एक बार फिर न्यायपालिका कटघरे में!
एक बार फिर फैसला हुआ, न्याय नहीं!
एक बार फिर ‘ग्लैमर’ के पहरूवे हुये बेनकाब!
एक बार फिर दरक, चीत्कार उठा सामाजिक ‘आईना’!
एक बार फिर शर्मसार हुआ ‘मेरा भारत महान’ !
जी हां ,इन सभी अवस्थाओं का केंद्र बना नीरज ग्रोवर हत्याकांड का फैसला। देश की एक समान जिज्ञासा – पहले हत्या, फिर लाश के 300 टुकड़े, और सजा 3 साल? जंगल में उन टुकड़ों को जला दिया जाने के अपराध की सजा महज 3 साल? और सजा भी ऐसी कि हत्या की सक्रिय सहयोगी मारिया तत्काल जेल से रिहा! अदालत का तर्क यह कि मारिया ने सिर्फ सबूत नष्ट किए। अदालत का यह निष्कर्ष किसी के गले के नीचे नहीं उतर रहा। अभियोजन पक्ष के अनुसार ही नीरज ग्रोवर की हत्या करने के बाद एमिली मैथ्यू अपनी सहयोगी मारिया के साथ निकटवर्ती मॉल जाकर एक बड़ा धारदार मांस काटनेवाला हथियार खरीदता है। फ्लैट वापस आकर दोनों शव के 300 टुकड़े करते हैं। उन टुकड़ो को बैग में बंद कर जंगल ले जाते हैं। उन्हें जला ड़ालते है। क्या ऐसा नराधम कृत्य सबूत मिटाना मात्र हुआ? हरगिज नहीं! यह तो हत्याकांड में पूर्णलिप्तता-सहयोग का मामला हुआ।
निश्चय ही जब मैथ्यू नीरज को मार रहा होगा तब उसे मारिया का पूरा सहयोग मिला होगा। हत्यास्थल मारिया का फ्लैट ही था। चश्मदीद गवाह नहीं होने के बावजूद परिस्थितिजन्य साक्ष्य चीख-चीख कर इस संभावना की पुष्टि कर रहे हैं। चश्मदीद गवाहों की अनुपलब्धता में क्या फैसले ऐसे ही होते रहे हैं? परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के कानून में प्रावधान की अनदेखी क्यों? साफ है कि जांच एजेन्सी, इस मामले में मुंबई पुलिस ने जानबूझकर मारिया के पक्ष में अभियोजन को कमजोर बनाया। कारण पर ज्यादा माथापच्ची की जरूरत नहीं। पुलिस को, अर्थात अभियोजन पक्ष को ‘प्रभावित’ किया गया। क्षमता व कर्तव्यदक्षता में विश्वविख्यात स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस के समकक्ष मानी जाने वाली मुंबई पुलिस को शर्म आयेगी? कटघरे में न्याय का तराजू है, कटघरे में मुंबई पुलिस की ईमानदारी है-कार्यक्षमता है।
बात यही खत्म नहीं होती। देश समाज में संदेश गया कि पैसे की ताकत ही सबसे बड़ी ताकत है। इसी ताकत के बलबूते एक नितांत आयोग्य निकृष्ट, बुद्धिहीन, असमर्थ व्यक्ति सबल की शक्ति खरीद पाप कर भी समाज में निर्विध विचार सकता है, सम्मान प्राप्त करता है, अर्थ-लाभ अर्जित करता है। ऐसे व्यक्ति धन कमा ने के लिए, शोहरत पाने के लिए नैतिक-अनैतिक कार्यों को करने में भी संकोच नहीं करते। मारिया मामले में ऐसा ही हो रहा है। फिल्म निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्मा और ‘बिग बॉस’ के संचालक ऐसे ही अनैतिक अमर्यादित कृत्य के अपराधी बनने जा रहे हैं। ‘बिगबॉस’ की ओर से मारिया को 5 करोड़ की पेशकश और रामगोपाल वर्मा द्वारा हत्याकांड पर फिल्म बनाने और मारिया को भूमिका देने की घोषणा हमारी स्तुत्य संस्कृति
को नंगा करती है। क्या संदेश देना चाहते है ये दोनों? हत्या करो, शव के टुकड़े करो, जला डालो और फिर आ कर करोड़ों की थैली ले लो, अभिनय का कांट्रैक्ट्स साइन कर लो! यही ना? नीरज हत्याकांड को अंजाम देने वालों को जहां सामाजिक बहिष्कार मिलना चाहिए वहां उनके लिए धन-ऐश्वर्य का आसन? और वह भी किसलिए? लोगों की भावनाओं को अनैतिक रूप में उभार कर धन अर्जित करने के लिए ही ना? धिक्कार है ऐसे रामगोपाल वर्मा और ‘बिगबॉस’ के संचालकों पर!
लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों हिंदी दैनिक 1857 का प्रकाशन कर रहे हैं. इनका लेख 1857 में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार.


