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कल्याण सिंह के बहाने : कहीं न उनको ठौर, न इनको

सुरक्षित सीढ़ी पर स्‍वर्णिम सपना साकार के लिए बेहिसाब मौके थे, लेकिन अगर कोई वाकई रसातल में ही जाने पर तुला हो तो आप क्‍या करेंगे। राजनीति में कल्‍याण सिंह की नजीर बेमिसाल है। जीवन में जो भी पायदान-मंजिल उन्‍होंने चाहा, हासिल किया। चाहे चिंतन का क्षेत्र हो, कुशल सांगठनिक और प्रशासनिक नियंत्रण क्षेत्र अथवा सफलता के ऊंचे पायदानों को हासिल करने का हो, कल्‍याण सिंह लगातार श्रेष्‍ठता साबित करते ही रहे। इतना ही नहीं, अपने स्‍खनल का दौर भी उन्‍होंने पूरी शर्तों पर और अपने हिसाब और पूरे जज्‍बे के साथ निभाया। हर बार अपने फैसलों के लिए कभी कीमत भी चुकाई, तो कीमतें कभी हासिल भी किया। लेकिन आखिरकार कल्‍याण अब उस मांद में तिबारा वापस जाने को तैयार हैं, जहां से उन्‍होंने जीवन की शुरुआत की थी।

सुरक्षित सीढ़ी पर स्‍वर्णिम सपना साकार के लिए बेहिसाब मौके थे, लेकिन अगर कोई वाकई रसातल में ही जाने पर तुला हो तो आप क्‍या करेंगे। राजनीति में कल्‍याण सिंह की नजीर बेमिसाल है। जीवन में जो भी पायदान-मंजिल उन्‍होंने चाहा, हासिल किया। चाहे चिंतन का क्षेत्र हो, कुशल सांगठनिक और प्रशासनिक नियंत्रण क्षेत्र अथवा सफलता के ऊंचे पायदानों को हासिल करने का हो, कल्‍याण सिंह लगातार श्रेष्‍ठता साबित करते ही रहे। इतना ही नहीं, अपने स्‍खनल का दौर भी उन्‍होंने पूरी शर्तों पर और अपने हिसाब और पूरे जज्‍बे के साथ निभाया। हर बार अपने फैसलों के लिए कभी कीमत भी चुकाई, तो कीमतें कभी हासिल भी किया। लेकिन आखिरकार कल्‍याण अब उस मांद में तिबारा वापस जाने को तैयार हैं, जहां से उन्‍होंने जीवन की शुरुआत की थी।

 

अब कल्‍याण का फैसला है कि वे अपने इन अशुद्ध पितर-पक्ष के बाद पावन नौ-दुर्गा में हिन्‍दुत्‍व का जागरण शुरू करने के लिए भाजपा का भगवा आंचल ओढेंगे। इन पुनर्प्रवेश को लेकर तुरही के बजाय पिपहरी जैसी बज रही है। आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी कम से कम नुकसान रोकने की कोशिश में है, और इसी प्रयास में लोध-वोट हासिल करने के लिए कल्‍याण सिंह को मोहरा बनाने की कवायद चल रही है। लेकिन चंद नेताओं को छोड़कर भाजपा का अधिकांश हिस्‍सा कल्‍याण को लेकर आशंकित है।  पिछले एक दशक के दौरान अपनी लगातार हो रही छीछालेदर के चलते भाजपा में हालात तो ऐसे बन चुके हैं कि कहीं कल्‍याण का यह तीसरा भाजपा-प्रवेश खुद भाजपा के अशुद्ध-दिनों में ही न तब्‍दील हो जाए।

एक बार मंत्री, तीन बार मुख्‍यमंत्री और नौ बार भाजपा समेत दस बार विधायक चुने जा चुके कल्‍याण सिंह की हालत आज राजनीति की थाली में बैंगन सरीखी है। लेकिन शुरूआत में ऐसा नहीं था। पांच जनवरी-32 को अलीगढ़ में जन्‍मे कल्‍याण सिंह 50 साल पहले जनसंघ की राजनीति में शामिल हुए। लेकिन पांच साल के कैरियर में उन्‍हें विधायकी मिल गयी। संघर्ष और तेज-तर्रार अंदाज और निखरा और जल्‍दी ही वे प्रदेश के नेता माने लगे। भाजपा के एक वरिष्‍ठ पदाधिकारी बताते हैं कि संगठन क्षमता और कार्य-कुशलता को लेकर कल्‍याण अनूठे थे। आम कार्यकर्ता से सीधे मिलने-बतियाने के अलावा आम आदमी, किसान और श्रमिकों को लेकर उन्‍होंने प्रदेश का चप्‍पा-चप्‍पा छान लिया था।

मिर्जापुर में कभी साथी रहे एक वरिष्‍ठ सहयोगी के घर कई दिन काटे। सादी बंडी और लुंगी में घरवालों के साथ इतना घुलमिल गये कि इस नेता के नन्‍हें बेटे के दोस्‍त बन गये। जुझारू तेवर के चलते कुल मिलाकर 7 बार 20 महीना तक जेल की हवा खायी। इमर्जेंसी के बाद जनता पार्टी से स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री बने। फिर प्रदेश में पार्टी की कमान दो बार सम्‍भाली और सन 91 से लेकर दो बार मुख्‍यमंत्री बनाये गये। एक बार विधानसभा में नेता विरोधी दल का ओहदा भी सम्‍भाला। इस समय तक कल्‍याण सिंह प्रदेश भाजपा के निर्विवाद एकमात्र नेता बन चुके थे। 4-कार यानी कार्यकर्ता, कार्यक्रम, कार्यालय और कोष वाला उनका नारा गलियों में गूंजने लगा। अफसरशाही में अड़ंगे हटाने की उनकी कड़ी प्रशासनिक शैली के चलते राजनीति में निक्षेप शब्‍द प्रवेश कर गया। अनावश्‍यक आर्थिक प्रस्‍तावों को शालीनता के साथ ठुकराने वाले जुमले गीत बन गये कि: चित्‍त तो है लेकिन वित्‍त का संकट है। कल्‍याण ने ही बिना टैक्‍स लादे हुए राजस्‍व बढ़ाने की कोशिशें कीं।

लेकिन अचानक मानो, इस विकास-गति पर राहु की वक्र-दृष्टि पड़ गयी। कल्‍याण सिंह का शुक्र-पर्वत उनके मंगल-पर्वत की तीव्रता से जुड़ा और इसके साथ ही सचिवालय वाला सत्‍ता-केंद्र, अब राजधानी की अब तक उपेक्षित रही राजाजीपुरम के एक अनाम-से बंगले की ओर फिसलने लगा, जहां लखनऊ नगर निगम की सभासद कुसुम राय रहती थीं। मंत्रियों-अफसरों की लाल-नीली बत्तियों वाली चमचमाती गाडि़यां सत्‍ता के इस नये उप-ठिकाने पर उमड़ने लगीं। पहली कल्‍याण सरकार में रहे एक मंत्री बताते हैं कि एक बार कल्‍याण-पुत्र राजबीर सिंह ने उन्‍हें छह अफसरों के तबादले की सिफारिश की और निवेदन किया था कि कल्‍याण सिंह को इसकी खबर न दी जाए। लेकिन कल्‍याण सिंह ने मंत्री को कड़े आदेश देते हुए पूछा था कि अपना विभाग तुम चलाओगे या राजबीर। जबकि सूत्रों के अनुसार अगली सरकार बनने पर पार्टी के उत्‍तरांचल से एक विधायक ने अपना काम कराने के लिए जब सिफारिश की तो कल्‍याण सिंह ने अपनी करीबियों से यह मामला देखने की नसीहत दे दी। बाद में मामला पचास लाख में निपटाया गया था।

सरकार पर आरोपों की झड़ी लगती जा रही थी। नतीजा, भाजपा में पनपी इस अनजान सी नई सड़ांध-दुर्गंध के चलते उन क्षत्रपों ने बाहें चढ़ा लीं जो कभी कल्‍याण के आज्ञाकारी सहयोगी थे। राजाजीपुरम मसले को नेतृत्‍व ने गंभीरता से लिया और आखिरकार कल्‍याण सिंह को इस्‍तीफा देने का आदेश दिया। लेकिन पूरी भाजपा अब तक धड़ों में बंटती दीखनी लगी। कल्‍याण ने शर्त रखी कि राजनाथ सिंह को मुख्‍यमंत्री बनाना हर्गिज मंजूर नहीं किया जाएगा। सो, यह कुर्सी मिली रामप्रसाद गुप्‍ता को। लेकिन विरासत का विवाद बढ़ता रहा और गुप्‍ता को भुलक्‍कड़ और लुंज-पुंज करार देकर आखिरकार राजनाथ सिंह का राज-तिलक किया गया। पूर्व सांसद विद्यासागर सोनकर का दावा है कि कल्‍याण सिंह के केवल निजी-हठों के चलते ही यह हालत हुई थी।

हालांकि इससे झगड़ा और बढ़ा। चिंगारी में फूस का काम किया, कल्‍याण सिंह की नयी बयानबाजी ने, जिसमें अब तक उन्‍हें खुद को प्रदेश का नेता के बजाय खुद को पिछड़ा और बाद में केवल लोधी जाति तक समेट दिया। राजनाथ को शकुनी बताने के साथ ही भाजपा के शीर्ष-पुरूष अटलबिहारी बाजपेई भी निंदा-शिकार बने। कल्‍याण से साफ तौर पर केवल यह ही नहीं कहा कि प्रधानमंत्री भले अपनी कुर्सी न छोड़ सके लेकिन मैंने कुर्सी छोड़ ही दी है, बल्कि बाजपेई को पियक्‍कड़ और भुलक्‍कड़ तक करार दे दिया। कल्‍याण समर्थकों ने कहा कि भाजपा का विनाश इस शकुनी की करतूतों का परिणाम होगा।

बहरहाल, अयोध्‍या ने राम-मंदिर पर माथा टेका और भाजपा की गली छोड़ कर जनक्रांति पार्टी बनायी। यह और बात है कि अगले चुनाव में कल्‍याण के चंद लोगों को छोड़ कर सारे साथी-संगी जमीन पर चित्‍त हुए। मगर अब तक उनके बेटे राजबीर सिंह और उनकी साथी कुसुम राय को अगली सरकार में मंत्री पद मिल गया। लेकिन कल्‍याण परास्‍त तो हुए ही थे, सो भाजपा की डगर की ओर फिर बढ़ गये। हैरत की बात है कि इस पुनर्प्रवेश के समय राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह ही थे। खैर लोध-वोट के चलते कल्‍याण और भाजपा को अपना-अपना लाभ मिलने की उम्‍मीद थी, लेकिन ठीक उल्‍टा हुआ। पुत्र और पुत्रवधू तक हार गये। कल्‍याण फिर चारों खाने चित्‍त। लेकिन कल्‍याण ने तुरूप का पत्‍ता चलाया कि टिकट बांटने में पक्षपात किया गया है।

कल्‍याण फिर जनक्रांति पार्टी का झंडा लेकर निकले। इसके बाद से ही कल्‍याण लगातार हर शर्त लगाते रहे और हारते ही रहे। और अब फिर आ रही हैं लोकसभा-2014 की तैयारियां। कल्‍याण सिंह के पास अब कोई विकल्‍प नहीं है। विकल्‍प तो भाजपा के पास भी नहीं है। लेकिन पार्टी यह मान कर चल रही है कि उसके साथ जुड़ने में उसे लाभ भले न हो, लेकिन नुकसान तो नहीं है। मगर भाजपा की यह कोरा ख्‍याली-पुलावी ही है। पार्टी-कार्यकर्ता उस आतंक से उबरे नहीं है जो कल्‍याण के जाने-आने और फिर जाने के चलते पार्टी की जो दुर्गति से हुई थी। एक वरिष्‍ठ नेता कहते हैं कि भाजपा को कभी जगन्‍नाथ-रथ माना जाता था जो अपने आप वह आगे बढ़ती थी। लेकिन अब शायद यह बैलगाड़ी बन चुकी है। बस आशंका यह है कि न जाने कौन आकर यह रथ ले भागे। यह आशंका गलत भी नहीं। केशरी त्रिपाठी तो कल्‍याण सिंह को एक बार एक्‍स्‍पायरी डेट वाली दवा तक बता चुके हैं जिससे केवल नुकसान होता है। एक अन्‍य पदाधिकारी बताते हैं कि शायद अब भाजपा की कमजोरी होंगे कल्‍याण और कल्‍याण की कमजोरी बन जाएगी भाजपा। इस तथ्‍य के बावजूद पार्टी की राजनीति में पिछड़ी जाति के नेता फिलहाल चित्‍त पड़े हैं।

दरअसल, कल्‍याण की बातें दोहरी होती हैं। उनकी पहली सरकार में मंत्री एक मंत्री ने बताया कि अयोध्‍या ढांचा ढहाने की खबर पर कल्‍याण की प्रतिक्रिया थी कि पिछड़ी जाति के मुख्‍यमंत्री को नीचे गिराने के लिए ही यह ब्राह्मणों की चाल थी। लेकिन कुछ देर बाद जब उन्‍हें अपना लाभ दिखा तो उन्‍होंने ऐलान किया कि राममंदिर हमारी राष्‍ट्रीय अस्मिता का प्रश्‍न है। केवल इतना ही नहीं, उन्‍होंने सरकार के आला अफसर से ऐलानिया कहा था कि जो भी लिखवाना हो, लिखवा लो। मैं यह नहीं चाहता कि मेरे चलते किसी अफसर का गला फंसे। और इस लिखापढ़त के चलते ही कल्‍याण सिंह को एक दिन के लिए जेल भेजा गया और इसे कल्‍याण ने खुद के राष्‍ट्रीय नेता के तमगा के तौर पेश किया। कल्‍याण का बाद के दिनों बाद बयान यह भी आया कि अयोध्‍या का ढांचा गिराने के लिए जिम्‍मेदार मैं नहीं था, बल्कि तब की केंद्र वाली कांग्रेस ही दोषी थी। गौरतलब है कि पार्टी छोड़ने के हर बार कल्‍याण सिंह भाजपा की ताबूत में आखिरी कील का दावा करते रहे हैं। राजनीति में गिरावट, खुद को अपने भीतर समेटे रहने और कभी खुद को राष्‍ट्रवादी कहने वाले यह शख्‍स, अगर अब को लोध का नेता बनाने पर तुले हुए हैं, तो इसकी वजहें भी तो हैं। इसी को तो बेबस मजबूरी का नाम दिया जाता है।

लेखक कुमार सौवीर उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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