आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और विशेष रूप से ट्रांसजेनिक्स के देश की खाद्यान्न सुरक्षा में संभावित मूल्य के बारे में चल रही बहस के बीच प्रधानमंत्री की साइंटफिक एडवाइजरी काउंसिल ने देश की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए जीएम फसलें अपनाने की सलाह दे डाली। हालांकि संयुक्त राष्ट्र प्रायोजित अंतरराष्ट्रीय कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास ( इंटरनेशनल एस्सेस्मेंट आफ एग्रीकलचर साइंस एंड टेक्नोलाजी फार डेवलेपमेंट- आईएएएसटीडी) आंकलन में दुनिया भर के 900 विशेषज्ञों द्वारा पिछले 50 वर्षों में सभी कृषि प्रौद्योगिकियों और पद्धतियों का मूल्यांकन करके इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ” ऐसी कृषि नीतियाँ जो पारिस्थितिकी दृष्टिकोण एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देते हुए जैविक खेती को प्रोत्साहित करती हैं वे गरीबी को कम करने और खाद्य सुरक्षा में सुधार लाने में ज्यादा सार्थक साबित हुई हैं।
देश के मौजूदा कृषि परिदृश्य पर नजर डालें तो बीटी कॉटन भारत में इस वक्त एकमात्र बाजार में उपलब्ध जीएम फसल है और केन्द्र सरकार तथा उद्योग जगत ने इसकी कामयाबी की कहानी को खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। यह कहा जा रहा है कि इस फसल से उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है और उत्पादन लागत में गिरावट आयी है। हालांकि जमीनी सच्चाई इसके ठीक विपरीत है।
कृषि संसदीय समिति द्वारा मार्च 2012 में इस बारे में एक अध्ययन रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र में जारी की। इस अध्ययन रिपोर्ट के लिये समिति में शामिल विभिन्न दलों के 31 संसदों ने देश के विभिन्न कपास उत्पादक क्षेत्रों के किसानों के साथ गहन चर्चा की। सरकारी एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराये गये तथ्यों तथा आंकड़ों एवं जाने-माने कपास वैज्ञानिकों की बातों का विश्लेषण करने के साथ-साथ विदर्भ के किसानों के साथ बातचीत के बाद समिति में शामिल सांसद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि बीटी काटन की गाथा उतनी सुहावनी नहीं है जैसी की प्रचारित की जा रही है। विदर्भ में शुरुआती वर्षों में कुछ बेहतर नतीजों के बाद उत्पादन में गिरावट आने लगी है और आम तौर से सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर रहने वाले 85 प्रतिशत कपास उत्पादक किसानों को बीटी काटन से कोई लाभ नहीं हैं। इसके बीज के दामों की भारी लागत लगाने के कारण किसानों पर भारी कर्ज का जोखिम है।
जब हम खाद्य सुरक्षा के बारे में बात करते हैं तो हम हमेशा के लिए खाद्य के उत्पादन को इतना बढ़ाना चाहते हैं कि यह बढ़ती आबादी की भूख शांत करने के लिए पर्याप्त हो। ऐसे में कोई ताज्जुब की बात नहीं कि मल्टी नेशनल कंपनिया हमें जैव तकनीक का छलावा देकर अपनी जेबें भरना चाहती हैं। हम खाद्य सुरक्षा के लिए नयी तकनीकों के उपयोग की ऐसी नीतियां बनाते हैं जो खाद्य उत्पादन में वृद्धि करें। पर खाद्य सुरक्षा को गरीबी कम करने और दुनिया में सभी लोगों में भोजन की क्रय शक्ति हो, के नजरिये से भी देखा जा सकता है। दरअसल खाद्य सुरक्षा का सही मतलब -हर किसी की पहुंच के अंदर सस्ते और पौषटिक भोजन की उपलब्धता ही है। खाद्य सुरक्षा के नाम पर अब खाद्य पदार्थो की पहुंच निम्न आय वर्ग के लोगों के हाथ से निकलती जा रही है।
पिछले काफी समय से खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों के चलेते कुपोषण की समस्या से आज भी हमें निजात नहीं मिल सकी है। अब देश की घटती खेतिहर भूमि और बढ़ती आबादी की खाद्य सुरक्षा के लिए धुंधली पड़ चुकी हरित क्रांति के बाद अब जीएम फसलों को अपनाने पर बल दे रहा है। पर जीएम फसलों के आने का सीधा मतलब खाद्यान्न् की कीमतों में कमी और हर किसी की पहुंच के अंदर अनाज व सब्जी खरीदने की शक्ति लाजमी है।
हम आज अभी भी मोनसेंटो के बीटी काटन के प्रवेश के बाद से कपास बीज में अपनी में संप्रभुता नष्ट होने की भारी कीमत चुका रहे हैं: कपास बीज की कीमत में 800 गुना वृद्धि और कीटनाशकों का उपयोग में बढ़त के साथ फसल की विफलता से कपास किसान कर्ज के बोझा के तले बुरी तरह दब चुके हैं। आज, हमारे कपास के बीजों का 95 फीसदी स्वामित्व 60 भारतीय बीज लाइसेंस कंपनियों के साथ समझौते के माध्यम से मोनसेंटो के हाथों में है।
सभी जीन संवर्धित फसलों के बीज बौद्धिक सम्पदा क़ानून के तहत बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों द्वारा पेटेंट हैं और यह कम्पनियां इन बीजो पर अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, भारत में व्यावसायिक उत्पादन के लिए जारी इकलौती फसल बी टी कॉटन के मामले में यह मंशा साफ़ देखी गयी.। राष्ट्रिय स्तर पर भी मोनसेंटों ने किस तरह कॉटन बीज के दाम बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों पर दबाव डाला वह जग जाहिर है। भारत में व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन मंज़ूरी की सीमा तक पहुंची पहली जीन संवर्धित फसल बी टी बैंगन में भी क्राय 1 ए सी नामक जीन था जिसका मूल अधिकार मोनसेंटो और उसके ज़रिये बी टी बैंगन विकसित करने का लाइसेंस भारत में उसकी सहयोगी कम्पनी महको के पास है.।
जीएमओ मुनाफाखोर कंपनियों के बीज एकाधिकार पर आधारित गहन मूलधन निवेश वाली गैर- टिकाऊ कृषि तकनीक है जो कर्ज मार झेल रहे भारतीय किसानों के लिए एक अभिशाप से कम नहीं है। वर्तमान दौर में पूरे विश्व में सिर्फ छह कंपनियों का वैश्विक कृषि आदानों जैसे बीज, खाद और कीटनाशकों पर कब्जा है।जो अनाज, खाद्य तेल, केले, कोको और कॉफी जैसे वस्तुओं के लिए वैश्विक बाजार पर नियंत्रण करे हैं। इन जीएम तकनीक को बढ़ावा देने का मतलब मानसेंटो जैसी बीज कंपनियों का भारतीय कृषि पर एकाधिकार जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे लाखों भारतीयों की खाने तक पहुच को कोसों दूर कर देगा। जीएम फसलों का भारतीय कृषि में पदार्पण केवल उन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों को ही लाभ पहुंचायेगा जो अपने जीएम बीजों के माध्यम से हमारी कृषि व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं। यदि जीएम फसलें आती हैं तो सरकार कृषि व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बीज बाज़ार को पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देगी।
लेखिका डा. सीमा जावेद पर्यावरण विद व स्वतंत्र पत्रकार हैं.


