सदियों के शोषण को देखने, समझने और उससे झूझने वाले हमारे संविधान निर्माताओं ने सबकी उन्नति और तरक्की का जो सपना देखा था उस सपने को पूरा करने में आज के राजनीतिज्ञों का संकुचित नजरिया बड़ी बाधा बनकर सामने आ खड़ा हुआ है. किसी क्षेत्र विशेष या प्रांत में उपलब्ध संसाधन पूरे देश की संपदा है. हमारे संविधान का संघीय ढांचा और इसके अन्दर केंद्र तथा राज्य सरकारों की व्यवस्था इसी सोच के साथ की गयी थी कि पूरा देश एक होकर अल्पविकास की चुनौतियों का मुकाबला करे. लेकिन इनदिनों हो क्या रहा है की जिसके पास जो मंत्रालय आया उसने देश का संसाधन एक प्रांत या अपने क्षेत्र विशेष में झोंकने में थोड़ा भी देर नहीं किया. फिर दूसरे नेता जैसे ही उस मंत्रालय की कुर्सी पर काबिज हुए तो पहला काम यह करने में देते हैं कि पहले की परियोजनाओं को धीमा कर अपने क्षेत्र के बारे में सोंचे. अखिल भारत की सोच ख़त्म होती जा रही है. रेलवे की दुर्दशा की बात हो या उद्योग या कृषि और सड़क सहित सभी बुनियादी क्षेत्र की. सबका हाल एक जैसा है. देश के संसाधन से जब कोई क्षेत्र आगे बढ़ जाता है तो वहाँ स्थानीयता का मुद्दा आगे कर संकीर्ण राजनीति की जाती है और दूसरे प्रदेशों के लोगों को बाहरी बताकर परेशान किया जाता है और देश की एकता और अखण्डता को चुनौती दी जाती है.
यह किसे मालूम नहीं की मुम्बई देश की आर्थिक राजधानी है वहां पूरे देश का आर्थिक संसाधन लगा है. लोगों का खून पसीना एक हुआ है. ऐसा पंजाब, हरियाणा, बंगाल समेत अलग अलग क्षेत्र के लिए समय समय पर हो चुका है. लेकिन नेताओं की सोच है कि बदलती नहीं! सबने देखा है कि कैसे राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री बनते ही अमेठी का कितना औद्योगिकरण हुआ और उनके हटने के बाद सभी कल कारखाने खंडहर में तब्दील हो गए. मायावती ने सोनिया गाँधी की इच्छा के विपरीत रेल कारखाने का शिलान्यास नहीं होने दिया. बिहार में रेल और सड़क संपर्क का घोर अभाव है. बिहार के नेताओं ने रेल और सड़क परिवहन मंत्रालय का काम मिलने पर कुछ प्रयास किया लेकिन दूसरे नेताओं ने बाद में सभी काम में अडंगा लगा दिया. यही कारण है की देश के कई राज्यों का समुचित विकास नहीं हो पाया जबकि कुछ राज्य काफी आगे निकल गए और कुछ बीमारू कहे जाने लगे.
केंद्र की यूपीए दो सरकार में हाल तक बिहार का प्रतिनिधित्व नहीं था. इसका परिणाम सामने है. पश्चिम बंगाल में कई योजनायें शुरू हुई लेकिन ममता बनर्जी के यूपीए से हटने के बाद सभी योजनओं पर संशय के बादल छा गए हैं. त्रिपुरा विकास के मामले में काफी पिछड़ा हुआ है. उसके लिए कोई योजनायें चर्चा में क्यों नहीं सामने आती. झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, असम जैसे राज्य खनिज संसाधन के रहते विकास के निचले पायदान पर क्यों हैं. इसपर केवल एसी कमरे में बैठकर मंथन होता है धरातल पर कुछ नहीं.
बिहार में नीतीश कुमार विशेष राज्य का दर्जा के लिए आन्दोलन शुरू कर चुके हैं. उन्हें पता है कि राष्ट्रीय विकास परिषद् की मंजूरी के बिना यह संभव नहीं है. योजना आयोग उस सूचना अधिकार के तहत जानकारी दिया था कि ओडिशा और राजस्थान के द्वारा की गयी इस मांग को पहले खारिज किया जा चुका है इसलिए बिहार की मांग पर विचार नहीं होगा. नीतीश के विरोधी उनपर राजनीति करने का आरोप लगा रहे है. नीतीश कुमार भी कह चुके हैं कि वे यह लड़ाई दिल्ली तक ले जायेंगे. विरोधियों का आरोप है कि नीतीश प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं. हालांकि इसमें कोई बुराई कहाँ है लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी सूबे को विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए उस प्रांत का प्रधानमंत्री होना जरूरी है. क्या ऐसे सोच वाले नेताओं को पूरा देश भरोसे के साथ स्वीकार करेगा. क्या यह अखिल भारत की सोच के खिलाफ नहीं है. क्या हमारे पूर्वजों ने ऐसे राजनीतिक व्यवस्था की परिकल्पना किया था. आज मुद्दे पर विचार करने की जरूरत है.
लेखक अजिताभ सिन्हा बिहार के स्तवंत्र पत्रकार है.


