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ये इंसान है या चलता फिरता ब्लड बैंक?

 

बाड़मेर : आम राय होती हैं कि इंसान खून का नाम सुनकर सन्न रह जाता हैं या यूँ कहे कि खून देखकर ही विचलित हो जाता हैं तो यह सही होगा। लेकिन पश्चिमी राजस्थान में एक और जहां राज्य सरकार ने अपने स्तर पर रक्तदान को महान बता कर इसके बारे में फैलाई गई भ्रांतियां तोड़ने की कई कोशिशे की हैं लेकिन इन सारी योजनाओं और कोशिशों से ज्यादा एक युवक का शगल ज्यादा भारी पड़ा है। इस युवक ने ना केवल अपने खून से कई जाने बचाई हैं बल्कि सबसे ज्यादा बार रक्तदान करने का रिकॉर्ड भी राज्य में बना दिया हैं। इस युवक का मानना हैं कि खून के रिश्ते को दुनिया का सबसे अटूट बंधन माना जाता है और अपनी रगों में बहते खून के चंद कतरे ”दान” करके आप ऐसे अनजाने लोगो की जान निस्वार्थ भाव से बचा सकते हैं जो आपसे कभी मिले नहीं या फिर आपका कोई उनसे वास्ता नहीं रहा हो। इस युवक की मानसिकता से प्रभावित होकर बाड़मेर शहर में बहुत से लोग रक्तदान के महत्व को समझते हैं और अब तक सैकड़ों युवक इस युवक से प्रेरणा लेकर कई बार रक्तदान कर चुके हैं।

 

बाड़मेर : आम राय होती हैं कि इंसान खून का नाम सुनकर सन्न रह जाता हैं या यूँ कहे कि खून देखकर ही विचलित हो जाता हैं तो यह सही होगा। लेकिन पश्चिमी राजस्थान में एक और जहां राज्य सरकार ने अपने स्तर पर रक्तदान को महान बता कर इसके बारे में फैलाई गई भ्रांतियां तोड़ने की कई कोशिशे की हैं लेकिन इन सारी योजनाओं और कोशिशों से ज्यादा एक युवक का शगल ज्यादा भारी पड़ा है। इस युवक ने ना केवल अपने खून से कई जाने बचाई हैं बल्कि सबसे ज्यादा बार रक्तदान करने का रिकॉर्ड भी राज्य में बना दिया हैं। इस युवक का मानना हैं कि खून के रिश्ते को दुनिया का सबसे अटूट बंधन माना जाता है और अपनी रगों में बहते खून के चंद कतरे ”दान” करके आप ऐसे अनजाने लोगो की जान निस्वार्थ भाव से बचा सकते हैं जो आपसे कभी मिले नहीं या फिर आपका कोई उनसे वास्ता नहीं रहा हो। इस युवक की मानसिकता से प्रभावित होकर बाड़मेर शहर में बहुत से लोग रक्तदान के महत्व को समझते हैं और अब तक सैकड़ों युवक इस युवक से प्रेरणा लेकर कई बार रक्तदान कर चुके हैं।

 

 

रतन की सोच हैं कि रक्तदान को महादान माना जाता है। इससे रक्तदाता को आत्मसंतोष और किसी की जान बचाने का सुकुन हासिल होता है। स्वस्थ व्यक्ति हर तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है और अगर देश का हर स्वस्थ नागरिक नियमित रूप से रक्तदान करे तो रक्त की कमी से किसी की मौत नहीं होगी। अब तक सत्तर से ज्यादा बार रक्तदान कर चुके 40 वर्षीय रतन भवानी ने बताया कि मैं कई सालों से रक्तदान कर रहा हूँ, साल में चार बार रक्तदान जरूर करता हूं। रक्तदान मेरे लिए दूसरों का जीवन बचाने और उनकी मदद करने का जरिया है। ब्लड डोनर के तौर पर मेरा खून बहुत से लोगों के काम आता है। बाड़मेर निवासी इस चलते फिरते ब्लड बैंक को लोग रतन भवानी से ज्यादा रक्त भवानी के नाम से जानते हैं और बड़ी इज्जत के साथ इनसे लोग मिलते भी हैं। 75 बार अपना खून गैरों की रगों में बहा कर उन्हें नवजीवन देने वाले इस साहसिक युवक की माने तो जब हर क्षण नया खून बनता हैं और पुराने खून का अस्तित्व खत्म हो जाता हैं तो हमे रक्तदान में किस बात की हिचक।

 

सैकड़ों रक्तदाताओं की टीम बना चुके हैं रतन : पहली बार रतन भवानी ने उस वक्त रक्तदान किया जब वे खेल के मैदान में खेल रहे थे और उन्हें सूचना मिली कि उनके पड़ोस में रहने वाली आठ साल की बच्ची छत से पतंग उड़ाते समय गिर गई हैं और उसे खून चाहिए, घरवालों के मना करने और काफी डर होने के बाद भी रतन सीधे अस्पताल पहुंचे ब्लड ग्रुप को चेक करवाया और किस्मत से ब्लडग्रुप वही निकला जो उस बच्ची को चाहिए था, बस फिर क्या था इस रक्तदान अभियान की शुरुआत हो गई और उसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा। अब तक रतन भवानी कई लोगो को जीवनदान दे चुके हैं और साथ ही साथ रक्तदाताओं की ऐसी टीम बना चुके हैं, जिसके सदस्य पन्द्रह या बीस नहीं बल्कि डेढ़ सौ से ज्यादा हैं, जो हर आपातकाल में रक्तदान के लिए तत्पर रहते हैं। बाड़मेर अस्पताल में अब जब भी रक्तदान की बात आती हैं चिकित्सक से आम आदमी हर किसी के मुंह से सीधे यही वाक्य निकलता हैं कि रतन भवानी को पूछो। ऐसे में रतन भवानी और उनकी टीम बाड़मेर के लोगों की लाइफलाइन बन कर साबित हो रहे हैं। रतन भवानी के साथ इस रक्तदान के मिशन को उनके साथी संजय जोशी भी आगे बढ़ा रहे हैं। संजय जोशी पेशे से शारीरिक शिक्षक हैं और वो भी रतन भवानी के सम्पर्क में आने के बाद करीब चालीस बार रक्तदान कर चुके हैं। संजय जोशी के अनुसार पहली बार जब रक्तदान किया तो काफी भयभीत था लेकिन जब इस बात की संतुष्टि मिली कि इस खून से किसी को नई जिन्दगी मिली हैं तो भय भी खत्म हो गया और एक नए मिशन की नींव मन में स्थापित हो गई।

 

प्रशासन चाहे तो सैकड़ों रतन हो सकते हैं बाड़मेर में : दरअसल बाड़मेर के इस साहसिक रक्तदाता को कभी प्रशासन या सरकार ने प्रोत्साहित करने का प्रयास ही नहीं किया। एक बाद अस्पताल प्रशासन की अनुशंसा के आधार पर रतन भवानी को पन्द्रह अगस्त पर प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया, लेकिन उसके बाद कभी भी उनके इस हौसले की तारीफ करने को आगे नहीं आया। चाहे कवास में आई बाढ़ हो या फिर हर बाद मलेरिया की भीषण महामारी रतन भवानी हर बार अस्पताल में ब्लड बैंक के आगे ही नज़र आये। बाड़मेर में लोग रात को तीन बजे भी अगर फ़ोन कर लें रतन भवानी उनके सहयोग के लिए तत्पर नज़र आयेंगे, लेकिन ना जाने क्यूँ प्रशासन ने इस साहस का कभी अपने स्तर पर सम्मान करना उचित नहीं समझा, जिसके चलते रतन भवानी काफी व्यथित हैं। बाड़मेर जिला कलेक्टर कार्यालय में बतौर वरिष्ठ लिपिक कार्य करने वाले रतन भवानी कहते हैं कि सरकार और जिला प्रशासन कोई ऐसी मुहिम चलाए जिसके कारण युवा वर्ग रक्तदान के प्रति अग्रसर हो और उसके कारण कई लोगों की अकाल मौत ना हो पाए। रतन इस तरह के अभियान में अपनी सेवाएँ देने को हमेशा तैयार रहते हैं।

 

दूरदर्शन भी बना चुका हैं रतन पर टेलीफिल्म : रतन भवानी के रक्तदान के प्रति समर्पण और जज्बे के कारण दिल्ली दूरदर्शन ने दो एपिसोड की डॉक्युमेंट्री फिल्म जिसका नाम किरण था को शूट कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित किया था, जिसके बाद पूरे भारत में रतन भवानी का नाम हुआ और लोग उनसे जरिये पत्र और टेलीफोन सम्पर्क करने लगे साथ ही लोग उनसे पूछते थे कि रक्तदान करने से क्या मिलता हैं तो रतन उन्हें जवाब देते कि रक्तदान ने जिन्दगी बचाने का पुण्य और बार-बार रक्तदान करने का हौसला मिलता हैं।

 

लेखक दुर्गसिंह राजपु‍रो‍हित पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

 

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