इस देश में टोपी और टोपीबाजों की कोई कमी नहीं है। कहने को तो टोपीबाज और टोपी उछालना दोनों ही एक मुहावरा है लेकिन आज जिसे भी देखिए वो एक दूसरे को टोपी पहनाने एवं उछालने में जुटा हुआ है। मुझे एक कहानी याद आ रही है। एक गांव में एक टोपी बेचने वाला था जो शहर आ लोगों को टोपियां बेचा एवं पहनाया करता था। गांव और शहर के रास्ते में एक बरगद का बड़ा पेड़़ था। सामान्यतः मुसाफिर गर्मी से बचने के लिए इसी पेड़़ के नीचे विश्राम किया करते थे। एक दिन टोपी वाला व्यापारी गांव से शहर के लिए टोपी बेचने निकला, तेज धूप के चलते वह बरगद के पेड़ के नीचे रूक गया। उसी पेड़ पर शरारती बंदरों का भी डेरा था। पेड की शीतलता के कारण व्यापारी की नींद लग। बंदरों को व्यापारी की टोपी जंची, बंदरों ने पेड़ से उतर टोकरी में रखी टोपियों को निकाल पहन पुनः पेड़ पर चढ़ गए। जब व्यापारी की आंख खुली तो वह अचंभित रह गया कि उसकी टोपी वाली टोकरी खाली और सारे के सारे बंदर टोपी पहने हुए उसे चिढ़ा रहे थे।
व्यापारी जानता था कि बंदर नकलची होते हैं। व्यापारी ने अपने सिर की टोपी को निकाल जैसे ही नीचे फेंका तो सभी बंदरों ने अपनी-अपनी टोपी उतार फेंकी। इस तरह व्यापारी ने सभी टोपियों को इकटठा कर शहर बेचने को चला गया। समय के साथ व्यापारी भी वृद्ध हो गया। अब उसका लड़का जवान हो चुका था। लड़के ने अपने पिता से कहा आज से मैं शहर के बाजार में टोपियां बेचने जाऊंगा। अब आप आराम करें पिता ने कहा ठीक लेकिन एक बात पते की मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि गांव शहर के रास्ते में एक बरगद का पेड़ पड़ता है जिस पर शरारती बंदरों का डेरा है उस पेड के नीचे सोना मत और यदि नींद आ भी जायें तो चिंता मत करना। बंदर नकलची होते हैं यदि ये तेरी टोपियां ले भी जाए तो तुरन्त तू अपनी टोपी को निकाल नीचे फेंक देना, नकलची स्वभाव के कारण सभी बंदर अपनी अपनी टोपियां निकाल फेंकेंगे तो उन्हें समेट आगे बढ़ जाना।
कुछ हुआ ऐसा ही धूप तेज होने के कारण लड़का बरगद के पेड़ के नीचे विश्राम करने रूक गया। थकान के कारण नींद भी लग गई और वही हुआ जिसका डर था अर्थात् पेड़ के बंदर सभी नीचे उतर उसकी टोकनी से टोपियां निकाल पेड़ पर चढ़ गए। लड़के की जैसे ही आंख खुली तो खाली टोकरी देख घबरा गया, उसने ऊपर की ओर देखा तो सारे बंदर टोपियां पहने हुए थे उसे अपने पिता के बचनों का ध्यान आया उसने तत्काल अपने सिर की टोपी को उतार नीचे जमीन पर फेंका लेकिन किसी भी बंदर ने अपनी टोपी नहीं उतारी। शायद ये दूसरी पीढ़ी के बंदर रहे होंगे। अब बंदरों की यह पीढ़ी समझ चुकी थी उन्हें आसानी से अब बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता।
आज आम नागरिक अरविंद केजरीवाल ने आम लोगों को उनकी ताकत का एहसास कराते हुए ये बता दिया। यदि इरादे बुलन्द हो तो सब कुछ संभव है। नई पीढ़ी के केजरीवाल ने बंदर की कहानी के अनुरूप पुराने लोगों अर्थात् नेताओं का न केवल भ्रम तोड़ा है बल्कि राजनीति में राजनेताओं के क्रियाकलापों में पारदर्शिता पर भी जोर डाला है। अभी तक तो ये सभी जानते थे कि एक फटे हाल नेता चुनाव जीतते ही कैसे अल्प समय में ही करोड़पति बन जाता है? कैसे-कैसे धत-कर्म करता है, कैसे-कैसे फरेब करता है, मंत्री बन कैसे-कैसे उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, ठेकेदारों को लाभ पहुंचा अपना धन्धा चमकता है, कैसे ये घूस के रूप में ऋण लेने का नाटक कर आम जनता की आंखों में धूल झौंकते हें। कैसे ये गठजोड़ जनता की गाढ़ी कमाई को कसाई बन मौज उड़ाते हैं? कैसे सरकारी योजना का जनता का हित बता खुद लाभ अर्जित करते है। अब तो नेताओं ने भी बाकायदा अपनी-अपनी कम्पनियां खोलकर रखी है अवैध काम का अवैध पैसा इसमें लगा, काले को सफेद करने में लगे रहते है और जनता के सामने खुद को व्यापारी, उद्योगपति, कारोबारी के रूप में बता न केवल अपने को पाक-साफ बताने का प्रयास करते है, बल्कि अपने को सबसे बड़ा समाजसेवी भी सिद्ध करने से नहीं चूकते हैं।
कुछ नेताओं ने तो बाकायदा पत्नी, बच्चों, रिश्तेदारों, बेनामों के नाम कारोबार और एनजीओ भी धड़ल्ले से चला रहे है ताकि पद का भरपूर उपयोग अपने धन्धे के लिए किया जा सकें। हाल ही में सलमान खुर्शीद पर भी पैसों के फर्जीवाडे़ का आरोप उनकी पत्नी के एन.जी.ओ. पर लगा केजरीवाल ने शासकीय धन का दुरूपयोग एवं फर्जीवाडे़ को उजागर किया है। इस घटना ने सौम्य एवं मृदुभाषी माने जाने वाले सलमान खुर्शीद का असली रूप, गुस्से एवं शातिर चेहरे का पत्रकारवार्ता में तब उजागर हुआ जब वे पत्रकारवार्ता में अपना आपा खो बैठे यहां तक कि पत्रकार को देख लेने की धमकी भी दे डाली। दूसरा चेहरा अरविंद केजरीवाल को नाली के गंदे कीड़े से भी गंदा कहा, तीसरा चेहरा केजरीवाल फर्रूखाबाद आकर तो देखे यहां से वापस नहीं जायेंगे, जरूरत पड़ी तो खून की होली भी खेलना आता है। निःसंदेह जनता अच्छी तरह से जानती है कि नेता कौन और कैसे बना जाता है। यह मंत्री का शोभा नहीं देता, देश के कानून मंत्री द्वारा उनका दिया गया वक्तव्य कही से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। निःसंदेह अरविंद केजरीवाल एक के बाद एक भ्रष्टाचार के विरूद्ध धमाके कर रहे है जिससे बड़ी-बड़ी हस्तियों के चेहरे भी बेनकाब हुए है फिर चाहे वह रावर्ट वाड्रा – डी. एल. एफ. का जमीन का घोटाला हो या भाजपा के शक्तिशाली अध्यक्ष नितिन गडकरी का। विभिन्न कम्पनियों के बनाने का खेल हो टाईम्स ऑफ इण्डिया एवं अरविंद केजरीवाल दोनों ही नितिन गडकरी के नित नए षडयंत्रों को बेनकाब कर रहे हैं। यूं तो अब गडकरी भी पूंजीपति एवं उद्योगपतियों की श्रेणी में आ गए है उन्हें भी अब जनता के सामने आ उन पर लगाए गए तमाम आरोपों को जनता के सामने आ असलियत को बताना ही होगा। आखिर कौन सच्चा है, कौन झूठा है। भारत की जनता उन्हीं के श्रीमुख से सुनना चाहती हैं।
लेखिका शशि तिवारी पत्रिका सूचना मंत्र की संपादक हैं.


