही कि किसी मौलवी के फतवे पर या किसी जज्बाती मुद्दे पर वोट दे दे. भारत का मुसलमान अब समझ चुका है बदल भी चुका है. इसी का नतीजा उस वक़्त देखने में आया जब उन तथाकथित मुस्लिम हिमायती नेता सलमान खुर्शीद की बेगम लुईस खुर्शीद अपनी ज़मानत भी नहीं बचा सकीं.
देश का मुसलमान अब बदल चुका है. वह समझने लगा है की तरक्क़ी करने के लिए वोट बैंक होने या आरक्षण लेने की ज़रुरत नहीं है बल्कि ज़माने के साथ चलकर शिक्षा हासिल करने और मेहनत करने की ज़रुरत है. इसी ज़माने में उसने डॉ. अब्दुल कलाम को देश का राष्ट्रपति और डॉ. हामिद अंसारी को उपराष्ट्रपति बनते देखा है. तथाकथित मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों के साथ भेदभाव किये जाने के मुद्दे को भी लम्बे समय तक भुनाया. लेकिन देश में कई मुसलमान ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने आई.ए.एस. टॉप किया है. अगर भेदभाव होता तो ना तो कलाम राष्ट्रपति होते और ना ही कोई मुसलमान सिविल
सर्विस परीक्षा टॉप कर पाता. इस बात को अब देश का मुसलमान भी समझ चुका है कि भारत का संविधान दूसरे धर्म के लोगों की ही तरह उसे भी बराबरी का हक देता है और वह किसी से कमतर नहीं हैं. मुसलमान अब एक पार्टी का वोट बैंक बने रहने की मानसिकता से भी बाहर निकल रहा है. उसे अब जज्बाती मुद्दे नहीं बल्कि ठोस और अमली जामा पहनाने वाले वादे चाहिए. उसे अब इस्लाम खतरे में नज़र नहीं आता और ना ही उसे उर्दू सिर्फ अपनी ज़ुबान लगती है. उसे भारतीय जनता पार्टी भी अब पराई नज़र नहीं आती. वह समझ चुका है कि यह देश उसका है और यहीं पर उसका भविष्य रोशन है. क्यूंकि उसे अपने हक यहीं से लेने हैं और दूसरी कौमों से साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलना है और इक्कीसवीं सदी में भारत को महाशक्ति बनाना है.
लेखक नासिर जैदी बीकानेर में एचबीसी न्यूज के ब्यूरोचीफ हैं.


