पत्रकारिता की बदलती चौहद्दी और रकवा के साथ साथ आज कल उसमे कई नए शब्द भी जोड़ दिए गएँ हैं जिनका प्रयोग खास वजह से, खास मौके पर और खास लोगों के लिए किया जाने लगा है/ एक बार भा जा पा के किसी वयोवृद्ध नेता ने पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल विहारी वाजपयी को भरी सभा में अपना “गुरु” कह दिया/ जब अटल जी की बारी आई तो उन्होंने उन महाशय को ” गुरुघंटाल ” की संज्ञा दे डाली और पूरा माहौल ठहाकों से गुंजायमान हो उठा/ मगर सहाफत की दुनिया में ऐसे मौके और ऐसे उदहारण ज़रा कम कम मिलते हैं/ और जो लफ्ज़ और वाक्यात मिलते हैं उनका एकसासों में तर्जुमा करना बहुत ही मुख्किल और जोखिम भरा हो जाता है क्यों कई वो अलगाज़ एक तो अपने आप में ही लोंगी मिर्च होते हैं और जिस पर चिपका दिया , बस उसकी तो इज्ज़त-आबरू सरे-राह साया हो गयी/
आज तक से मैंने जिंदगी में पहली बार हिंदी में रेंकने-भोंकने की कवायद शरू की/ ऐसा मेरे एक बहुत ही नामवर और बुज़ुर्ग सहाफी ने कहा था/ बल्कि वो एक ऐसा मीठा ज़हर वाला तीर था जो सीधे ज़ेहन में आकर घुसा था/ बदकिस्मती ये रही कई मेरी बुनियादी तालीम अंग्रेजी में हुई और मैं भी कई और लोगों की तरह जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की पैदावार था जहाँ चेखव, दांते, मार्क्स और लेनिन का बोलवाला था और मुझे लोग उसकी धौंकनी से निकला हुआ औज़ार मानते थे/ ये दीगर बात थी की वहां पर साडी पढाई करने के बाद में मैं अपने ही रंग में जीता था/ मेरे पुराने दोस्त आज भी याद दिला देते हैं कई मर्क्सिस्तों के ज़खीरे में मैं अकेला शख्स था जो सूट और नेक ताई पहनकर घूमता था और पाइप पीता था/
मगर मैं अपने ही में मस्त रहता था/ खैर, आज तक में काम करने के बाद पहला शब्द जाओ मैंने सीखा वो था” चिरकुट”/ मगर इसका मलतब तीन महीने बाद समझ में आया/ उसके बाद एक नया शब्द था “भौकाल’ जो आम तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश और खास कर इलाहाबाद इलाके में ज्यादा प्रयोग होता है/ मगर भौकालियों की दुनिया और हेंकड़ी हाल में ही समझ में आई जब कई ऐसे लोग मिले जिनके भौकाल का सुर और तान तो बहुत लम्बा था मगर सही वक़्त पर फूस होने लगा/ कई सहाफी दोंतों ने अपनी पकड़ और जकड का ऐसा ताना बाना बुना कई मैं हैरान रह गया/ उनकी हर अदा और अंदाज़े बयां पर लगता था कई जैसे तो मरकजी हुकूमत के दस बीस वजीरों को हमेशा अपनी जेब में ही लिए घूमते हों/ मैं भी एक बार इनके चक्कर में पद गया और वो तो एक बुज़ुर्ग सहाफी दोस्तने मेरा हाथ सही वक़्त पर पकड़ कर खींच दिया वरना गुड का गोबाद बन जाता और मैं सरे-राह ही ज़लील हो जाता/ अब जब भी किसी ऐसे भौकाली को सामने देखता हूँ तो चुपके से पतली गली की राह पकड़ कर रफू चक्कर हो जाता हूँ/
पत्रकारिता में दिल्ली की भौकालियों की फौज बहुत ही ज़बरदस्त है और अगर वो चाहें तो आपकी मिनट में ही मिटटी पलीद कर सकते हैं/ ऐसा ही एक नज़ारा गुज़िश्ता हफ्ता देखने को मिला/ मैं शहर से बहार था/ लौटा तो कम से कम पाच लोगों ने फ़ोन कर बधाई देना शुरू कर दिया/ मैं हैरान था कि आखिर माजरा क्या है? तफ्शीश करने पर पता चला कि भौकालियों में से एक ने ये खबर फैला दिया कि मैं किसी बड़ी कंपनी का सलाहकार बन गया हूँ/ एक साहब ने तो यहाँ तक कह दिया कि आपका वहां पहुँच जाना आपके दोस्तों के साथ अन्याय है/ बाद में मालूम हुआ कि मामला कुछ और ही था और दो पाटों के बीच में मुझे नाहक ही घुन बना कर पीस देने की बड़ी सोची समझी साजिश थी/ फिर वो ही पुरानी बात याद आ गयी और मैं अपनी मुर्खता हर बार हँसता रहा कि:-
लोग मेरे ही साए में आराम फरमाते रहे
और मैं दीवार होने की सजा पता रहा/
आज दोपहर एक बड़े ही वरिष्ट सहाफी से मुलाकात हो गयी और इलाहाबाद की कि पुरानी बातों का ज़िक्र छिड़ गया/ उस ताबद्लाये-ख्याल में सहफियों की किस्म और नस्ल पर भी जम कर बहस हुई और उनके कुछ निजी संस्मरण भी सुनने को मिले/ उनके जीवन कि कि ऐसी हैरत अंगेज़ वाक्यातों को सुनकर अचानक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की मशहूर कृति ;लड़ाई’ की याद आ गयी/ खैर, उन्होंने एक ही मशवरा दिया कि ” इस मुल्क की राजधानी में अब एहसास और वफात नाम की चीज़ महज़ किताबों में रह गयी है/ ज्यादी दिमाग पर जोर डालोगे तो तकलीफ होगी/ मगर यहाँ पर अचानक बहुत से भकुवे आ गए हैं और उनके भौकाल से ज़रा फिक्रमंद रहना/” ये ब्रम्ह-वाक्य की तरह ज़ेहन में बैठ गया/
भकुआ मेरे लिए एक और नया लफ्ज़ था/ लिहाज़ा मैंने अर्ज़ किया कि इसका मतलब भी समझाएं/ और जब मैंने भकुआ का मतलब समझा तो बड़ी जोर की हंसी आई/ मगर उन्होंने बड़ी संजीदगी से कहा कि सहफियों की फ़ौज में आज कल इस नस्ल की भरमार है/ मीडिया में वसूली से लेकर, नजूल, खेल और जुगाड़ का पूरा तिलस्म इसी पर चलता है/ हर दिन किसी न किसी के बावत कुछ उड़ाने और गिराने का खेल बदस्तूर चलता रहता है/ भकुवों के बवंडर से बच के रहना/ वरना जो भी साख और इज्ज़त अब तक कमाई है वो पल में मटियामेट हो जायेगा/”
बात पते की थी/ आज कल लोग कौवा कान ले गया की लीक पर चलते हैं और पूरा मोहल्ला कूद-फांद कर अपना हाथ पाऊँ लहुलुहान कर लेगे/ बेअचारे कौवा को फोलो करते हैं मगर उनका हाथ अपने कान पर कभी नहीं जाता/
अब मैंने भी सोच लिया है कि अपने एक ही मकसद होगा और वो यह कि:-
जाओ तो रोकते नहीं,आओ तो फर्शे-दां
हम बे-गरज हैं साया-ये-दीवार की तरह/
मगर हैरानी ज़रूर होती है कि जिस राह से कोई निस्बत नहीं, जिस राही से कोई अलेक-सालेक नहीं, जिस राह-गुज़र से कोई वास्ता नहीं, लोग बाग़ उसपर चलकर भी आपको हिकारत भरी नज़र से देखते हैं और उनका खौफज़दा चेहरा उनकी असलियत बयां कर देता है जब कभी भी मैं उन राहों पर पहुंचा तो उनका क्या होगा?/ मगर अपना वजूद तो हमेशा इसी बात का कायल रहा है कि:-
हमने तो एक कतरा भी गंवारा नहीं किया/
लोग खुदा जाने,पी गए समंदर कितने/
मगर क्या करें जनाब? भकुवों की फ़ौज में हम वैसे की अकेले हैं जैसे अलमुनियम के चमकते ढेर में एक पीतल या कांसे का लोटा/ मगर जो है वो है/
आखिर में वही शेर याद आता है कि:-
अब वफ़ा की उम्मीद भी किस से करें भला ?
मिटटी के बने लोग है, कागजों में बिक जाते हैं…
लेखक : अजय एन झा


