Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रदेश

जनता क्लेश में, नेता विदेश में

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेश दौरों पर जनता की गाढ़ी कमाई के 1880 करोड़ रुपए खर्च होने का आरोप लगाकर देश की राजनीति को गरमा दिया है। असलियत चाहे जो भी हो लेकिन सोनिया पर फिजूलखर्ची का आरोप लगाकर नेताओं द्वारा जनता के पैसे से ऐशो-आराम और फिजूलखर्ची की बहस को नये सिरे से शुरू कर दिया है। ये कोई पहला या अकेला ऐसा मामला नहीं है जब किसी नेता ने आम आदमी के हिस्से और विकास में खर्च होने वाले पैसे का दुरूपयोग किया हो। भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पांच वर्षों के कार्यकाल में विदेश यात्राओं के नाम पर गरीब देश के मात्र 205 करोड़ उड़ाए और बड़ी बेशर्मी के साथ उनका स्पष्टीकरण भी दिया।

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेश दौरों पर जनता की गाढ़ी कमाई के 1880 करोड़ रुपए खर्च होने का आरोप लगाकर देश की राजनीति को गरमा दिया है। असलियत चाहे जो भी हो लेकिन सोनिया पर फिजूलखर्ची का आरोप लगाकर नेताओं द्वारा जनता के पैसे से ऐशो-आराम और फिजूलखर्ची की बहस को नये सिरे से शुरू कर दिया है। ये कोई पहला या अकेला ऐसा मामला नहीं है जब किसी नेता ने आम आदमी के हिस्से और विकास में खर्च होने वाले पैसे का दुरूपयोग किया हो। भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पांच वर्षों के कार्यकाल में विदेश यात्राओं के नाम पर गरीब देश के मात्र 205 करोड़ उड़ाए और बड़ी बेशर्मी के साथ उनका स्पष्टीकरण भी दिया।

 

प्रतिभा पाटिल की विदेश यात्राओं से देश की जनता का आखिरकर क्या भला हुआ, इसका प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं है। विदेशों में अवकाश, मौज-मस्ती और तनाव को दूर करने के लिए नेता, मंत्री और आला अधिकारी अन्य देशों के प्रजातांत्रिक व्यवस्था, सरकार की कार्यप्रणाली, प्रौद्योगिकी, तकनीक, नए विषय की जानकारी जुटाने या विदेशी निवेश के प्रोत्साहन के वर्षों पुराने बहाने बनाकर विदेश यात्राओं का खेल रचते हैं, और देश की गरीब जनता के पैसे से विदेशों में गुलछर्रे उड़ाते हैं। सोनिया गांधी इसका अपवाद नहीं है, वो भी इसी सिस्टम का हिस्सा हैं। लेकिन मोदी के आरोपों की लपटों से जो प्रश्न उठें है वो काफी अहम हैं। सोनिया का विदेश यात्राओं का उद्देश्य क्या था? वो इलाज के लिए विदेश गयी थी या यात्राओं का मकसद कुछ और था? सोनिया किसी संवैधानिक पद का निर्वहन नहीं कर रही है फिर उन्होंने किस हैसियत से विदेश यात्राएं की? यूपीए के चेयरपर्सन, कांग्रेस अध्यक्ष या फिर एक सांसद या फिर पूर्व प्रधानमंत्री की विधवा के रुप में? अगर सोनिया ने इलाज के लिए विदेश यात्राएं की हैं तो क्या देश के तमाम सांसदों को ये सुविधा उपलब्ध है? प्रश्न बहुत है जिसका उत्तर देश की जनता जानना चाहती है, और यूपीए की चेयसपर्सन होने के नाते सोनिया को इन प्रश्नों का उत्तर देना भी चाहिए।

सोनिया रायबरेली की सांसद हैं, कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए की चेयरपर्सन है। संसद के लिए निर्वाचित होने के पश्चात् संसद सदस्य कतिपय सुख-सुविधाओं के हकदार हो जाते हैं। ये सुख सुविधाएं संसद सदस्यों को इस दृष्टि से प्रदान की जाती हैं कि वे संसद सदस्य के रूप में अपने कार्यों को प्रभावी ढंग से निपटा सकें। मोटे तौर पर संसद सदस्यों को प्रदान की गई सुख-सुविधाएं वेतन तथा भत्ते, यात्रा सुविधा, चकित्सा सुविधाएं, आवास, टेलीफोन आदि से संबंधित होती हैं। ये समस्त सुख-सुविधाएं संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों द्वारा शासित होती हैं। एक सांसद को प्रति वर्ष वेतन और भत्तों के रुप में 61 लाख का भुगतान सरकार करती है। इसके अलावा अनगिनत विशेष सुविधाएं मिलती हैं जिनमें सब्सिडी में खान-पान, आवास की सुविधा आदि शामिल है। वेतन, भत्तों व सुविधाओं के अलावा देश के सांसदों को सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैड्स) के रुप में सालाना 5 करोड़ की भारी भरकम धनराशि विकास के लिए मिलती है। एमपीलैड्स का दुरूपयोग और भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है। हमारे नेता बड़ी बेशमी से आम आदमी की हक और हुकूक की कमाई का बेजा इस्तेमाल करते हैं और देश विकास और जनता के भलाई की आड़ में विदेश यात्राएं करते हैं।

स्वतंत्रता के 65 वर्षों के लंबे इतिहास में हमारे नेताओं और नौकरशाहों ने लाखों विदेश यात्राएं की है जिस पर करोड़ों रुपये का खर्चे हुआ होगा। लेकिन इन तमाम विदेश यात्राओं से देश की जनता को क्या हासिल हुआ ये प्रश्न अहम् है। जो नेता देश में जात-पात, वोट बैंक और तुष्टिïकरण की राजनीति करते हैं वो जब दूसरे देशों की संसदीय प्रणाली या शासन व्यवस्था समझने के लिए विदेश यात्राएं करते हैं तो वो देश की जनता को सीधे बेवकूफ ही बनाते हैं। देश में दागी, अनपढ़, कम पढ़े लिखे और भ्रष्टï सांसदों की संख्या अच्छी-खासी है जिन्हें देश का भूगोल सही से पता नहीं है वो विदेश यात्राएं करके किसका भला करेंगे ये बात आसानी से समझ आ जाती है। जब भ्रष्टïाचार में आकंठ तक डूबे अधिकांश नौकरशाह विदेश यात्राएं करते हैं तो उनसे ये उम्मीद करना कि वो देश और जनहित की बात सोचेंगे बेवकूफी के सिवाए कुछ और नहीं है। इक्का-दुक्का संजीदा प्रयास होते भी हैं तो वो रद्दी की टोकरी में डाल दिए जाते हैं। अधिकतर नेता, जनप्रतिनिधि और अफसर विदेश यात्रा के नाम पर मौज-मस्ती करने, विदेश में पढï़ाई कर रहे बच्चों व रिश्तेदारों से मिलने और निजी काम निपटाने के लिए ही प्रयोग करते हैं। जो नेता देश में रहकर जनता की भलाई के लिए एक मिनट भी नहीं सोचते हैं वो विदेश जाकर अपनी व अपनों की चिंता करेंगे या जनता की ये बताने की जरूरत नहीं है।

फिजूलखर्ची रोकने और सादगी का जीवन जीने का नाटग यूपीए सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस युवराज राहुल गांधी ने किया था लेकिन एक-दो दिन की ड्रामेबाजी के बाद ये मुहिम टांय-टांय फिस्स हो गई थी। असल में पंच सितारा सुविधाएं भोगने वाले हमारे नेता और मंत्री इतनी मोटी खाल के हो चुके हैं कि उन पर जनता के दु:खा-दर्दे और परेशानियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जिस देश में आबादी का बड़ा हिस्सा एक वक्त की रोटी खाकर बमुश्किल जिंदा हो, जिस देश में गर्भवती महिलाएं इलाज के  अभाव में दम तोड़ती हो या फिर अस्पताल की दहलीज और खुले आसमान के नीचे बच्चा पैदा करने को विवश हों, जिस देश में बाल श्रम, बाल वेश्यावृत्ति चरम पर हो, भिखारियों का ग्राफ दिनों-दिन बढ़ रहा हो, मंहगाई ने आम आदमी की जीना मुहाल किया हो, शिक्षित बेरोजगारों की फौज जिस देश में खड़ी हो, बच्चे कुपोषण और अशिक्षा का शिकार हो उस देश में संवैधानिक या जिम्मेदार पद पर बैठे किसी शख्स द्वारा फिजूलखर्ची करना अपराध की श्रेणी में ही आता है। लेकिन नेताओं और राजनीतिक दलों ने देश की जनता को धर्म, जात, भाषा और कौम की दीवारों में बांट दिया है। जनता भी नेताओं के फेर में पड़ी हुई है उसकी आंखों पर स्वार्थ की पट्टी बंधी हुई है। इसी का लाभ नेता और राजनीतिक दल उठाते हैं जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है और आजादी के 65 वर्षों बाद भी समस्याएं जस की तस हैं और आम आमदी सडक़, बिजली, पानी मकान, रोटी और रोजगार के फेर में ही उलझा हुआ है।

नरेंद्र मोदी ने जो सवाल उठाया है वो सवाल कही मायनों में जायज है और ये देश के सभी राजनीतिक दलों, नेताओं और नौकरशाहों द्वारा देश विकास और जनहित के आड़ में की जा रही विदेश यात्राओं पर उंगली उठाता है। समय रहते इस प्रवृत्ति और शगल पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि देश को विकास के लिए धन के सदुपयोग की जरूरत है और जिस पैसे से नेता और अफसर विदेशों में मौज करते हैं वो पैसा देश की जनता के खून-पसीने की कमाई से आता न कि उनके निजी एकाउंट या खाते से।

डॉ. आशीष वशिष्ठ का विश्लेषण

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...