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दुख-सुख

पंडीजी का होटल और जे.के. मोटल

मुझे याद है औरंगाबाद में पंडीजी का होटल, रमेश चौक से बिलकुल नजदीक. बड़ी तारीफ़ थी उनकी, “बहुत अच्छा खिलाते हैं”. अक्सर औरंगाबाद आना-जाना होता था और पता नहीं क्यों हमेशा कोई ना कोई पंडीजी के होटल का प्रशंसक भी साथ होता था, अपनी रोबदार चेहरे और मूँछो वाले पंडीजी का तकिया कलाम था- बैठिये हूजूर अभी खेला दिखाते हैं. खेला दिखाने का मतलब था आपको अभी खाना खिलाते हैं, अभी चोखा देते हैं, अभी तरकारी देते हैं इत्यादि इत्यादि.

मुझे याद है औरंगाबाद में पंडीजी का होटल, रमेश चौक से बिलकुल नजदीक. बड़ी तारीफ़ थी उनकी, “बहुत अच्छा खिलाते हैं”. अक्सर औरंगाबाद आना-जाना होता था और पता नहीं क्यों हमेशा कोई ना कोई पंडीजी के होटल का प्रशंसक भी साथ होता था, अपनी रोबदार चेहरे और मूँछो वाले पंडीजी का तकिया कलाम था- बैठिये हूजूर अभी खेला दिखाते हैं. खेला दिखाने का मतलब था आपको अभी खाना खिलाते हैं, अभी चोखा देते हैं, अभी तरकारी देते हैं इत्यादि इत्यादि.

हर माँग का जवाब था – अभी खेला दिखाते हैं. उनकी बातें मजेदार थी पर मुझे न तो उनका खाना कभी रास आया और न ही खाने की जगह, गंदगी का अंबार था, पर बेहतर विकल्प भी नहीं थे (फिर भी मैं पंडीजी का शुक्रगुजार हूँ, उन्होंने बहुतों को बिना खाए सोने से बचाया). फिर सुना जे.के. होटल में एक रेस्टुरेंट है जिसमें साफ़-सुथरा खाना मिलता है, फिर वहीं शुरू हो गया. कुछ सालों पहले जे.के. होटल वालों ने ही जे.के. मोटल खोला, जो औरंगाबाद में होटल व्यवसाय के क्षेत्र में एक क्रान्ति थी. क्रान्ति इसलिए कि छोटे जगहों पर अच्छे-खासे निवेश की साहस विरले ही करते हैं और जे.के.मोटल वालों ने यह साहस किया और बखूबी अपने स्तर और गुणवत्ता को लगातार बनाए रखा.

मैं आज भी जब कभी औरंगाबाद जाता हूँ तो जे.के. मोटल का कुल्चा और चिकेन चिल्ली खाना नहीं भूलता. अब आप सोच रहे होंगे कि यह मुझे क्या हो गया, आज अचानक होटल और खाने की बात कहाँ से आ गयी. दरअसल बात ऐसी है कि औरंगाबाद में जे.के. ग्रुप के मालिक अजीत सिंह ने कल से एक भव्य अस्पताल J.K. Hospital & Research Center की शुरुआत की है, ठीक जे.के.मोटल के सामने. आधारभूत संरचना और तैयारी देखने से आभास होता है कि वे इसे एक बड़ा आयाम देना चाहते हैं और औरंगाबाद में पटना के बड़े अस्पतालों में उपलब्ध तमाम अत्याधुनिक सुविधाओं को उपलब्ध कराने को संकल्पित हैं.

मुझे अखंड विश्वास है कि निश्चय ही वे पूर्व की भांति इस बार चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में भी निरंतर गुणवत्ता हासिल करेंगे. कल पुलिस महानिरीक्षक (गृह रक्षावाहिनी), बिहार श्री आलोक राज साहब ने बतौर मुख्य अतिथि इस अस्पताल का उद्घाटन किया. उन्होंने अपने भाषण के क्रम में बड़ी मजेदार बात कही कि “पुलिस पदाधिकारियों को दिन-प्रतिदिन समाज के नकारात्मक पक्ष से रूबरू होना पड़ता है और मैं इस मौके को अपने मानवीय संवेदना के खाते में एक सकारात्मक पक्ष की आय के रूप में देख रहा हूँ”.

मुझे अपने गाँव अरई में आलोक राज साहब के औरंगाबाद से पटना लौटने के क्रम में उनके आतिथ्य-सत्कार का मौक़ा मिला. इस मौके पर मेरे मन में एक ख्याल आया कि क्यों न मैं भी उनके मानवीय संवेदना के खाते में एक सकारात्मक पक्ष की आय बढ़ाने में सहयोग करूँ. बस अपने बचपन से चले आ रहे पौधा-रोपण के शौक को पूरा करते हुए मैंने अपने वाटिका में उनके कर-कमलों से आम का एक पौधा लगवाया. इससे शायद मेरे खाते में भी एक नेक कार्य जुड़े.

रजनीश कुमार के ब्लाग से साभार.

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