आजकल बिहार में जो सब कुछ घटित हो रहा है, वह बालीवुड के किसी “सी” या “डी” ग्रेड फ़िल्मों में दिखायी जाने वाली कामेडी के समान है। शासक तानाशाह हो चुका है और आम जनता अराजक। नतीजा यह है कि लोकतांत्रिक शासक को आये दिन आम जनता के द्वारा चप्पल और पत्थर झेलने पड़ रहे हैं। वह भी तब जब शासक यह कह रहा है कि वह बिहार के अधिकार के लिए अधिकार यात्रा कर रहा है। बिहार के नेता अनुशासन भूल चुके हैं। जुबानी जंग इस कदर तेज हो चुकी है कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से भी परहेज नहीं रहा। बिहार का मीडिया दो खेमों में बंट चुका है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में यदा-कदा शासक के तानाशाह होने की खबर दिख जाती है तो दूसरी प्रिंट मीडिया अभी भी शासक की दलाली से बाज नहीं आया है।
एक उदाहरण है दैनिक हिन्दुस्तान की दलाली। इसके कल के संस्करण में पेज संख्या-2 पर एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की गयी। रिपोर्ट में बिहार से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख किया गया कि किस प्रकार की उपेक्षा की गयी। रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह था कि नीतीश कुमार जिस अधिकार की बात कर रहे हैं, वह उचित है और आम जनता को उनके इस मुहिम में शामिल होना चाहिए।
निश्चित तौर पर इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि बिहार के हितों की उपेक्षा की गयी है। फ़िर चाहे वह वर्ष 1912 में बिहार-बंगाल विभाजन के समय किया गया सेटलमेंट हो या फ़िर वर्ष 1930 के दशक में बिहार-उड़ीसा विभाजन के समय किया गया सेटलमेंट। आजादी के बाद देश की लोकतांत्रिक सरकार द्वारा लाया गया काला कानून समान किराया अधिनियम, जिसने पूंजीपतियों को बिहार का खजाना लूटने की पूरी छूट दी। बिहार का खजाना लूटता रहा और सूबे में शासित सरकारें चुप रहीं। पहली बार चुप्पी तोड़ी लालू प्रसाद ने जब वह मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1992 में उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था कि जबतक बिहार को उसका वाजिब हक नहीं मिलेगा तबतक बिहार से मिट्टी का एक कण भी बाहर नहीं जायेगा। हालांकि बाद के दिनों में लालू प्रसाद का रवैया भी बदल गया और चीजें यथावत हो गयीं।
आज एक बार फ़िर बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की बात कही जा रही है। कहा जा रहा है कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने से बिहार को क्या-क्या लाभ होंगे। किस कदर टैक्स में बिहार की हिस्सेदारी बढेगी और फ़िर बढी हिस्सेदारी का उपयोग जन कल्याण के लिए किया जाएगा। लेकिन सूबे की नीतीश सरकार इस तथ्य को बताने में लजा रही है कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने से उन उद्योगपतियों को कितना लाभ मिलेगा, जो बिहार में निवेश करेंगे। वैसे इस बात को समझने की आवश्यकता है कि पूंजी निवेश के लिए वातावरण का होना आवश्यक है। मसलन बिजली, सड़क, पानी, स्किल्ड मैन फ़ोर्स और कानून का राज। नीतीश सरकार पिछले 7 वर्षों में इन सभी मामलों में कोई विशेष तीर नहीं मार सकी है। सड़क के मामले में कहा जा सकता है कि सरकार ने कुछ गंभीरता से कार्य किया है। लेकिन यह केवल नेशनल हाईवे को देखकर ही कहा जा सकता है। जबकि राज्याधीन सड़कें अभी भी उसी तरह बदहाल हैं। बिजली और पानी अहम समस्याओं के रुप में बरकरार हैं। नदियां नेताओं, सरकारी बाबूओं और ठेकेदारों की तिजोरियां भरने के काम आ रही हैं। बांध और नहरों के सुदृढीकरण के नाम पर अरबों रुपए का वारा-न्यारा हो रहा है।
कभी-कभी तो लगता है जैसे बिहार में लोकतंत्र है ही नहीं। इसके सभी घटक अपनी-अपनी जिम्मेवारी भूल चुके हैं। विधायिका में विपक्ष का अभाव है जिसका असर नीतियों के निर्माण पर पड़ रहा है। विधायकों को नीतीश कुमार की हां में हां मिलाने से अधिक की औकात नहीं है। कार्यपालिका सूबे में समांतर सरकार चला रही है। एक ठोस प्रमाण यह कि अभी हाल ही में महादलित आयोग के एक सदस्य रामचंद्र राम ने केवल इसलिए इस्तीफ़ा दे दिया क्योंकि महादलितों के लिए बनायी गयी योजनायें सरकारी पदाधिकारियों के लिए कुबेर का खजाना साबित हो रही हैं। न्यायपालिका की शान में कुछ भी कहना सूरन को दीया दिखाने के समान है। रही बात पत्रकारिता की तो यह बात जगजाहिर है कि वह किस तरह नीतीश कुमार की रखैल बनी हुई है और उसकी दलाली करने वाले कोई और नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित पत्रकार ही हैं।
अब सवाल यह उठता है कि बिहार की जनता क्या करे? क्या उसे विशेष राज्य की मुहिम में शामिल होना चाहिए? क्या उसे भी मराठियों के जैसे बिहारी बाबू की पहचान बनानी चाहिए? क्या क्षेत्रवाद को राष्ट्रवाद का पर्याय मान लेना चाहिए? यदि ऐसा हुआ तो क्या देश की अखंडता पर प्रतिकुल असर नहीं पड़ेगा? ऐसे अनेक सवाल हैं जो मुंह बाये खड़ी हैं। कोई इन सवालों का जवाब नहीं देता है। गुजरात का विकास विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद नहीं हुआ है। न ही महाराष्ट्र को इस दर्जे की कभी दरकार पड़ी है। दक्षिण के राज्य भी विशेष राज्य के दर्जे से वंचित हैं, लेकिन फ़िर भी खुशहाल हैं। फ़िर बिहार के विकास के लिए विशेष राज्य का बहाना क्यों? इससे भी बड़ा सवाल यह कि दैनिक हिन्दुस्तान जैसा प्रतिष्ठित अखबार राज्य हित में बात करने के बजाय नीतीश की दलाली क्यों कर रहा है?
लेखक नवल किशोर कुमार बिहार के युवा व तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे अपना बिहार डाट ओआरजी वेबसाइट के संचालक भी हैं.


