मध्य प्रदेश के बडवानी में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत अपना संवैधानिक हक मांग रहे आदिवासियों की रैली को आज स्थानीय विधायक और उनके गुर्गों ने यहां जबर्दस्ती रोक लिया। गुंडों ने आदिवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पिटा भी. इस पूरे प्रसंग में पुलिस प्रशासन तामशबीन बना खड़ा रहा। रैली कलेक्टर कार्यालय के लिए निकाली गई थी। रास्ता रोके जाने के बाद आदिवासियों ने इस गुंडागर्दी का शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताते हुए मौके पर ही धरना दे दिया है। इसके चलते एक ओर हजारों की संख्या में आदिवासी, महिलाएं और बच्चे हैं, तो दूसरी ओर विधायक समर्थकों ने उनका रास्ता रोका हुआ है। रैली में शामिल आदिवासी अंधेरा घिरने पर हिंसा की आशंका से ग्रस्त हैं।
नरेगा के तहत पिछले एक साल में की गई मजदूरी का भुगतान किए जाने की मांग को लेकर आदिवासी मजदूरों ने बुधवार को हजारों की संख्या में रैली निकाली थी। रैली में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल थे। इन मजदूरों को पिछले छह महीने से ज्यादा समय से मजदूरी नहीं मिली। इस वजह से आदिवासी परिवारों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई है। मजदूरी देने की मांग को लेकर ही आज आदिवासी परिवारों ने शांतिपूर्ण तरीके से कलेक्टर कार्यालय की ओर रैली निकाली थी। लेकिन भाजपा के स्थानीय विधायक प्रेमसिंह पटेल और उनके कुछ समर्थकों ने रैली का रास्ता रोक लिया। पुलिस ने विधायक और उनके समर्थकों को रास्ते से हटाने और रैली जारी रखने की मांग को खारिज करते हुए आदिवासियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। पिछले चार घंटे से विधायक के समर्थकों ने पुलिस की मदद से रैली का रास्ता रोक रखा है। संगठन को इस गतिरोध से रात के अंधेरे में किसी तरह की हिंसा की आशंका है।
जिले में नरेगा की मजदूरी के भुगतान में हो रही देरी से हालात तेजी से गंभीर हो रहे हैं। नरेगा में काम करने वाले मजदूर इस देरी का लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। जब कभी मजदूरों द्वारा भुगतान की मांग की जाती है तो प्रशासन का यही कहना होता है कि केंद्र ने फंड रोक लिया है। प्रशासन ने केंद्र सरकार को नरेगा के क्रियान्वयन से जुड़े खर्च के ब्योरे पेश नहीं किए हैं। मजदूरों की मांग है कि प्रशासन ब्योरे को सार्वजनिक करे और योजना के अमल में धांधली करने वाले अधिकारियों को बेनकाब कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। आदिवासियों का यह तर्क वाजिब है कि प्रशासन की लापरवाही और राजनेताओं की गलती का नुकसान वे क्यों भुगतें।
इन हालात में निहित स्वार्थों वाले राजनेता अपनी कलई खुलने के डर से प्रशासन के साथ मिलकर जागृत आदिवासी
दलित संगठन और उसके कार्यकर्ताओं को धमकाने लगे हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से संगठन के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की मांग करते हुए इसके सदस्यों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई की धमकी तक दी है। इन तत्वों के निहित स्वार्थों के चलते पिछले एक माह में हालात और बिगड़े हैं और इससे लोगों को उनका हक दिलाने की कोशिश कर रहे संगठन और उसके कार्यकर्ताओं के खिलाफ माहौल बन गया है।
रैली का आयोजन इन्हीं तत्वों के धमकी भरे व्यवहार का विरोध भी है, जो आए दिन नरेगा कानून के समुचित क्रियान्वयन और मजदूरी के समय पर भुगतान की न्यायोचित मांग करते हैं। संगठन के कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को भी शिकायत भेजी है। खेतों में खड़ी फसल को छोड़कर नरेगा के समुचित क्रियान्वयन और इसमें भ्रष्टाचार को रोकने की मांग के साथ रैली में शामिल हुए कार्यकर्ता अपनी लड़ाई को लेकर अडिग हैं। वे तब तक अपनी जगह पर बैठे रहेंगे, जब तक प्रशासन उन्हें उनकी मजदूरी के भुगतान, नरेगा के क्रियान्वयन में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के बारे में कोई पुष्ट आश्वासन नहीं दे देता। जिला कलेक्टर ने संगठन के प्रतिनिधियों से मुलाकात के बाद उनकी मांगों से सहमत होने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की और वे इस पूरे मसले पर रहस्यमय तरीके से चुप्पी साधे हुए हैं। फिलहाल संगठन के कार्यकर्ता, आदिवासी, महिलाएं और बच्चे बड़ी दिलेरी से रैली के रोके गए मार्ग में बैठे हुए हैं। उन्हें पुलिस संरक्षण प्राप्त नहीं है। इसके बावजूद वे अपनी मांगों का निराकरण होने तक धरने पर बैठे रहने को प्रतिबद्घ हैं।


