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अगर भागवत की कृपा यूं ही बरसती रही तो गडकरी देश के पीएम पद के उम्मीदवार भी बनेंगे

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के बचाव में आकर बीजेपी के दिग्गज़ नेताओं ने साबित कर दिया कि वो भी उसी चाटूकार जमात के नेता बन गए हैं जिनकी जगह कांग्रेस में हुआ करती है। बड़ा सवाल लाखों स्वयंसेवकों के ‘परमपूज्य’ पर लग गया है, जिन्होंने बीजेपी को दीनदयाल की पार्टी से ‘मालामाल’ की पार्टी में तब्दील कर दिया। परमपूज्य यानी आरएसएस चीप मोहनराव भागवत, जिन्होंने गडकरी की बतौर बीजेपी अध्यक्ष प्राण प्रतिष्ठा की, और कहावत को साकार कर दिया कि हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे।

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के बचाव में आकर बीजेपी के दिग्गज़ नेताओं ने साबित कर दिया कि वो भी उसी चाटूकार जमात के नेता बन गए हैं जिनकी जगह कांग्रेस में हुआ करती है। बड़ा सवाल लाखों स्वयंसेवकों के ‘परमपूज्य’ पर लग गया है, जिन्होंने बीजेपी को दीनदयाल की पार्टी से ‘मालामाल’ की पार्टी में तब्दील कर दिया। परमपूज्य यानी आरएसएस चीप मोहनराव भागवत, जिन्होंने गडकरी की बतौर बीजेपी अध्यक्ष प्राण प्रतिष्ठा की, और कहावत को साकार कर दिया कि हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे।

 

महाराष्ट्र के चंद्रपुर के रहने वाले मोहन भागवत बग़ैर परिवार के हैं, क्यों बताया जाता है कि संघ के प्रचारक होने की वज़ह से वो शादी नहीं कर सके। आरएसएस में ऐसे हज़ारों प्रचारक हैं जिन्होंने शादी नहीं की है, घर नहीं बसाया है और संघ के नियम के मुताबिक, वह घर-गृहस्थी और व्यवसाय से दूर रहने पर ही प्रचारक रह सकते हैं।

जाहिर है, इस नियम को मोहन भागवत के गडकरी प्रेम के बाद अगर प्रचारक मानने से इनकार कर दें तो संघ में भूचाल आना लाजिमी है। जब बीजेपी के अध्यक्ष हो कर गडकरी कमा सकते हैं, चीनी मिल, बिजली घर और तो और शराब बनाने का कारखाना लगा सकते हैं, एनसीपी और कांग्रेस नेताओं के साथ मिलकर बिज़नेस कर सकते हैं, व्यवसाय लाख से करोड़ और करोड़ से हज़ार करोड़ पहुंचा सकते हैं, एक हाथ में कारोबार, दूसरे से संगठन का विस्तार कर सकते हैं तो आरएसएस के प्रचारकों के हाथ में कौन सी मेंहदी लगी है जो उन्हें ही काले कारोबारियों के राज-काज के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देना ही मजबूरी है।

वक्त आ गया है कि आरएसएस के प्रचारक, झूठे राष्ट्रवाद की आड़ में सत्ता के दलालों की मटकी फोड़ दें। कम से कम अगर वो मोहन भागवत के फैसलों पर सवाल नहीं उठा सकते तो इतना तो करने का अधिकार उन्हें भागवत के आचरण ने दे ही दिया है कि वो प्रचारक रहते हुए अपना कारोबार खड़ा करें, घर-परिवार को मज़बूत करें, प्रचारक पद के जरिए जितना पैसा जुटा सकते हैं, उतने का बंदोबस्त कर के संघ की नैया को भागवत भरोसे छोड़ दें क्योंकि भागवत के पास गडकरी जैसों का बचाव करने के अलावा बाकी किसी के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है।

दरअसल गडकरी के बचाव के पीछे की भागवत कहानी भी किसी घोटाले से कम रोचक नहीं है। चंद्रपुर में भागवत परिवार और उनके रिश्तेदारों में कई को गडकरी से मोटा मोल बतौर चढ़ावा हासिल होता रहता है, एक प्रमुख रिश्तेदार गडकरी की कंपनी में बतौर निदेशक भी शामिल है, जाहिर तौर पर भागवत अगर गडकरी के लिए कथा बांच रहे हैं और प्रचारकों को गडकरी प्रसाद बांट रहे हैं तो उसकी अहम वज़ह वही रिश्तेदार हैं, जिनके बग़ैर संघ की भागवत कथा पूरी नहीं होती। तो रहिए तैयार, गडकरी के तीन साल के कार्यकाल में कोई दाग नहीं। अगर भागवत की कृपा यूं ही बरसती रही तो बेदाग, बहुचर्चित गडकरी देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी बनेंगे।

-रामबहादुर सिंह ([email protected])

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