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क्या विपक्षी दल, क्या मीडिया… हमाम में दोनों ही नंगे हैं

Padampati Sharma : देश में भ्रष्टाचार की गंगोत्री की ओर सिविल सोसाइटी के बढ़ने से देश में खलबली मच गयी. क्या सरकार, क्या सत्तारूढ़ कांग्रेस, क्या विपक्षी दल और क्या मीडिया , सभी राबर्ट वाड्रा का कच्चा चिटठा सामने आने के बाद से सकते में हैं. किसी को नहीं समझ आ रही कि वे क्या करें. स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे वित्त मंत्री एक नहीं दो मर्तबा इस मुद्दे पर किसी भी तरह की जांच कराने से इंकार कर चुके हैं. एक मंत्री अपनी नेता की इस कदर चमचागिरी पर उतर आए कि उनके लिए वह अपनी जान तक दे सकते हैं.

Padampati Sharma : देश में भ्रष्टाचार की गंगोत्री की ओर सिविल सोसाइटी के बढ़ने से देश में खलबली मच गयी. क्या सरकार, क्या सत्तारूढ़ कांग्रेस, क्या विपक्षी दल और क्या मीडिया , सभी राबर्ट वाड्रा का कच्चा चिटठा सामने आने के बाद से सकते में हैं. किसी को नहीं समझ आ रही कि वे क्या करें. स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे वित्त मंत्री एक नहीं दो मर्तबा इस मुद्दे पर किसी भी तरह की जांच कराने से इंकार कर चुके हैं. एक मंत्री अपनी नेता की इस कदर चमचागिरी पर उतर आए कि उनके लिए वह अपनी जान तक दे सकते हैं.

 

देवकांत बरुआ (इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा) के इस नए अवतार ने यही बात यदि देश के लिए कही होती तो कोई भी इसे भांडगिरी करार न देकर उनकी जयकार करता. लेकिन यहाँ सवाल देश की राजनीति के शिखर पर विराजमान एक खास परिवार के दामाद के दामन पर लगे छींटे की सभी को जानकारी का है. अरविन्द केजरीवाल इस कड़ी में १० अक्टूबर को कुछ और जोड़ने वाले हैं. अगर मामला वाड्रा का है तो उनके कारनामों की काफी लम्बी चौड़ी लिस्ट है. मसलन, उनकी २-जी घोटाले में बुरी तरह से फंसी देश की दूसरी सबसे बड़ी रीयल स्टेट कंपनी यूनिटेक में हिस्सेदारी, आधा दर्जन जेट विमानों का मालिकाना, खरीदी गयी तमाम सम्पत्तियों आदि के खुलासे होने शेष हैं और अब एक के बाद एक ये ही शायद आते चले जाएंगे. स्वयं आयकर अधिकारी रहे अरविन्द तो खैर विधिवत छानबीन के बाद ही मुह खोलते हैं. इसलिए उनको तो कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता मगर देश का प्रमुख विपक्षी दल कहां सो रहा था….?

उसकी जानकारी में ये सब कुछ था ठीक वैसे ही जैसे मुझे या मेरे जैसों को था. सोमवार को भाजपा में इमानदार प्रजाति के बचे कुछ चुनिन्दा नेताओं में एक व हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री शांता कुमार के लिखे उस पत्र के जवाब में, जिसमे उन्होंने राबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका की शिमला में करोड़ों की संपत्ति की ओर ध्यान आक्रष्ट कराया था, अरविन्द ने ने पलटकर पूछा कि हिमाचल में तो आपकी सरकार है, आपने क्यों नहीं इसकी जांच कराई ? इस आरोप में दम है. पिछले दिनों इन्टरनेट पर उस निर्माणाधीन कोठी का चित्र सहित समाचार भी लगा था कि कैसे इसको पसंद न आने पर तोडा गया था और यह भी कि ऐसा कई बार किया जा चुका है. भाजपा की वहां सरकार है और यदि इसकी छानबीन उसने करायी होती तो नवम्बर के चुनाव में वह हारी बाज़ी पलट सकती थी. लेकिन उसने ऐसा क्यों नहीं किया ? नूरा कुश्ती का जो आरोप लग रहा है, ऐसी हरकतें क्या इसकी पुष्टि नहीं करतीं ?

मीडिया पर आरोप लगाया जाता रहा है शुरू से ही कि एक परिवार विशेष के खिलाफ उसकी बोलती बंद हो जाती है. बोफोर्स में भी यह हिन्दू और इन्डियन एक्सप्रेस अख़बार ही थे कि जिन्होंने इसकी तह तक जाने की चेष्टा की. बाकियों को तो तब भी सांप सूंघ गया था. बाद में नब्बे का दशक की शुरुआत और अंत के सालों में विदेशी मीडिया में इस परिवार के लोगों के बारे में क्या कुछ नहीं प्रकाशित हुआ था. पर अपने देश में चार लाइन में उन्हें निपटाया जाता रहा. खौफज़दा मीडिया ऐसे मामलों में कभी आगे बढ़ा हो, याद नहीं आता. विपक्षी दलों को तो आड़े हाथ लिया जा रहा है चैनलों पर कि वे कहाँ थे, पर वे चैनल खुद से सवाल क्यों नहीं करते कि तब वे कहाँ थे ? चाहे स्विस बैंक खाता, विदेशी मुद्रा-ड्रग्स के साथ विदेश में गिरफ़्तारी, तस्करी, झूठा हलफनामा आदि तमाम ऐसे आरोप हैं कि जिनकी जड़ में जाने की जरूरत नहीं समझी गयी और वो भी तब जब आरोपियों की ओर से शायद ही कभी ऐसे समाचारों का खंडन आया हो.

देश का ब्राडकास्ट मीडिया स्वयं भी क्या सरकारी नीतियों के चलते भ्रष्टाचार से त्रस्त नहीं है ? बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी होगी कि हर वर्ष अरबों का काला धन चैनल स्वामियों द्वारा केबल आपरेटरों और डीटीएच कंपनियों को दिया जाता है ताकि उनका चैनल दर्शकों तक पहुंचे. खता सरकार के नीतिनियंताओं की है न. तो फिर कभी क्यों नहीं इस घूस के खिलाफ आवाज उठाई गयी. किसी साधारण के लिए अब चैनल खोलना सपना बन चुका है. २०० करोड़ गांठ में हों और वो भी ब्लैक मनी तभी कोई आज चैनल खोलने की सोच सकता है. यही कारण है कि जो लोग इधर इस क्षेत्र में आए हैं या आ रहे हैं, उनकी प्रोफाइल देख लीजिये, सारी बात समझ में आ जाएगी. एक चैनल के स्वामी भाई सहित महीनो से जेल में बंद हैं मनी लांड्रिंग में.

चैनलों के ऐंकर्स या प्रस्तोताओं में अनेक ऐसे हैं जिनकी निष्ठा या इमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता मगर यही बात चैनल स्वामियों के बारे में नहीं कही जा सकती है. जब टीवी पर चल रही बहस में एंकर विपक्षी दल के प्रवक्ताओं से यह सवाल करते हैं कि भ्रष्टाचार का जो मामला सिविल सोसाइटी उठा रही है, आपने क्यों नहीं उठाया, किसी ने पलटकर उस एंकर से भी पूछा क्या कभी कि ‘ मान्यवर तब आप और आपका चैनल क्या कर रहा था ‘ ? आखिर में एक कडवा सच यह है कि क्या राजनीतिक दल और क्या मीडिया दोनों ही हमाम में नंगे हैं. देखने वाली बात तो यह है कि इनके बदन पर कपडे कब नज़र आएगें … …. !!!

वरिष्ठ पत्रकार Padampati Sharma के फेसबुक वॉल से साभार.

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