गरीबी से आती बेबसी को, चेहरे पर पाता हूं,
कुछ समय के लिए ही सही, दूसरों से दूर हटाता हूं,
अपनी नजरों में ना सहीं, दूसरों की आंखों में ही सही,
कुछ पल के लिए ही सही, खुद को भगवान पाता हूं।
गुरबत के दर्द को, निगल जाना चाहता हूं,
हर इंसान के लिए, विष पी जाना चाहता हूं,
शंकर बनके ही सही, सुखी संसार चाहता हूं,
ब्रह्मा बनकर ही सही, नयी सृष्टि चाहता हूं।
जीवन की इस बेला में, चढ़ते सूरज की मंशा समझता हूं,
प्रगति पथ पर चलाता हूं, जीवन के मायने समझता हूं,
दौड़ रही जिंदगी की, खोलली चालों को समझता हूं,
पुल के नीचे छांव में, जिंदगी को पनपते पाता हूं।
बन इंसान ही सही, इंसान बनाना चाहता हूं,
एक सम्मान संग, जिंदगी बिताना चाहता हूं,
हर किसी के लिए, उल्लास चाहता हूं,
सूरज की तरह ही, रोज नया सवेरा करना चाहता हूं।
कवि और लेखक प्रसून शुक्ला कई चैनलों व अखबारों में वरिष्ठ पद पर रह चुके हैं. इन दिनों मैजिक टीवी के संपादक के रूप में कार्यरत हैं.


