अभी दो दिन पहले ही राजधानी में एक ऐसी घटना देखने को मिली जहाँ सिर्फ अपराधी को केवल इस नाम पर बक्श दिया गया क्योंकि उसने खुद को सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों का परचित बताया था। मामला हजरतगंज स्थित रायल कैफे का है जहाँ पर एक युवक मेहंदी लगवा रही युवतियों को छेड़ रहा था। युवतियों से इसकी शिकयत पास ही ड्यूटी पर तैनात सिपाही से की। सिपाही ने जब युवक को रोकने की कोशिश की तो युवक आपे से बाहर हो गया और सिपाही को पीटने लगा। सिपाही को पिटता देख एक दरोगा सहित कई पुलिसकर्मी मौके पहुंचे पर जैसे ही युवक ने अपना परिचय बताया, सभी लोगों ने अपने कदम वापस खींच लिए और सिपाही को समझते बुझाते हुए मामले को रफा दफा कर दिया। हालांकि ये कोई पहला मामला नहीं है जब सत्ता के डर से पुलिस ने कानून को हाथ में लेने वालों को छोड़ दिया हो। इससे पहले भी ऐसी घटना हो चुकी हैं।
अभी कुछ दिन पहले ही इस तरह का मामला है अलीगंज थाना क्षेत्र में भी देखने को मिला था जहाँ एक बिल्डर पे संगीन आरोप होने के बाद भी अलीगंज पुलिस ने मामले पर सख्त रुख अपनाने की जगह पर थाने से खिसक लेना ही बेहतर समझा क्योंकि उस बिल्डर ने खुद को किसी सपा सांसद का बेहद करीबी गुर्गा बताया था। ये बात अलग है कि कि जब अलीगंज पुलिस ने सांसद से संपर्क किया तो पता चला कि उक्त बिल्डर का सांसद से कोई सम्बन्ध नहीं है जिसके बाद पुलिस ने उक्त मामले में कार्रवाई की। राज्य के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बार- बार कह रहे है कि कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों को बक्शा नहीं जायेगा। पर ये दोनों घटनाये तो कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही हैं। इन दोनों घटनाओ से यह यह स्पष्ट होता है कि मुख्यमंत्री के लगातार दिए जा रहे निर्देशों के बाद भी राज्य पुलिस में सत्ता का ऐसा खौफ बैठा हुआ जिसके चलते यदि आम आदमी भी थोड़ा सख्ती से पुलिस वालों से ये कहे कि मै फलां सपा नेता का परिचित हूँ या रिश्तेदार हूँ तो राजधानी पुलिस बड़े अदब के साथ उसे छोड़ देगी। ऐसी स्थिति में राज्य की कानून व्यस्था कैसे सुधरेगी? ये अहम् सवाल है।
हालांकि मुख्यमंत्री ने कानून व्यवस्था पर अपनी सरकार की कमजोरियों को माना है पर जिस अंदाज में उन्होंने अपनी सरकार की कमियों को माना वो बात थोड़ी समझ से परे है। मुख्यमंत्री लगातार अपने बयानों में बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए पूर्ववर्ती माया सरकार को जिम्मेदार ठहराते है। अभी हाल ही में हुए कुछ सांप्रदायिक दंगों के जवाब में मुख्यमंत्री ने मीडिया से कहा ये दंगे सांप्रदायिक नहीं थे अपितु कुछ स्थानीय लोगों की मदद से सरकार को बदनाम करने के लिए विपक्ष की साजिश थी। चलिए एक पल को मान लेते हैं कि ये दंगे सांप्रदायिक न होकर स्थानीय लोगों की मदद से विपक्ष की सजिश थी। फिर तो कानून व्यवस्था के मुद्दे पर इस सरकार की निष्क्रियता और स्पष्ट होती है, क्योंकि अगर ये स्थानीय कृत्य था तो इसकी जानकारी स्थानीय ख़ुफ़िया तंत्र (एल आई यू) को होनी चाहिए थी और यदि स्थानीय ख़ुफ़िया तंत्र पहले से रची जा रही साजिशों का पता लगाने में विफल है तो इसका स्पष्ट अर्थ यही होगा कि राज्य सरकार कानून व्यवस्था को नियंत्रित नहीं कर पा रही है। जहाँ तक बात पूर्वर्ती सरकार के शासनकाल की है तो माया सरकार के पांच साल के शासन काल में ऐसी कोई अप्रिये घटनायें नहीं हुई, जिसने माया सरकार को कानून व्यवस्था के मुद्दे पर सवालों के घेरे में खड़ा किया हो। वर्ष 2007 में अपनी सरकार बन जाने के कुछ दिन के अन्दर ही अपने निवास से अपनी पार्टी के सांसद को गिरफ्तार कराकर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावाती ने स्पष्ट सन्देश दिया था कि राज्य में कानून व्यवस्था के मुद्दे में कोई समझौता नहीं किया जायेगा।
इस सरकार में स्थिति बिलकुल उल्टी हैं। यहाँ कानून हाथ में लेने वाले पार्टी के नेताओं की गिरफ़्तारी दूर की बात है उनके विरुद्ध प्राथमिकी भी नहीं दर्ज होती है। जिसका उदाहरण पूर्व मंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ़ पंडित सिंह द्वारा सीएमओ की पिटाई के बाद राज्य सरकार द्वारा अब तक की गयी लचीली कार्रवाई है। वास्तव में देखा जाये तो कानून व्यवस्था का मजबूत करने वाले पुलिस के कंधे इस सरकार में नेताओं और अपराधियों के बोझ के चलते झुक गये है। इसके दो कारण है पहला ये कि सपा सरकार को लेकर ये आम धारणा है कि इस सरकार में अपराधियों को क़ानूनी सरक्षण मिलता है, दूसरा ये कि लगातार इमानदार और निर्भीक पुलिस अधिकारीयों का स्थानीय नेताओं के सिफारिश पर सथानांतरण। ये दो कारण है जिसके चलते स्थानीय पुलिस कार्रवाई से डरती है। जब तक इन कारणों का समाधान नहीं किया जायेगा राज्य की कानून व्यवस्था नहीं सुधरेगी।
मुख्यमंत्री अखिलेश के लिए यह आवश्यक है कि वो बेहद गंभीर हो चुकी स्थिति को समझे और आवश्यक कार्रवाई करे। उन्हें राज्य की कानून व्यवस्था को मजबूत करने लिए खुद एक कदम आगे बढ़ाना होगा और अपनी सरकार और पार्टी को लेकर जनता में बनी आम धारणा को तोड़ते हुए पूर्व मुख्यमंत्री की तर्ज पर कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे कार्यकर्ताओ और नेताओ के विरुद्ध सख्ती कार्रवाई करनी होगी। इसके अतरिक्त उन्हें सिफारिश पर स्थानान्तरण करने के प्रक्रिया पर भी रोक लगाना होगा। उन्हें स्पष्ट रूप से यह सन्देश देना होगा कि कानून व्यवस्था की मुद्दे पर किसी को भी नहीं बक्शा जायेगा वो चाहे पार्टी कार्यकर्त्ता या नेता ही क्यों न हो। राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था को सुधारना इस मायने में भी आवश्यक है कि 2014 का लोकसभा चुनाव बेहद नजदीक है और पार्टी उत्तर प्रदेश से लोकसभा की 60 सीटे देख रही। ऐसी स्थति में यदि राज्य की कानून व्यवस्था नहीं सुधरेगी तो उत्तर प्रदेश से लोकसभा की 60 सीटे जीतने का सपा प्रमुख का सपना सपना ही रह जायेगा। शायद सपा प्रमुख इस स्थिति को समझ रहे हैं और इसीलिए लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर लगातार हो रही पार्टी मीटिंगों में कानून व्यवस्था के मुद्दे पर बिगड़ती पार्टी की छवि के प्रति अपनी चिंता को छुपा नहीं पाते हैं।
लेखक अनुराग मिश्र तहलका न्यूज में उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं.


