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दुख-सुख

पुरी में भगवान का दिव्‍य दर्शन या पंडों का ब्‍लैक दर्शन

यदि मूर्तियां बात करतीं तो एक पत्रकार होने के नाते मैं भगवान श्रीकृष्ण से पहली विनय यही करता कि हे भगवन इस जगत के नाथ होने के बावजूद आपने अपने भक्तों को अपने दर्शन की टिकट ब्लैक में बेचने की छूट कब और किन हालातों में दी। हम बात कर रहे हैं कलियुग के धाम यानी पुरी के जगन्नाथ स्वामी मंदिर की जहां भगवान के नजदीक से दर्शन करने  की 25 रुपए की टिकट कतिपय पंडों द्वारा ब्लैक में 50 से 100 रुपए तक में बेची जाती है। वह भी उस भगवान के सामने जिसे साक्षात मानकर श्रद्धालु हजारों किलोमीटर दूर से यात्रा के तमाम कष्ट उठाकर दर्शन करने बडे भक्ति भाव से आते हैं, लेकिन यहां मंदिर प्रबंधन की तमाम अव्यवस्थाओं और कतिपय पंडों की यजमानों को लूटे जाने के प्रवृत्ति से दुखी होकर भारी मन से वापस लौटते हैं।

यदि मूर्तियां बात करतीं तो एक पत्रकार होने के नाते मैं भगवान श्रीकृष्ण से पहली विनय यही करता कि हे भगवन इस जगत के नाथ होने के बावजूद आपने अपने भक्तों को अपने दर्शन की टिकट ब्लैक में बेचने की छूट कब और किन हालातों में दी। हम बात कर रहे हैं कलियुग के धाम यानी पुरी के जगन्नाथ स्वामी मंदिर की जहां भगवान के नजदीक से दर्शन करने  की 25 रुपए की टिकट कतिपय पंडों द्वारा ब्लैक में 50 से 100 रुपए तक में बेची जाती है। वह भी उस भगवान के सामने जिसे साक्षात मानकर श्रद्धालु हजारों किलोमीटर दूर से यात्रा के तमाम कष्ट उठाकर दर्शन करने बडे भक्ति भाव से आते हैं, लेकिन यहां मंदिर प्रबंधन की तमाम अव्यवस्थाओं और कतिपय पंडों की यजमानों को लूटे जाने के प्रवृत्ति से दुखी होकर भारी मन से वापस लौटते हैं।
एक ओर भक्तों में जगन्नाथ के भात को जगत पसारत हाथ का भाव देखने को मिलता है तो दूसरी ओर यहां कतिपय पंडों का समूह जगन्नाथ के भगत को यहां से भेजो खाली हाथ की भावना से अपना काम करता नजर आता है। एकबारगी श्रद्धालु यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि ये कपितय पंडे भक्तों का मार्गदर्शन करने के लिए हैं या भक्त लूट गिरोह का रूप ले चुके हैं। येन केन प्रकारेण ये भक्तों की जेब खाली कराने का उद्यम करते प्रतीत होते हैं। तमाम तरह की अव्यवस्थाओं के बीच मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही पंडे अपने ग्राहक यानी यजमानों को पकड़ने  में लग जाते हैं। इनके बारे में खास बात यह है कि यजमान से श्री जगन्नाथ मंदिर में दर्शन पूजा संकल्प कराने में वे जो दक्षिणा लेते हैं उसके अलावा वे मंदिर के काउंटर से यमजान को जो प्रसाद सामग्री खरीदवाते हैं। उसमें में भी उनका कमीशन रहता है। परिणामस्वरूप 251 रुपए की प्रसाद सामग्री श्रद्धालु के हाथ में कुछ इस मात्रा में आती है कि जैसे उसने 51 या 100 रुपए की सामग्री खरीदी हो। यहां की परंपरा है कि भगवान को भोग केवल मंदिर कमेटी द्वारा निर्मित प्रसाद सामग्री का ही लगता है। शायद ऐसा प्रसाद सामग्री की शुद्धता और पवित्रता बनाए रखने की वजह से है। लेकिन पंडे इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं।

बात जब भगवान के दर्शन की आती है तो श्रद्धालुओं को उस वक्त गहरी निराशा हाथ लगती है जब मंदिर के अंदर उन्हें श्रीजगन्नाथ स्वामी, श्री सुभद्राजी, श्री बलदाउ जी के दिव्य विग्रह के दर्शन इतनी दूर से कराए जाते हैं कि उन्हें लगभग उछलकर या एडियों के बल खडे़ होकर भगवान की मनोहारी छवि को निहारना पड़ता है। भारी धक्का मुक्की के बीच भगवान के अस्पष्ट दर्शन बडी मुश्किल से हो पाते हैं। ऐसी स्थिति में भगवान के नजदीक से दर्शन करने की इच्छा होना स्वाभाविक है अन्यथा काफी रुपए और समय खर्च कर यहां आने का कोई मतलब नहीं रह जाता। भक्त की ऐसी ही मनोदशा में कतिपय पंडे पेशकश करते हैं 25 रुपए के टिकट को 50 से 100 रुपए तक में लेकर भगवान के नजदीक से दर्शन करने की। हालांकि काउंटर से 25 रुपए में ही टिकट मिलता है और वह मंदिर प्रांगण में ही हैं। लेकिन पंडे यह भय दिखाकर भ्रमित करते हैं कि जब तक टिकट लेकर आओगे तब तक भगवान के दर्शन का समय खत्म हो जाएगा। कोई आश्‍चर्य की बात नहीं कि कुछ लोग इन पंडों की ब्लैकमार्केटिंग के ग्राहक बन जाते हैं। भले ही यह भक्त की मजबूरी रही हो पर हम मीडिया वाले इसे अपनी भाषा में कह सकते हैं कि ईश्‍वर के दिव्य दर्शन या ब्लैक दर्शन।

मंदिर के अंदर नियुक्त पंडे आरती की थाली में एक दो का सिक्का चढ़ाने वाले श्रद्धालु को जलील करने से नहीं चूकते। दूसरी बार के दर्शन के समय जब मैंने थाली में 2 रुपए का नया सिक्का डाला तो पंडे ने कड़क लहजे में मेरी क्लास ले ली। उसने लगभग डांटते हुए कहा कि यहां 25 का टिकट लेकर आते हो और थाली में 2 का सिक्का चढ़ाते हो। उठाओ इसे और बाहर किसी मंदिर में चढ़ाना। अब जरा बाहर यानी श्री जगन्नाथ मंदिर के चारों ओर मंदिर परिसर मे स्थित अन्य मंदिरों में देव दर्शन की परंपरा के बारे में भी जान लें। यहां श्री लक्ष्मी मंदिर की विशेष मान्यता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर कमलपुष्पों की माला बेचने वाला आपसे 20 रुपए में दो माला खरीदने का आग्रह करेगा। एक श्रीलक्ष्मीजी और दूसरी श्रीविष्णु भगवान के निमित्त। श्रद्धालुओं को इसमें कोई हर्ज नहीं पर जब अंदर पुजारी यह कहता है कि जितने में मालाएं खरीदी हैं, उतनी ही दक्षिणा यहां भगवान को माला अर्पित करने की लगेगी तो वास्तव में लक्ष्मी का महत्व समझ में आने लगता है।

बहरहाल मंदिर जितना भव्य है और मूर्तियां जितनी दिव्य हैं वह अनिर्वचनीय है, किंतु उसी अनुपात में यहां जितनी अव्यवस्थाएं हैं वह श्रद्धालुओं के मन को खिन्न करती हैं। मसलन श्री जगन्नाथ मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए पंखों की कोई व्यवस्था नहीं है। पसीना में नहाते युवा, बुजुर्ग और गर्मी से विचलित होते बच्चे अपनी पीडा सिर्फ भगवान से ही कह सकते हैं। संपूर्ण मंदिर परिक्रमा के अंदर पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है। बाहर एक वाटर कूलर लगा है वह भी ठीक से पानी नहीं देता। बातों ही बातों में स्थानीय लोगों ने बताया कि राज्य शासन ने यहां की मंदिर कमेटी और कुछ पंडों को देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों का दौरा कराया था ताकि वे मंदिर प्रबंधन सीख सकें। लेकिन अफसोस कि उनके लिए वह सिर्फ देशाटन साबित हुआ।

हिंदुओं के लिए चारो धाम में बदरीनाथ सतयुग का, रामेश्‍वरम त्रेता का, द्वारिका द्वापर का और पुरी कलियुग का तीर्थ कहा जाता है। बहरहाल यदि मंदिर में अव्यवस्थाओं और पंडों के व्यवहार से मन खिन्न हो गया हो तो रंज करने की बात नहीं। भगवान के दिव्य दर्शन के आनंद को चिरंजीवी रखते हुए शाम को महोदधि यानी बंगाल की खाड़ी के समुद्र की शीतल लहरों से तन मन को प्रफुल्लित करते हुए प्रकृति का आनंद लिया जा सकता है। सूर्योदय के समय इसकी लहरों में भीगने का अपना अलग ही आनंद है। मंदिर से सीधा मार्ग पुरी के इस सी बीच तक आता है। इसे स्वर्गद्वार कहा जाता है। आनंद के अतिरेक में समुद्र की लहरों में ज्यादा अंदर तक जाने का मतलब है स्वर्ग के द्वार से सीधे स्वर्ग की यात्रा। इस समुद्र की लहरों का वेग देश के अन्य समुद्रों की तुलना में कहीं बहुत ज्यादा है। यही कारण है कि यहां प्रतिवर्ष डूबकर मरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है।

लेखक अजय खरे पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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