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राजस्‍थान में पानी बोओ और पानी पाओ की सीख देने की तैयारी

बाड़मेर : जिले में पेयजल की कमी संकट के रुप में दिखाई दे रही है। इसका कारण भूमि के जल स्तर का लगातार गिरना है। गर्मी के दौर में यह समस्या विकराल रूप के सामने आ रही है। जल के अत्यधिक दोहन से धरती की कोख सूख रही है। आंकड़ों पर नजर डाले तो बीते कई वर्षों के भीतर जिले में कई मीटर तक जलस्तर गिर गया है। जलस्तर को बढ़ाने के लिए प्रशासन की ओर से तालाबों का संरक्षण करने की कवायद हुई है और इसी योजना में से एक रूफ वाटर हारवेस्टिंग योजना जल्द ही भूजल के पुनर्भरण में महती भूमिका अदा करता नजर आएगा। सीसीडीयू के आईईसी कंसल्टेंट अशोक सिंह ऩे बताया की सीसीडीयू और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के संयुक्त उपक्रम जल स्तर को बढ़ाने के लिए वाटर हारवेस्टिंग योजना का सघन प्रचार प्रसार किया जा रहा है। भू-जल स्तर को बढ़ाने के लिए आवश्यक है वर्षा जल के संचयन (वाटर हार्वेस्टिंग) की। जल संकट से निजात पाने के लिए एक मात्र उपाय है व्यर्थ बहने वाले वर्षा जल को एकत्रित कर विभिन्न संरचनाओं के माध्यम से जमीन में उतारकर जलस्तर में वृद्धि की जाए।

बाड़मेर : जिले में पेयजल की कमी संकट के रुप में दिखाई दे रही है। इसका कारण भूमि के जल स्तर का लगातार गिरना है। गर्मी के दौर में यह समस्या विकराल रूप के सामने आ रही है। जल के अत्यधिक दोहन से धरती की कोख सूख रही है। आंकड़ों पर नजर डाले तो बीते कई वर्षों के भीतर जिले में कई मीटर तक जलस्तर गिर गया है। जलस्तर को बढ़ाने के लिए प्रशासन की ओर से तालाबों का संरक्षण करने की कवायद हुई है और इसी योजना में से एक रूफ वाटर हारवेस्टिंग योजना जल्द ही भूजल के पुनर्भरण में महती भूमिका अदा करता नजर आएगा। सीसीडीयू के आईईसी कंसल्टेंट अशोक सिंह ऩे बताया की सीसीडीयू और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के संयुक्त उपक्रम जल स्तर को बढ़ाने के लिए वाटर हारवेस्टिंग योजना का सघन प्रचार प्रसार किया जा रहा है। भू-जल स्तर को बढ़ाने के लिए आवश्यक है वर्षा जल के संचयन (वाटर हार्वेस्टिंग) की। जल संकट से निजात पाने के लिए एक मात्र उपाय है व्यर्थ बहने वाले वर्षा जल को एकत्रित कर विभिन्न संरचनाओं के माध्यम से जमीन में उतारकर जलस्तर में वृद्धि की जाए।
शहरी क्षेत्र में रिहायशी बस्तियों एवं मकानों की छतों से वर्षा के मौसम में करोड़ों लीटर जल बहकर व्यर्थ हो जाता है। एक गणना के अनुसार 1000 वर्गफीट की छत से एक सेमी बारिश होने पर लगभग एक हजार लीटर पानी बहकर निकल जाता है। जिले में प्रतिवर्ष औसतन 1300 सेमी वर्षा होती है, ऐसी स्थिति में लगभग एक लाख लीटर पानी विभिन्न स्रोत के माध्यम से बाहर निकल जाता है। छत के वर्षा जल को रूफ वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक के माध्यम से सीधे नलकूप या अन्य जलस्रोत में पहुँचा दिया जाता है तो आने वाले समय में जलस्तर में वृद्धि होगी। इस बात को माडल के जरिये जिले की जनता और स्कूली बच्चों को समझाने के लिए  सी सी डी यू जयपुर कार्यालय  द्वारा बाड़मेर के हर ब्लाक  के लिए कृत्रिम भूजल पुनर्भरण माडल भेजा है। इस मॉडल में वर्षा बेहद सरल स्टिक तरीके से जल संचयन के तरीके को समझाया गया है।

सिंह के मुताबित हमारे पूर्वज फसलों की सिंचाई के लिए बारिश के पानी को इकट्ठा किया करते थे। अगर हम भी ऐसा करना चाहते हों तो छत पर कोई टंकी या बड़ा बर्तन रखकर इस जल को इकट्ठा करे। रेन हार्वेस्टिंग दो तरह की होती है- पहली, जिसमें घर की छत पर ही बारिश के पानी को घर के इस्तेमाल के लिए इकट्ठा किया जाता है और दूसरी, जिसमें फसल की सिंचाई के लिए खेत या आसपास के स्थान पर पानी रोका जाता है। सीसीडीयू जयपुर कार्यालय द्वारा भेजे गये यह मॉडल जल्द ही हर ब्लाक मुख्यालय में भेजे जाएंगे। 

क्या है रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम ? : छत से आने वाले जल निकासी पाईप को रूफ वाटर हार्वेस्टिंग फिल्टर से जोड़ दिया जाता है, फिल्टर के दूसरे सिरे को एक अन्य पाईप के माध्यम से नलकूप से जोड़ा जाता है। फिल्टर के साथ लगी ‘टी’ से जैविक प्रदूषण को रोकने के लिए समय-समय पर सोडियम हाइपोक्लोराइड या पोटेशियम परमेंगनेट(लाल दवाई) का घोल नलकूप या अन्य जलस्रोत में डाला जाता है, छत से आने वाली गंदगी एवं धूल के कारण फिल्टर चोक हो जाने की स्थिति में ‘टी’ के माध्यम से ही उसे बेकवाश भी किया जाता है। भूजल स्तर को बेहतर बनाने प्रदेश के सभी नगरीय क्षेत्रों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य किया गया है। बारिश की बूंदें सहेजने रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं होने से अधिकतर पानी सड़कों से होते हुए नाली और नदियों में बह जाता है। ऐसे में ऐसे सिस्टम की जरूरत आज की महती जरूरत है।

बाड़मेर से अशोक राजपुरोहित की रिपोर्ट.

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