जी हां, वह प्रशांत जी उठा है, जिसके कारण मधुबनी दो दिनों तक लगातार जला। कुल 10 लोग (सरकार द्वारा केवल 3 लोगों की पुष्टि) मारे गये। वह दिल्ली के महरौली में अपनी प्रेमिका के साथ पाया गया। अब जबकि वह बरामद हो चुका है और सीएम नीतीश कुमार ने भी “अंत भला तो सब भला” कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है, अनेक सवाल अब भी मौजूं हैं। सबसे बड़ा सवाल है संवादहीनता की।
बड़ी पुरानी कहावत है कि बात करने से बात बनती है। बात नहीं करने से दूरी तो बढती ही है, अविश्वास भी बढता है। और जब अविश्वास बढता है तब मनुष्य सही और गलत में विभेद नहीं कर पाता। लोकतंत्र में जनता के साथ बातचीत शासन प्रणाली का अहम हिस्सा है। यही वजह है कि देश की शासन व्यवस्था में विधायिका का प्रावधान है। लोग अपने लिए जनप्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं ताकि उनकी बात शीर्ष तक पहूंच सके। लेकिन अफ़सोस कि 21वीं सदी में यह महज एक कहावत ही बनकर रह गया है। चुने गये जनप्रतिनिधि स्वयं को जनता का सेवक न मानकर स्वयं को शासक का प्रतिनिधि और बहुत हदतक शासक भी मानते हैं। ऐसे में कार्यपालिका और विधायिका के बीच कोई संबंध स्थापित होने की संभावना नहीं बनती।
हाल ही में घटित हुआ मधुबनी कांड इसी संवादहीनता का परिणाम है। घटना के मूल में प्रशांत और प्रीति (काल्पनिक नाम) के बीच प्रेम प्रसंग है। प्रशांत एक किसान परिवार का लड़का है तो प्रीति जिले के एक बड़े पदाधिकारी की बेटी। 4 सितंबर को प्रशांत के परिजन थाना पहूंचे और उसके अपहरण किये जाने को लेकर मुकदमा दर्ज करने का आग्रह किया। लेकिन स्थानीय थाना ने उनकी एक न सुनी। थक हारकर उसके परिजन जिले के आरक्षी अधीक्षक के पास गुहार लगाने पहूंचे। इसके बावजूद स्थानीय थाना प्रभारी ने रिपोर्ट दर्ज करने के नाम पर केवल सनहा दर्ज कर लिया। इस कड़ी में एक दिलचस्प मोड़ 11 सितंबर को आया जब प्रीति के पिता ने अपनी बेटी के अपहरण का मामला दर्ज कराया। यह उसके बड़े पदाधिकारी होने का ही परिणाम था कि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रशांत के वयोवृद्ध दादा को हिरासत में ले लिया और उन्हें 3 दिनों तक थाने के हाजत में बंद रखा। इस दौरान पुलिस ने बर्बरता की सीमा पार करते हुए उसके दादा के साथ मारपीट की। बाद में जब स्थानीय जनता ने थाने का विरोध किया तब उन्हें मुक्त किया गया।
मधुबनी की इस अजीबोगरीब घटना में ट्विस्ट तब आया जब पुलिस को एक सिरकटी लाश मिली। प्रशांत की मां विनीता देवी सहित अन्य परिजनों ने उस लाश की पहचान प्रशांत के शव के रुप में की। विनीता देवी के अनुसार पुलिस ने जिस मृतक का शव बरामद किया, उसने वही फ़ुलपैंट, शर्ट और मोजा पहन रखा था, जिन्हें पहनकर प्रशांत गायब हुआ था। इसके अलावे प्रशांत की मां ने यह भी कहा कि बरामद शव के पैर में एक निशान है जो उसके बेटे के निशान से मेल खाता है। जबकि पुलिस का तर्क यह था कि बरामद शव की उम्र करी 40 वर्ष है और वह प्रशांत की लाश नहीं हो सकती है।
इस बीच प्रशांत के परिजनों ने 11 अक्टूबर को मधुबनी जिला समहरणालय परिसर में आमरण कर दिया। उनकी मांग थी कि पुलिस उनके जिगर के टुकड़े की लाश सौंप दे। पहले दिन पुलिस और स्थानीय प्रशासन द्वारा पीड़ित परिवार से बातचीत करने की कोई कोशिश नहीं की गई। स्थानीय मीडिया ने भी इस घटना की उपेक्षा की, लेकिन बात आम जनता के बीच जंगल में लगी आग की तरह फ़ैली। दूसरे दिन यानी 12 अक्टूबर को जैसे-जैसे सूरज आसमान में गरम होता गया, मधुबनी में गर्मी बढती गयी। आम जनता प्रशांत के परिजनों के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गयी है। तब स्थानीय प्रशासन की आंख खुली और फ़िर आम जनता के बीच उसकी झड़प हो गयी। इस हल्के-फ़ुल्के झड़प का जवाब पुलिस ने संगठित तरीके से दिया। निहत्थे लोगों पर जमकर लाठीचार्ज किया गया। इस घटना में पुलिस ने धरनास्थल पर प्रशांत की मां, दादी और दादा सहित सभी को जमकर पीटा। आम जनता ने भी सीमायें तोड़ दी। भीड़ टाउन थाना पहूंची और उसने थाने को आग के हवाले कर दिया। पुलिस ने फ़ायरिंग करना शुरु कर दिया। करीब 100 राऊंड गोलियां चलायी गई। इस घटना में 4 लोग आन द स्पाट मारे गये। जबकि 21 लोग गंभीर रुप से घायल हो गये। इनमें से एक युवक रवीन्द्र की मौत पीएमसीएच में इलाज के दौरान हो गयी।
12 अक्टूबर की घटना के बाद पटना में बैठी सुशासनी हुकूमत ने जिले के एसपी और डीएम का तबादला कर दिया। स्थानीय प्रक्षेत्रीय डीआईजी को वापिस मुख्यालय बुला लिया गया और उसे सजा के तौर पर प्रोन्नति दे दी गयी। इसके अलावे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मधुबनी मामले की न्यायिक जांच का आदेश देकर मामले को सलटाने की कोशिश की। लेकिन उनकी यह कोशिश बेकार साबित हुई और अगले दिन भी मधुबनी धू-धूकर जला। बासोपट्टी में थाना और प्रखंड विकास पदाधिकारी के कार्यालय को जला दिया गया।
वामदलों ने सामूहिक रुप से पन्द्रह अक्टूबर को बिहार बंद का आहवान किया। इस बंद को मुख्य विपक्षी दल राजद सहित अन्य सभी विपक्षी दलों और अनेक स्वयं सेवी संगठनों ने भी अपना समर्थन दिया। इस दिन पूरे बिहार में बंद का मिश्रित असर देखा गया और जब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद एवं लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान राजधानी पटना की सड़कों पर बंद के समर्थन में उतरे तभी बिहार के डीजीपी अभयानंद ने प्रेस कांफ़्रेंस में इस बात का खुलासा किया कि जिस प्रेमी युगल की वजह से मधुबनी दो दिनों तक जला, वह प्रेमी युगल दिल्ली के महरौली में है। महरौली में रहने वाले एक बिहारी व्यवसायी ने प्रशांत और प्रीति को देखकर 100 नंबर पर फ़ोन कर स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना दी। डीजीपी एक बार फ़िर पुलिस के उस कथन को सत्यापित करने की कोशिश करते दिखे कि मधुबनी जिले में बरामद सिरकटी लाश प्रशांत की लाश नहीं है। हालांकि इससे पहले अपने जनता दरबार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मधुबनी में हुई घटना के लिए प्रशासनिक चूक को जिम्मेवार ठहराया और एक बार फ़िर अपने जुमले को दुहराया कि कानून अपना काम करेगा।
बहरहाल, एक तरह से मधुबनी घटना का पटापेक्ष हो चुका है। सीएम नीतीश कुमार की मानें तो अंत भला तो सब भला। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। सियासत अभी भी जारी है। सत्ता पक्ष के नेता इस पूरे घटनाक्रम के लिए विपक्ष को जिम्मेदार बता रहा है। जबकि विपक्ष इसे अभी भी सरकार की विफ़लता करार दे रहा है। वैसे इस मामले में सबसे उल्लेखनीय यह कि यदि संवादहीनता नहीं होती तो संभव था कि मधुबनी में लोगों को अपनी जान नहीं देनी पड़ती।
संवादहीनता समाज के अनेक स्तरों पर समाप्त किये जाने की आवश्यकता है। फ़ौरी तौर पर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि प्रशांत और प्रीति के साथ उनके परिजनों के बीच संवादहीनता, मधुबनी पुलिस और प्रशांत के परिजनों के बीच संवादहीनता, राजनीतिक स्तर पर पक्ष-विपक्ष में संवादहीनता और सबसे महत्वपूर्ण यह कि सरकार और आम जनता के बीच संवादहीनता के कारण यह स्थापित हो गया कि बिहार में सुशासन नहीं, बल्कि एक अक्षम शासक का राज है। वैसे इस मामले में बहुत बड़ी भूमिका मीडिया की भी रही। विधायिका के जैसे ही उसने भी सरकार की दलाली की। आम जनता के विचारों के सम्प्रेषण में वह विफ़ल रहा और नतीजतन मधुबनी दो दिनों तक लगातार जला। अब सबसे बड़ा सवाल यह कि इस पूरे घटना के लिए जिम्मेवार किसे माना जाये। राज्य सरकार के मुखिया या उनके जन पर भारी तंत्र या खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ घोषित करने वाले मीडिया या प्रशांत-प्रीति के परिजनों को या फ़िर पूरे समाज को। आखिर कौन है मधुबनी में हुए इस जुल्म का गुनाहगार।
लेखक नवल किशोर कुमार बिहार के युवा, प्रतिभाशाली और बेबाक जर्नलिस्ट हैं. वे अपना बिहार डाट ओआरजी न्यूज पोर्टल के संपादक भी हैं.


