अरविन्द केजरीवाल ने रॉबर्ट वाडेरा के बारे में कल प्रेस कांफ्रेंस करके जो खुलासे किए वह खबर पिछले एक साल से मार्केट मे घूम रही थी, और एक छोटे अखबार ने इस खबर को प्रकाशित भी किया था, सोशल मीडिया पर लगातार इसके बारे में बताया जा रहा था, चूंकि मामला सोनिया गांधी के दामाद का था, इसलिए किसी भी बड़े अखबार या न्यूज चैनल की हिम्मत नहीं हुई कि इसे वो छाप सके या दिखा सके। खबर ना दिखाने के पीछे तर्क दिया जा सकता हैं कि सिर्फ आरोप लगाने वाली खबरों को कैसे प्रकाशित या टेलीकास्ट किया जा सकता हैं, लेकिन इससे पहले भी ना जाने कितनी खबरें सिर्फ आरोप के आधार पर दिखाया और छापा गया है।
एक और खबर प्रियंका गांधी के हिमाचल में बन रहे बंगले को लेकर पिछले 6 महीने से वहां के स्थानीय अखबारों में छप रहा है। साथ ही फेसबुक और ट्विटर पर भी दौड़ रहा है, लेकिन अभी तक मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसे दिखाने की जहमत नहीं उठाई हैं। हद तो तब हो गई जब वाडेरा पर आरोप लगाने के बाद केजरीवाल को ही कटघरे मे खड़ा कर दिया गया। शाम को कुछ चैनलों पर तथाकथित पत्रकार जो अब सरकार और कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर काम कर रहे हैं, उन्होंने शांति भूषण के इलाहाबाद और नोएडा के मकान को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए। पूरे मामले पर सरकार की तरफ से आने वाले बयान से पहले ही इन लोगों ने सरकार की तरफ से मोर्चा संभाल लिया। कोई अरविंद की टीम से इसका ठोस सबूत मांग रहा था तो कोई कोर्ट में जाने की सलाह दे रहा था, पूरे मामले पर बीजेपी से सवाल किया जा रहा था कि जब खबर एक साल से बाहर है तो आप लोगों ने इसे क्यों नहीं उठाया।
माना कि अरविंद केजरीवाल अब राजनैतिक जमात में शामिल हो गए हैं इसलिए उनसे सवाल पूछना लाजिमी है लेकिन अरविंद के सवाल के जवाब में सरकार के पांच मंत्रियों और दो मुख्यमंत्रियों ने इसे बकवास करार दिया, साथ ही इसे राजनैतिक महात्वाकांक्षा बताकर इसे सिरे से खारिज कर दिया। सरकार की तरफ से जितने लोगों ने मामले को लेकर बयान दिया उनमें से किसी से यह काउंटर सवाल नहीं किया गया कि अगर अरविंद बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं तो वाडरा साहब उनके खिलाफ कोई कार्यवाई करेंगे या नहीं। अगर रॉबर्ट वाडरा इतने ही पाक साफ हैं तो अरविंद के आरोप लगाने के आधे घंटे बाद ही 7 लोगों को सफाई क्यों देनी पड़ी? बचाव के लिए इतनी तेजी तो प्रधानमंत्री के लिए भी नहीं दिखी जब कोयला घोटाले में उनका नाम सामने आया और विपक्ष से लेकर मीडिया ने खूब हल्ला मचाया।
शांति भूषण के मकान का मामला कोई नई बात नहीं हैं, यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है फिर आज उनके उपर इस आरोप का क्या मतलब बनता है। माना कि शांति भूषण ने भी गैर-कानूनी तरीके से मकान लिया होगा लेकिन मीडिया को यह हक किसने दे दिया कि जिस व्यक्ति पर आरोप है वह किसी औऱ पर आरोप नहीं लगा सकता। क्यों किसी ने कांग्रेस पार्टी या सरकार से यह पूछा कि आप साबित कैसे करेंगे कि डीएलएफ को कोई फायदा नहीं पहुंचाया गया। सरकार ने बड़े अदब से जांच की बात को भी खारिज कर दिया लेकिन किसी ने कोई सवाल नहीं किया। सबने अरविंद और उनके साथियों से इस तरह से सवाल करने शुरू कर दिए जैसे मुख्य आरोपी वाडरा नहीं अरविंद हों।
पिछले 20 महीनों के राजनैतिक घटनाक्रम और घोटाले पर मीडिया के रवैये पर सरसरी निगाह डाले तो साफ पता चलता है कि जितनी भ्रष्ट राजनीति हैं उससे चार कदम आगे लोकतंत्र का चौथा खंभा है। यह अपवाद हो सकता है कि उनमे से कुछ इमानदार औऱ साफ छवि के भी हो सकते हैं, लेकिन भ्रष्टों की जमात मे उनको ढूंढना बड़ा मुश्किल काम है। पिछले दिनो मीडिया की पोल खोलने वाली वेबसाइट भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह की गिरफ्तारी की सबसे बड़ी वजह थी कि पिछले दो-तीन सालों मे कई मीडिया घरानों औऱ बड़े पत्रकारों की सच्चाई सामने लेकर आए थे। हालांकि गिरफ्तारी की वजह कुछ और बताई गई थी, लेकिन वो वजह गले नहीं उतरी बल्कि हकिकत ये है भड़ास4मीडिया ने इतने पंगे ले लिए थे कि कई पत्रकार और मीडिया घराने उनसे अपनी भड़ास निकालना चाहते थे।
21वीं सदी के सबसे चर्चित औऱ प्रभावशाली आंदोलन को मारने मे सरकार से ज्यादा भूमिका मीडिया ने निभाई थी। कुछ लोगों का कहना हैं कि पहले साल के अन्ना के आंदोलन मे मीडिया ने जबर्दस्त समर्थन दिया, लेकिन मीडिया का ये तर्क भी गुमराह करने वाला था क्योकि आंदोलन से ठीक पहले नीरा राडिया कांड ने इस चौथे खंभे मे लगे दीमक को जिस तरह देश के सामने लाया था उसमे मीडिया कई जाने माने पत्रकार जिन पर यह देश आंख बंद करके भरोषा करता था उनके असली चेहरे को बेनकाब हुए थे। अन्ना आंदोलन को समर्थन देने का सबसे बड़ा और पहला कारण था कि मीडिया घरानों की अपनी साख बचाना और दूसरा कारण आंदोलन को मिल रहा जनसमर्थन था। इस साल जंतर मंतर पर अरविंद केजरीवाल एण्ड टीम के अनशन को लेकर जो भ्रांतिया मीडिया ने फैलाई उसका गुस्सा भी वहां रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को झेलना पड़ा था, लेकिन इस भ्रांति के पीछे की हकिकत किसी ने सामने नहीं रखा.
दरअसल अनशन से पहले देश के कुछ बड़े मीडिया घरानों के बड़े पत्रकारों के साथ सरकार के कुछ मंत्रियों ने एक गुप्त मीटींग करके आंदोलन को सपोर्ट ना करने की डील की जिसके कारण आंदोलन के पहले ही दिन से सारे अखबारों औऱ न्यूज चैनलों ने आंदोलन में भीड़ ना जुटने को लेकर आंदोलन को असफल बताना शुरू कर दिया। ये तो हुई आंदोलन की बात। अब आते हैं घोटालों औऱ उसके हकीकतों पर। राजनैतिक पार्टियों के साथ गोलमोल करने में मीडिया की भागिदारी के बारे में कुछ बातें। एक के बाद एक घोटाले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा बवाल मचा सीएजी के उस घोटाले पर जिसमें कोयला घोटाले मे प्रधानमंत्री का नाम सामने आया। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट कोयला, एनर्जी औऱ एवीएशन सेक्टर (आईजीआइ एयपोर्ट) में हुए घोटाले पर पेश की थी, चूंकि कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री का नाम था इसलिए जाहिर था कि यह मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में रहता इसलिए सारी मीडिया ने अपना ध्यान सिर्फ कोयला घोटाले पर दिया, बाकी के दो मुद्दे उसी दिन से गायब हो गए जिसकी रिपोर्ट सीएजी ने दी थी।
हद तो इस मामले में तब हो गई जब कुछ अखबार और न्यूज चैनल सीधे-सीधे सरकार के प्रवक्ता की तरह काम करने लगे, औऱ इस काम में उनका साथ दिया सरकार से सीधे-सीधे फायदा लेने वाले कुछ तथाकथित पत्रकार जो न्यूज चैनलों पर गेस्ट बनकर आने लगे हैं। कुछ ही दिनों बाद छतिसगढ़ सीएजी ने एक रिपोर्ट पेश की जिसमे बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी का नाम आया। असली खेल तब शुरू हुआ। अब सरकार को छोड़कर पूरी मीडिया जमात बीजेपी से सवाल करने लगी, उनके लिए 1.86 लाख करोड़ से ज्यादा 1000 करोड़ अहम हो गया। नतीजा पूरे घोटाले में देश को इतने सारे तथ्य दिए गए कि लोग समझ ही नहीं पाए कि घोटाले में असली दोषी कौन है। इस घालमेल में उन पत्रकारों ने अहम भूमिका निभाई जिनको सरकार ने अप्रत्यक्ष रुप से अपना प्रवक्ता नियुक्त कर रखा है।
बीजेपी भी अपनी टांग फंसते देख मुद्दे से अपना इंट्रेस्ट कम कर दिया और मीडिया ने भी अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। कोयला घोटाले में सरकार के कई मंत्री सीधे-सीधे दोषी नजर आए लेकिन सभी आरोपियों ने हर सवाल का जवाब ऐसे दिया मानो उनके उपर गलत आरोप लगाए गए हों। कोयले में सबसे ज्यादा माल कमाने वाले कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल जी न्यूज के रिपोर्टर के साथ बदतमीजी करते नजर आए, तो कोयला मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल अर्नव गोस्वामी के सवालों के जवाब इसलिए नहीं दिए क्योंकि उनके अनुसार मीडिया अब ताकत नहीं रही की लोग उसके बातों पर विश्वास कर सकें। जाहिर हैं जिंदल को भी मालूम है और श्री प्रकाश जायसवाल को भी कि मीडिया किस चिड़िया का नाम है। इसी बीच सरकार ने पूरे मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए एफडीआई का प्रस्ताव पास कर दिया और अपने मकसद में कामयाब हो गई। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार को कुछ बड़े पत्रकारों ने सलाह दी थी कि एफडीआई का मुद्दा सामने लाने पर मीडिया और देश का ध्यान कोयले घोटाले से हट जाएगा, लेकिन ये बातें भी गलत है। देश का मीडिया तो सरकार के निर्णय ना लेने पर पिछले दो सालों से उसकी खिंचाई कर रहा हैं लेकिन सरकार नहीं जागी।
याद कीजिए जुलाई-अगस्त महीने मे किस तरह से विदेशी मीडिया ने मनमोहन सिंह की क्षमता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे। दरअसल सरकार की तथाकथित आर्थिक सुधार के लिए उठाए गए कदम विदेशों में अपनी छवि बनाए रखने के लिए उठाए गए थे। मतलब सरकार को इस देश की मीडिया की औकात मालूम है, क्योंकि यहां की मीडिया वही गाएगी जो सरकार चाहती है, इसलिए अपने आपको लोकतंत्र का चौथा खंभा मानकर खुश होना बेवकूफी ही मानी जाएगी। ममता ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो कुछ ने उनकी तारिफ की तो कुछ ने खिंचाई भी की। सरकार की बैशाखी बने मुलायम और माया से किसी ने धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर उत्तर प्रदेश में हो रहे दंगे के बारे में पूछा तक नहीं। 6 महीने में यूपी में 8 दंगे हुए लेकिन ना तो किसी अखबार ने और ना ही किसी टेलीवीजन चैनल ने इसे दिखाने की जहमत उठाई, बरेली पर एनडीटीवी की रिपोर्ट को छोड़कर।
दंगों के बारे में कहा जाता है कि मीडिया के लिए कुछ गाइडलाईन होती हैं लेकिन आश्चर्य होता है कि सारे गाइडलाइन गुजरात दंगों की खबरों के लिए हटा दी जाती हैं। असम में दंगे शुरू होने के एक सप्ताह बाद मीडिया ने तब मामले को उठाया जब सोशल मीडिया ने उसे तवज्जो दिया। महाराष्ट्र सिंचाई घोटाले के मामले मे भी पक्षपात खुलकर सामने आ रहा है, अब ध्यान आरोपी अजीत पवार से हटाकर बीजेपी अध्यक्ष नीतीन गडकरी की चिट्ठी पर आकर रुक गई है। चिट्ठी तो महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष मानिक राव ठाकरे ने भी लिखी लेकिन कितने चैनलों औऱ अखबारों मे मानिक राव के चिट्ठी का जिक्र है, यह भी सामने आ रहा है। जनार्दन द्विवेदी से जब इस बारे में पूछा जाता है तो वह साफ मना कर देते हैं कि उन्हें इस चिट्ठी के बारे में नहीं मालूम। वहां बैठे तमाम पत्रकार भी उनके जवाब से संतुष्ट हो जाते हैं।
पिछले दो सालों से मीडिया ने जो गंध मचा रखी हैं वो निरंतर जारी है, सरकार के हर मुसीबत का तोड़ पहले से ही ढूंढ कर अपनी पीठ थपथपाने की होड़ मची हुई है। जाहिर है इस पीठ थथपथाने की वजह से कुछ लोग अखबार के एडीटर से मालिक बन बैठे हैं। लेकिन अफसोस होता हैं कि इस कलियुगी सरकार में देश को आइना दिखाने वाला नाई ही गद्दारी करने लगे हैं। बेशक मीडिया को अधिकार है कि वो किसी से क्या सवाल पूछे या क्या दिखाए। ऐसा होना भी चाहिए। अगर नीतीन गडकरी किसी मामले में दोषी हैं तो सवाल उनसे भी पूछे जाने चाहिए और अरविंद केजरीवाल से भी, लेकिन सवाल एक पत्रकार की हैसियत से पूछा जाए ना कि सरकार के बचाव के लिए।
यहां तो थ्योरी बना दी गई है कि अगर नरेंद्र मोदी सोनिया गांधी से विदेशी दौरों का हिसाब मांग रहे हैं तो मोदी के विदेशी दौरों का हिसाब भी उसी दिन मांगा जाए। किसी भी पत्रकार ने उस आरटीआई कार्यकर्ता से यह नहीं पूछा कि जब उसने एक साल पहले या 6 महीने पहले आरटीआई डाली और जवाब अभी तक नहीं मिला तो उसने आगे कोई शिकायत कि या नहीं। उस आरटीआई कार्यकर्ता को सामने लाना ही अब खोजी पत्रकारिता बन गया है। कोयले की तरह महाराष्ट्र सिंचाई घोटाले को भी कांग्रेस बीजेपी और एनसीपी के बीच घालमेल करके मामले को रफ्फूचक्कर कर दिया गया।
अब मुद्दा घोटाले से हटकर गडकरी की चिटठी पर आ कर रुक गया। जांच की बात गयी तेल लेने, ऐसे में लोग क्या करें जब सच्चाई लाने वाला ही सच को मार डाले। वैसे यह काल जितना राजनैतिक भ्रष्टाचार के लिए जाना जाएगा उतना ही मीडिया के भ्रष्टकाल के रूप में भी। इसका असर दिखना शुरू भी हो गया हैं, फेसबुक से लेकर ट्वीटर और यू ट्यूब तक बकायदा उन प्रवक्ता पत्रकारों के नाम और फोटो सहित उन तमाम चैनलों के बारे मे भी लोग लिखना और पढना शुरू कर चुके हैं। मेरे फेसबुक वाल पर रोज मीडिया के उन तारणहारों का जिक्र मिल जाता है जो सरकार के प्रवक्ता बताए जा रहे हैं साथ में उन न्यूज चैनलों की बहादुरी के किस्से भी अब सरेआम होने लगे हैं, इसलिए ज्यादा दूर नहीं हैं अब वो मंजिल जहां से मीडिया का शुद्धिकरण शुरू होगा। सोशल मीडिया के बढते प्रभाव का कारण भी यही है कि लोगों का भरोसा न्यूज चैनलों और अखबारों से उठ रहा है।
एसके चौधरी (सौनू)
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