लखनऊ। भूमि अधिग्रहण के मामले में मायावती सरकार द्वारा की गयी किसान पंचायत और घोषणाएं किसानों के साथ धोखा है। आज भी पश्चिम यूपी के भूमि अधिग्रहण वाले इलाकों की हालत यह है कि बिना किसान की मर्जी के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किसानों को आतंकित कर जबरन उनसे जमीन लेने के लिए दबाब डाला जा रहा है, उनके खिलाफ फर्जी मुकदमें दर्ज कर गिरफ्तार करने की धमकी दी जा रही है। यह बयान जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने पश्चिम यूपी के भूमि अधिग्रहण वाले इलाकों का दौरा करने के बाद आज प्रेस को जारी प्रेस विज्ञप्ति में दिया। अखिलेन्द्र ने ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसोल, अलीगढ़ के टप्पल, कृपालपुर, जहानागढ़, कनसेका, आगरा के एत्मादपुर, खंदौली, चौगान, छलेसर, गढ़ीरामी और मथुरा का दौरा किया।
इस दौरे के बाद उन्होनें कहा कि दरअसल अंग्रेजों के बनाए 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के बदौलत मायावती सरकार किसानों का उत्पीड़न कर रही है। अब जब सुप्रीम कोर्ट तक ने यह माना है कि 1894 का कानून सार्वजनिक हित की सही व्याख्या नहीं करता और सरकारों को इस नाम पर किसानों की जमीन छीनने का असीमित अधिकार दे देता है, इसलिए इस कानून को रद्द किया जाना चाहिए तो केन्द्र सरकार को इसे रद्द करना चाहिए और नयी भूमि उपयोग नीति की धोषणा करनी चाहिए साथ ही प्रदेश सरकार को जब तक यह कानून रद्द नहीं होता, तब तक किसानों के जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगानी चाहिए। किसानों के उत्पीड़न के खिलाफ 1894 के कानून को रद्द करने के सवाल पर जन संघर्ष मोर्चा व भारतीय किसान पार्टी 1 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करेंगी और मानसून सत्र के दौरान दिल्ली में किसानों का बड़ा सम्मेलन बुलाया जायेगा।
अखिलेन्द्र ने बताया कि मायावती सरकार द्वारा 27 अगस्त 2010 को जारी शासनादेश में यह कहना कि जो किसान जमीन नहीं देना चाहता उससे जमीन का जबरन अधिग्रहण नहीं होगा झूठ के सिवा और कुछ नहीं है। वास्तव में तो अलीगढ़ के टप्पल, जहानगढ़ समेत इस पूरे क्षेत्र में किसानों को डरा धमका कर जमीन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अलीगढ़ में एडीएम खुद किसानों को जमीन न देने पर फर्जी मुकदमें में गिरफ्तार करने और जमीन पर एवार्ड घोषित कर उसे जबरन लेने की धमकी दे रहे है। भट्टा पारसोल में जो किसान जमीन नहीं देना चाहते उनके पीछे पुलिस पड़ी हुई है और उसके भय से आज भी वह घरों से भागे हुए है। आगरा में भी जमीन न देने पर अड़े किसानों को आतंकित किया जा रहा है। किसानों के लिए मायावती सरकार द्वारा की जा रही नयी भूमि अधिग्रहण नीति की घोषणाएं भी जमीनी स्तर पर कहीं नहीं दिखती है। आज भी भूमिहीन खेत मजदूरों को अतिरिक्त धन देने का निर्णय कहीं भी लागू नहीं हुआ है। स्थिति इतनी बुरी है कि भूमि अधिग्रहण के सम्बंध में किसानों से जो जिलाधिकारियों ने समझौते किए है, उनका भी अनुपालन नहीं किया जा रहा है। किसानों के इस उत्पीड़न के खिलाफ 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द करने और नयी भूमि उपयोग नीति बनाने की मांग पर कल जन संघर्ष मोर्चा व भारतीय किसान पार्टी दिल्ली में जंतर मंतर पर धरना- प्रदर्शन करेंगी।


