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डाक्टर साहब मरे और स्वर्ग घूमकर लौट आए, जानिए उनका तजुर्बा क्या रहा

क्या वास्तव में स्वर्ग है? मृत्यु के बाद क्या है? ये ऐसे सवाल हैं जो सदियों से बहस का विषय बने हुए हैं. अब तक का वैज्ञानिक ज्ञान इसे स्वीकार नहीं करता लेकिन विज्ञान के तमाम बड़े साधक इन बातों को स्वीकार करते हैं. इस समय भी दुनिया में स्वर्ग के अस्तित्व को लेकर चर्चा जोरों पर हैं. यह चर्चा शुरू हुई हार्वर्ड मेडिकल हास्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ ईबेन अलेक्जेंडर की आने वाली नई किताब ‘प्रूफ ऑफ हेवेन’ को लेकर. हाल में डॉ ईबेन के अनुभवों को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका न्यूजवीक ने ‘हेवेन इज रीयल’ शीर्षक से अपनी कवर स्टोरी का विषय बनाया. डॉ ईबेन 2008 में बीमारी के दौरान कोमा में चले गये थे. उनका दावा है कि इस दौरान उन्होंने  मृत्यु के आसपास का अनुभव (नीयर डेथ एक्सपीरिएंस) किया. इस अनुभव के बाद उनकी मान्यताएं बदल गयीं. इससे पहले, 12 साल के बच्चे कोलटन बरपो ने भी मृत्यु के आसपास के अनुभव को बयान किया और 2010 में उसके अनुभवों को बतानेवाली पुस्तक ‘हेवेन इज फार रीयल’ प्रकाशित हुई. कोलटन ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफेन हाकिंग को भी चुनौती दी थी. अलबत्ता, न्यूजवीक की कवरस्टोरी पर दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों व कॉलमनिस्टों ने सवाल खड़े करने शुरू कर दिये हैं. लेकिन फिर भी यह जानना रोचक होगा कि आखिर ये अनुभव क्या हैं, उनकी किताबों में क्या है और जो लोग इन पर सवालिया निशान लगा रहे हैं, उनके तर्क क्या हैं? पढ़िए पहली किस्त..

क्या वास्तव में स्वर्ग है? मृत्यु के बाद क्या है? ये ऐसे सवाल हैं जो सदियों से बहस का विषय बने हुए हैं. अब तक का वैज्ञानिक ज्ञान इसे स्वीकार नहीं करता लेकिन विज्ञान के तमाम बड़े साधक इन बातों को स्वीकार करते हैं. इस समय भी दुनिया में स्वर्ग के अस्तित्व को लेकर चर्चा जोरों पर हैं. यह चर्चा शुरू हुई हार्वर्ड मेडिकल हास्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ ईबेन अलेक्जेंडर की आने वाली नई किताब ‘प्रूफ ऑफ हेवेन’ को लेकर. हाल में डॉ ईबेन के अनुभवों को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका न्यूजवीक ने ‘हेवेन इज रीयल’ शीर्षक से अपनी कवर स्टोरी का विषय बनाया. डॉ ईबेन 2008 में बीमारी के दौरान कोमा में चले गये थे. उनका दावा है कि इस दौरान उन्होंने  मृत्यु के आसपास का अनुभव (नीयर डेथ एक्सपीरिएंस) किया. इस अनुभव के बाद उनकी मान्यताएं बदल गयीं. इससे पहले, 12 साल के बच्चे कोलटन बरपो ने भी मृत्यु के आसपास के अनुभव को बयान किया और 2010 में उसके अनुभवों को बतानेवाली पुस्तक ‘हेवेन इज फार रीयल’ प्रकाशित हुई. कोलटन ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफेन हाकिंग को भी चुनौती दी थी. अलबत्ता, न्यूजवीक की कवरस्टोरी पर दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों व कॉलमनिस्टों ने सवाल खड़े करने शुरू कर दिये हैं. लेकिन फिर भी यह जानना रोचक होगा कि आखिर ये अनुभव क्या हैं, उनकी किताबों में क्या है और जो लोग इन पर सवालिया निशान लगा रहे हैं, उनके तर्क क्या हैं? पढ़िए पहली किस्त..

डॉ ईबेन अलेक्जेंडर एक जाने माने न्यूरो सर्जन हैं. अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय से उन्होंने एमडी की उपाधि हासिल की. वह हार्वर्ड मेडिकल हास्पिटल व तमाम प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों से जुड़े हुए हैं. 2008 में वह बीमार पड़ गये. इस बीमारी के दौरान वह कोमा में चले गये और इस दौरान जो अनुभव हुआ, उसने हमेशा के लिए उनकी मान्यताएं बदल दीं. डॉ ईबेन न्यूजवीक में खुद यह दावा करते हैं. न्यूजवीक में उन्होंने जो लिखा है, वह इस प्रकार है…

चार साल पहले एक दिन सुबह जगते ही मेरे सिर में भयानक दर्द शुरू हुआ. कुछ ही देर मेरे मस्तिष्क के उस हिस्से (कोर्टेक्स या ग्रे मैटर) ने काम करना बंद कर दिया जो मनुष्य के विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करता है. मुझे वर्जीनिया के लिंचबर्ग जनरल अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने कहा कि मुझे बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस (दिमागी बुखार) है. यह बीमारी बहुत कम देखने में आती है और आमतौर पर नवजात शिशुओं में ही. डॉक्टरों ने बताया कि मेरे दिमाग के सेरेब्रास्पाइनल द्रव में ई कोली बैक्टीरिया आ गया है, जो मेरे मस्तिष्क के ग्रे मैटर को चट करता जा रहा है. उस दिन जब मैं अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भरती हुआ, तब मेरे बचने की संभावना न के बराबर थी.

सात दिन तक मैं गहरे कोमा में था. इस दौरान मेरा शरीर निष्क्रिय था और मस्तिष्क के बारीक से बारीक क्रि याकलाप बंद हो चुके थे. सातवें दिन, मेरा इलाज कर रहे डॉक्टर जब यह विचार कर रहे थे कि इलाज जारी रखा जाये या बंद कर दिया जाये, मेरी आंखें खुल गयीं और मैं कोमा से बाहर आ गया. इस बात की कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं की जा सकती कि जब मेरा शरीर कोमा में था, मेरा चित्त और मेरी अंतरात्मा अच्छे से काम कर रही थी.

मैंने अमेरिका के विभिन्न प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में दशकों काम किया है. मैं वैज्ञानिक दुनिया में ही पला-बढ़ा हूं और मेरे पिता खुद एक न्यूरो सर्जन थे. मैं अपने पिता के पदचिह्नों पर चल कर न्यूरो सर्जन बना हूं. मैं जानता हूं कि जब व्यक्ति मृत्यु के करीब होता है, तो उसके दिमाग की अवस्था क्या होती है. मैं वैज्ञानिक विधियों में पूरा विश्वास रखता हूं, लेकिन मेरे इस अनुभव ने सबकुछ बदल दिया. अब मुझे लगता है कि बहुत सी बातें ऐसी हैं, जिनको उपलब्ध वैज्ञानिक विधियों से जांचा नहीं जा सकता.

बैक्टीरिया की वजह से कोर्टेक्स के न्यूरान पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुके थे लेकिन चित्त मुक्त होकर मेरी चेतना ब्रांड के किसी और हिस्से की यात्रा पर निकल गयी थी. ब्रांड के इस आयाम की मैंने कभी न कल्पना की थी और न कभी सपने में भी सोचा था कि ऐसी कोई दुनिया होती होगी. अगर कोमा में जाने से पहले कोई मुझे ऐसा कोई विवरण देता तो मैं उसे विस्तार से समझाता कैसे इस तरह की चीजें संभव ही नहीं हैं. लेकिन अब मैंने खुद इसका अनुभव किया और मैं मानने लगा हूं कि ये आयाम वास्तविक है और इनका अस्तित्व है. मैंने जो कुछ वहां देखा और अनुभव किया, उससे मेरी समझ की दुनिया ही बदल गयी. वह दुनिया ऐसी जहां हमारा अस्तित्व मस्तिष्क और शरीर के इतर भी है. ऐसी दुनिया जहां मृत्यु चेतना का अंत नहीं बल्कि विस्तार है. डा. ईबेन कहते हैं कि ब्रांड के इस आयाम की यात्रा किसी भी तरह के भौतिक आकलन से परे है.

मैं ऐसा अकेला व्यक्ति नहीं जिसने उन साक्ष्यों का अनुभव किया हो जो यह सिद्ध करते हैं कि शरीर के परे भी चेतना का अस्तित्व है. लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मुझसे पहले ऐसा कोई व्यक्ति नहीं रहा होगा जिसने ब्रांड के इस आयाम की यात्रा की हो जबकि उसका कोर्टेक्स पूरी तरह निष्क्रि य रहा हो और उसकी शरीर डॉक्टरों की निगरानी में सात दिन तक कोमा में रहा हो.

लगभग मत्यु के अनुभव (नीयर डेथ एक्सपीरिएंस) को इसी आधार पर खारिज किया जाता है कि इसके अनुभव का दावा करने वाले लोगों का कोर्टेक्स आंशिक रूप से गड़बड़ या सक्रि य रहता है और इसी के परिणामस्वरूप व्यक्ति स्वप्न में ऐसा अनुभव करता है. मेरे मामले में ऐसा नहीं हुआ. इस अनुभव के दौरान मेरा कोर्टेक्स मेनेंजाइटिस की वजह से पूरी तरह निष्क्रि य था और इसका प्रमाण हैं तमाम सीटीस्कैन और न्यूरोलाजिकल प्रेक्षण. मस्तिष्क और चित्त की मौजूदा समझ के मुताबिक, इस बात की संभावना कतई नहीं है कि कोमा के दौरान मेरे शरीर में तनिक भी चेतना रही हो.

मैंने इस दौरान जो अनुभव किया, उसके साथ दिमागी तारतम्य बैठाने में मुझे महीनों लगे. सिर्फ यही नहीं कि मैं जीवित कैसे हो गया बल्कि उस विलक्षण स्वर्गीय अनुभव की वास्तविकता को स्वीकारना वाकई बहुत कठिन है. मैंने देखा कि मैं बादलों के बीच हूं. बड़े-बड़े, रु ई का फाहे जैसे गुलाबी-सफेद बादल गहरे नीले-काले आकाश पर छाये हुए थे. बादलों से भी ऊपर, बहुत ऊपर, इतना ऊपर कि ऊंचाई किसी नाप से परे प्रतीत हो रही थी, कांच जैसे पारदर्शी परों वाले जीव आकाश में इधर से उधर जा रहे थे और उनके पीछे उनकी गति लकीर में तब्दील हो रही थी जैसे रॉकेट के साथ धुएं की लकीर बनती है. ये जीव क्या थे, नहीं पता. पक्षी या देवदूत, कुछ कह नहीं सकता. उस समय तो शब्द थे ही नहीं सिर्फ दृश्य था. लेकिन बाद में जब सोचा तो मेरे दिमाग में पक्षी या देवदूत जैसे शब्द इनके लिए आये. लेकिन इन दोनों में से कोई भी शब्द उन जीवों पर फिट नहीं बैठता है. वे जीव अलौकिक थे. इस धरती पर जो भी जीव हैं, उनसे बिलकुल अलग. वे बहुत परिष्कृत थे. ऊपर से मंत्रोच्चार जैसी ध्वनि आ रही थी और मैं आश्चर्य में था क्या ये ध्वनि उनके परों की गति से उत्पन्न हो रही है. बाद में मैंने महसूस किया कि ये ध्वनि उनके आनंदातिरेक से उत्पन्न हो रही हो होगी. क्योंकि यदि आनंद इस तरह से बाहर नहीं आता तो निश्चित तौर पर वे जीव इस अनंत आनंद को समाहित न कर पाते.

यह ध्वनि बिलकुल उस बारिश जैसी थी जिसे आप अपने शरीर पर महसूस करते हैं लेकिन उसकी बूंदों से भीगते नहीं. वहां देखना और सुनना, दो अलग क्रि याएं नहीं थीं. मैं उन चांदी से जीवों की सुंदरता को सुन रहा था और उनके गीतों से निकलने वाली आनंदमय पूर्णता को देख रहा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ब्रह्मांड के इस आयाम का हिस्सा बने बगैर यहां न कुछ देख सकते हैं और न सुन. मैं तो कहूंगा आप उस दुनिया की किसी चीज पर दृष्टि गड़ा कर देख ही नहीं सकते क्योंकि वहां कुछ अलहदा नहीं है. हर चीज विशिष्ट लेकिन एक-दूसरे में बुनी हुई. बिलकुल ईरानी कालीन की डिजाइन की तरह या तितली के परों की तरह- रंग अलग-अलग हैं फिर भी एक. कहां से कौन रंग शुरू हो गया, बताया नहीं जा सकता.

ठीक इसी तरह ब्रह्मांड का वह अलौकिक कोना था. मेरे इस अनुभव के दौरान एक कोई व्यक्ति भी मेरे साथ था. एक स्त्री. वह युवा थी. मैं उसके रूप की व्याख्या विस्तार से कर सकता हूं. गहरी नीली आंखें, उभरे हुए गाल, चेहरे पर सुनहरे रेशे. हम तितलियों के परों पर चल रहे थे साथ-साथ और तभी मैंने उसे पहली बार देखा था. हमारे चारों तरफ लाखों-करोड़ों तितलियां थीं. वृक्षों के पीछे से निकलती हुई और फिर उनके ही पीछे छिपती हुईं. जीवन की नदी हो जैसे, वायु के बीच से बहती हुई. स्त्री ने साधारण किसानों वाले कपड़े पहन रखे थे लेकिन उनका रंग चमकीला नीला, इंडिगो, हलका नारंगी था जो पूरे वातावरण की जीवंतता के अनुरूप थे. उसने मुझे ऐसी नजरों से देखा कि यदि कोई पांच सेकेंड भी देख ले तो ऐसा लगे कि जैसे सारा जीवन धन्य हो गया भले ही आपने उससे पहले कितनी भी मुश्किलें झेली हों. यह दोस्ती की नजर नहीं थी और न यह रोमांटिक नजर थी. वह नजर इन सबसे परे थी , हर तरह के प्यार को समाहित करने वाली लेकिन उनसे अलग. बिना बोले उसने मुझसे बात की. उसकी बात मुझतक हवा की तरह पहुंची और मैं उसके अनकहे शब्दों को समझ भी गया.

यह संदेश तीन हिस्सों में था. मैं यहां इसे तीन वाक्यों में रख रहा हूं- 1. तुम प्यारे हो, अच्छे हो, प्रिय हो, हमेशा के लिए. 2. कुछ भी यहां ऐसा नहीं है जिससे तुम डरो. 3. तुम कुछ गलत नहीं कर सकते. इस संदेश से सुकून मिला. ऐसा लगा कि बिना सोचे-समझे हम अब तक जिंदगी में जो खेल हम खेलते रहे, उसके नियम मुझे बताये गये हों. स्त्री ने बिना शब्दों का इस्तेमाल किये कहा कि हम तुमको यहां बहुत सी चीजें दिखायेंगे लेकिन अंत में तुमको यहां से जाना होगा. इस पर मेरे मन में सिर्फ एक सवाल उठा कि कहां जाना होगा.

गुनगुनी हवा बही, अपने साथ पत्तियों-फूलों को उड़ा कर ले जाते हुए. अलौकिक वायु जिसने सबकुछ बदल दिया. मेरे आसपास की दुनिया और उच्च निनाद पर चली गयी. हालांकि मैं कुछ-कुछ शब्द बोल रहा था लेकिन साथ ही यह हुनर आ गया था कि कैसे बिना शब्दों के बात कही जाये. मैं हवा से और अलौकिक अस्तित्व से बिना बोले सवाल पूछ रहा था- यह कौन सी जगह है, मैं कौन हूं और मैं किसलिए यहां आया हूं?

हर बार जैसे ही मैंने सवाल रखा, जवाब तुरंत प्रकाश, रंग, प्रेम और सौंदर्य के रूप में प्रस्फुटित हुआ ताकतवर झोंके की तरह मुझे लपेटते हुए. सब उत्तर मिले लेकिन भाषा के माध्यम से नहीं. विचार सीधे मुझमें प्रवेश कर रहे थे. लेकिन ये विचार वैसे नहीं थे जैसे हम पृथ्वी पर अनुभव करते हैं. ये विचार ठोस थे, अग्नि से ज्यादा गर्म, पानी से ज्यादा गीले और जैसे ही मैंने इन्हें ग्रहण किया, मैं उन अवधारणाओं को तुरंत (अनायास) समझ गया जिनको समझने में मुझे पृथ्वी पर वर्षों लग जाते. मैं निरंतर आगे बढ़ रहा था. मैने पाया कि मैं अनंत निर्वात में प्रवेश कर रहा हूं, पूरी तरह अंधेरा, अनंत विस्तार और आरामदायक. घुप्प अंधेरे में स्वर्णवृत्त से निकलती प्रकाश रेखाएं. यह स्वर्णवृत्त मेरे और अनंत निर्वात के बीच व्याख्याकार के तौर पर उपिस्थति था. ऐसा लग रहा था जैसे मैं एक अलग दुनिया में जन्म ले रहा हूं और ब्रह्मांड विशाल एहिक गर्भ हो. स्वर्णवृत्त मुझे रास्ता दिखा रहा था.

मुझे 17वीं सदी के ईसाई कवि हेनरी वागन की ये पंक्तियां याद आयीं जो उस जादुई स्थान का सटीक वर्णन करती प्रतीत होती हैं- कुछ लोग कहते हैं, वहां ईश्वर में गहरा लेकिन चमकता हुआ अंधेरा है. मेरा अनुभव वाकई ऐसा ही था. मॉडर्न फिजिक्स कहती है कि समिष्ट एकक है. समिष्ट अविभाज्य है. यद्यपि हम अलगाव और अनेकता की दुनिया में रहते हैं लेकिन अगर सतह के नीचे जाएं, हर वस्तु और घटना एक-दूसरे के साथ बुनी हुई है. वहां कोई विलगन नहीं है. मेरे इस अनुभव से पहले, इस तरह की बातें अमूर्त लगती थीं लेकिन आज वे मेरे लिये वास्तविकता है.

आज मैं समझता हूं कि समिष्ट एकक के साथ-साथ प्रेम से भी परिभाषित होता है. समिष्ट या ब्रह्मांड को जैसा मैने कोमा के दौरान समझा, उससे मुझे झटका भी लगा और आनंद भी आया. मैने दशकों एक सर्जन के तौर पर अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित अस्पतालों में काम किया है. मुझे पता है कि मेरे साथी सर्जन कहेंगे (जैसा मैं भी इस अनुभव से पहले मानता था) कि मस्तिष्क और विशेष रूप से कोर्टेक्स चेतना को जन्म देता है. चेतना ब्रह्मांड से नहीं पैदा होती. लेकिन मैं जानता हूं कि यह बात भ्रामक है.

ईश्वर और ब्रह्मांड हमारे प्रति निष्काम प्रेम का भाव रखते हैं और अब मैंने अपना पूरा जीवन,चेतना की सही प्रकृति का अनवेषण करने में लगाने का निश्चय किया है. मैं जानता हूं यह काम आसान नहीं होगा क्योंकि जब कोई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक सिद्धांत आता है तो सब लोग उसे अनदेखा ही करते हैं क्योंकि सिद्धांत के ये कंगूरे एक दिन में नहीं बने हैं और ये तभी गिरेंगे जब नये कंगूरों का निर्माण शुरू हो जायेगा.


-राजेंद्र तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं.

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