यह तो मैं व्यक्तिगत तौर पर भी मानता हूं कि यह कुलपति वाकई बेहद ईमानदार हैं। लेकिन इसका यह मतलब तो हर्गिज नहीं होता है कि कोई शख्स बेहद ईमानदार है तो वह शख्स अपने दायित्वों के संपादन और कार्य में कुशल भी होगा। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुंदरलाल के साथ कई समस्याएं हैं। मैं अपनी रिपोर्ट में लिख चुका हूं कि कुलपति की यह योजना अनूठी है। योजना का मकसद ही यही था कि उत्तरपुस्तिकाओं की गोपनीयता जो खुल जाती थी, जिसके कारण अंक बढ़ाने की साजिशें होती थीं, जोकि पूर्वांचल विश्वविद्यालय की अब तक गति भी थी और पूरी यूनिवर्सिटी कुख्यात रही है इसके लिए, वह न हो।
यह योजना अनूठी थी। नि:संदेह। लेकिन जो तरीका अपनाया गया वह इतना भ्रष्ट और तकनीकी तौर पर अकुशल-अनगढ़ रहा, उसके चलते ही यह तांडव खड़ा हो गया। क्यों किसी निजी और अनाम सी एजेंसी को गुपचुप तौर पर यह भारी काम सौंपा गया। क्या इसके लिए किसी से अनूमति ली गयी। क्या इसकी प्रक्रिया का यूनिवर्सिटी के अफसरों-वरिष्ठ प्राचार्यों के बीच बहस की गयी। इसका क्या मतलब है कि कोई अकेला कुलपति जो चाहे, आयं-बांय करता रहे।
है कोई जवाब कुलपति के पास कि अनुचित साधनों का इस्तेमाल करते पकड़े गये हजारों छात्रों के प्रकरण को सक्षम समिति पर विचार करने और फैसला करने के बजाय सीधे उसका रिजल्ट आउट कर दिया गया। और अगर ऐसा कर लिया गया है तो ऐसी समिति का क्या औचित्य है। उसे भंग क्यों नहीं कर देते। सवाल यह है कि जब चालीस सरकारी-गैरसरकारी कालेज में करीब दो हजार से ज्यादा कुशल शिक्षक मौजूद थे, तो स्ववित्त कालेजों के शिक्षकों और रिटायर्ड शिक्षकों को यह दायित्व क्यों सौंपा दिया गया। यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों के बावजूद यह काम क्यों कराया गया। सरकारी-अनुदानित कालेजों के छात्रों के मुकाबले स्ववित्त कालेजों की दशा किसी से छिपी नहीं है। ऐसे 319 कालेजों में शिक्षकों को केवल मानदेय मिलता है और वह भी न्यूनतम। इसके मुकाबले सरकारी-अनुदानित कालेजों के शिक्षकों का शैक्षिक-आर्थिक नियंत्रण प्राचार्य, कुलपति के साथ ही सीधे यूसीजी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग करता है। लेकिन इस नयी प्रणाली में हस्तक्षेप किस स्तर के लोगों से कराया गया, आप खुद ही देख लें।
आपको बता दें कि पूरी यूनिवर्सिटी की कापियों की जांच केवल सरकारी-अनुदानित कालेज के शिक्षक ही करते हैं। फिर अगर किसी और का हस्तक्षेप होगा तो अराजकता कौन करेगा। कोई सक्षम और कुशल शिक्षक, या फिर स्ववित्तपोषित कालेज के शिक्षक, जिनकी क्षमता और कुशलता पिछले 15 बरसों से संदिग्ध है और जिनकी जांच तक कई बार चलती रही है। कि एक ही ऐसे शिक्षक का नाम केवल दूसरे कई-कई कालेज ही नहीं, बल्कि देश की दूसरी यूनिवर्सिटी और उसके कालेजों के शिक्षकों का दर्ज है।
इससे भी बड़ी बात तो यह कि अब अगर दो हजार से ज्यादा सरकारी-अनुदानित कालेज के दक्ष शिक्षक और यूनिवर्सिटी के सारे सैकड़ों कर्मचारी भी बेईमान हैं, जैसा कि कुलपति का दावा है, तो फिर तो भागवान ही देखे इस यूनिवर्सिटी को। इससे बहतर होगा कि इस यूनिवर्सिटी को ही भंग कर दिया जाना श्रेयस्कर होगा।
लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर का विश्लेषण.
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