देष का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, और स्वाभिमान से जिने का अधिकार प्रदान करता है, कानून के नजर मे कोई छोटा बडा या उच नीच नही है। जाति, वर्ग, लिंग, प्रांत, भाषा, क्षेत्र, आयु, षारीरिक क्षमता चाहे जो हो, देष के सभी नागरिको के लिए समान अधिकार की मान्यता संविधान मे है। संविधान की प्रस्तावना मे ही सभी नागरिको को सामाजिक आर्थिक, षैक्षिक, राजनैतिक, न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक उपासना और विष्वास प्र्रतिष्ठा और गरिमापुर्ण जीवन जीने के अधिकार और अवसर प्रदान करना यह संविधान का मूल उददेष्य बताया गया है। इन उददेष्यों को प्राप्त करने विभिन्न अनुच्छेदो और अनुसूचियो के रचना कर इसे सुनिष्चित किया गया है।
संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृष्यता को पुरी तरह समाप्त करता है, बल्की इसें अपराध घोषित करता है, लेकिन हमारे प्रदेष के ग्रामिण क्षेत्रांे मे लगभग प्रत्येक गांव मे यह प्रथा किसी ना किसी रूप मे मौजूद है। यह प्रथा देष के संविधान के ही खिलाफ है। यह सामाजिक द्वेष का निर्माण करती है और अपने ही देष धर्म के समूदायो के खिलाफ हिंसा के लिए अन्य समूदायांे को प्रवृत्त करती है। हमारे प्रदेष मे छुआछूूत का प्रभाव इतना व्यापक है की पिछले 15 वर्षो मे 1995 सेे 2010 तक प्रदेष मे दलितांे पर अत्याचारो 4 लाख 71 हजार 717 प्रकरण घटित हुए है। दलित अत्याचारो के मामले मे उत्तर प्रदेष प्रथम राजस्थान दुसरें और मध्यप्रदेष तीसरें पायदान पर हैं, और घटनाओ की सघनता के आधार पर देखे तो मध्यप्रदेष देष मे दलित अत्याचारो मे प्रथम स्थान पर है।
कोई दलित व्यक्ति जिसको संविधान ने बराबरी और सम्मान से जीने का अधिकार दिया है उसने अगर सवर्ण मोहल्लें के हैण्डपम्प से पानी पीने की हिम्मत की, या सवर्ण समाज के घरो के आगे चप्पल पहनकर चलने, घोडे पर बारात निकालने की कोषिष की तो उससे मारपीट कर अपमानित किया जाता है। अमानवीयता की हद तब पार होती है जब दलित समाज के बच्चे तक को सार्वजनिक षमषान मे दफनाने के लिए मना किया जाता है। पुरूषो से बदला लेने के लिए उनके महिलाओ पर सामूहिक बलात्कार किए जाते है। युवाओ को जिंदा जलाया जाता है। उनके लिए जीवण का ऐसा कोई क्षेत्र नही जहां उनके साथ भेदभाव नही किया जाता। यह सब छुआछूत की प्रथा की वजह से ही हो रहा है, जो समाज मे घृणा का निर्माण करती है।
हमारे देश के समाज को जिस जाति व्यवस्था ने सैंकड़ों सालो तक संचालित किया, जिस व्यवस्था की बुनियाद गैरबराबरी, भेदभाव, और अनुसूचित जातियो, जनजातियो, और समस्त षुद्र वर्ग के प्रति द्वेष पर आधारित रही, उस व्यवस्था की पकड हमारे समाज पर आज भी हावी है। और इसीलिए स्वतंत्रता के 64 वर्ष बाद भी देष की 16 प्रतिषत आबादी भयानक कुप्रथाओ, गरीबी, भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक अत्याचारो की षिकार है। हमारे प्रदेष के हजारांे गावों मे छुआछूत की महाभयानक प्रथा आज भी मौजूद है जो व्यक्ति के मानव अधिकारो को नकारती है। इसी के वजह से देष मे 7 लाख महिलाए मैला ढोने के लिए मजबूर है, प्रति वर्ष हजारो दलित महिलाओ पर बलात्कार किए जाते है, दलितो की हत्याए होती है।
गाय को माता मानकर पुजने वाला और चिटी को षकर दान करने वाला हमारा समाज इन्सानो के प्रति इतना निर्दयी क्यौ है? इस सवाल का जबाब केवल जाति आधारित छुआछूत भेदभाव की मानसिकता है, जो दलित समाज के खिलाफ जघन्य अत्याचारो को जन्म देती है
अतः इस प्रथा का अस्तित्व मे रहना हमारे देष और पुरे समाज पर कलंक है, पुरे दुनिया मे इस प्रथा की वजह से हमारे देष का अपमान होता है। यह 16 करोड़ देष वासियांे के आत्मसम्मान और मानव अधिकारो की रक्षा का मामला है। विभिन्न सरकारो ने इस प्रथा को समाप्त करने के उददेष्य से अनेक कानून, योजनाए अधिनियम बनाए लेकिन गावांे मे यह कई रूपों मे विकरालता के साथ विद्यमान है, हमे इसे समाप्त करना ही होगा, यह सरकारो का, संस्थाओ, संगठनो का सबका दायित्व हैं। कुछ समय पूर्व महात्मा गांधी ने और बाबासाहब ने इस प्रथा को मिटाने के बडे़ प्रयास किए, आज भी कई संगठन है, इसी मुददे पर कार्य कर रहे है। हमे इन मुददो पर पुरे समाज को जगाना होगा, इस प्रथा को राष्ट्रीय एकता के खिलाफ घोषित कर इसे मिटाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। इसमे राज्य और जनप्रतिनिधि और समाज को निरंतर, नियोजित तरिके से काम करने की सख्त जरूरत है।


