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मैनेजर पांडेय और प्रणय कृष्ण पुनः जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष व महासचिव बने

गोरखपुर : जनसंस्कृति मंच के 13वें राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से प्रो मैनेजर पांडेय को राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रणय कृष्ण का राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर चुना। सांगठनिक सक्रियता को और तेज करने के लिहाज से प्रो रविभूषण और प्रो राजेन्द्र कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। मनोज कुमार सिंह को राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी दी गई। जेवियर कुजूर, जितेन्द्र कुमार, सुधीर सुमन और प्रेमशंकर राष्ट्रीय सहसचिव चुने गए। पूर्व की 111 की राष्ट्रीय परिषद को बहाल रखते हुए 12 नए रचनाकारों, संस्कृतिकर्मियों को शामिल किया गया। अब राष्ट्रीय परिषद 123 सदस्यों की हो गई है। पहले के राष्ट्रीय उपाध्यक्षों के अतिरिक्त बलराज पांडेय, मदन मोहन, सुरेश कांटक, बल्ली सिंह चीमा, निर्मला पुतुल, कंवल भारती नए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए।

गोरखपुर : जनसंस्कृति मंच के 13वें राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से प्रो मैनेजर पांडेय को राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रणय कृष्ण का राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर चुना। सांगठनिक सक्रियता को और तेज करने के लिहाज से प्रो रविभूषण और प्रो राजेन्द्र कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। मनोज कुमार सिंह को राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी दी गई। जेवियर कुजूर, जितेन्द्र कुमार, सुधीर सुमन और प्रेमशंकर राष्ट्रीय सहसचिव चुने गए। पूर्व की 111 की राष्ट्रीय परिषद को बहाल रखते हुए 12 नए रचनाकारों, संस्कृतिकर्मियों को शामिल किया गया। अब राष्ट्रीय परिषद 123 सदस्यों की हो गई है। पहले के राष्ट्रीय उपाध्यक्षों के अतिरिक्त बलराज पांडेय, मदन मोहन, सुरेश कांटक, बल्ली सिंह चीमा, निर्मला पुतुल, कंवल भारती नए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए।

सामाजिक-आर्थिक संघर्षों पर केंद्रित दो महत्वपूर्ण डाक्यूमेंटरी फिल्में दिखाई गईं जसम राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन शाम को सांस्कृतिक सत्र में मशहूर फिल्मकार आनन्द पटवर्धन की चर्चित फिल्म जय भीम कामरेड और दो युवा फिल्मकारों धीरज सार्थक व आशीष कुमार सिंह द्वारा गोरखपुर-महराजगंज के वनटांगिया मजदूरों के संघर्ष की दास्तान पर बनी डाक्यूूमेंटरी बिटवीन द ट्रीज दिखाई गई। वनटांगिया मजदूरों की जिंदगी पर बनाई गई डाक्यूमेंटरी ‘बिटवनी द ट्रीज’ उन मजदूरों के अस्तित्व और जीवन संघर्ष की कहानी है जिन्होंने ब्रिटिश राज में सरकारी आदेश पर उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में साखू के जंगल लगाए। ये भूमिहीन लोग थे। जंगल लगाने और उसकी देखरेख के अलावा वे दूसरा काम जानते न थे।

आजादी के बाद उनकी हालत खराब होती गई। 84 में जब उनकी आजीविका खत्म की जाने लगी तो उन्होंने संगठित होकर संघर्ष शुरू किया। यह फिल्म उनकी पीड़ा और संघर्ष का दस्तावेज है। फिल्म प्रदर्शन के बाद निर्देशकों से दर्शकों की विचारोतेजक बातचीत हुई। जय भीम कामरेड दलितों के दमन, उनके प्रतिरोध और राजनीतिक व सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की एक महागाथा है। भारत में जाति के भीतर आर्थिक और राजनैतिक संघर्ष के दोनों आयाम रहे हैं। यह फिल्म दिखाती है कि दलित और मजदूर की पहचान आपस में गहरे में गुंथी हुई है। यह उनके क्रांतिकारी संभावनाओं की ओर इशारा करने वाली फिल्म भी है। इस फिल्म के प्रदर्शन के साथ जसम का 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ।

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