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मजबूत मोदी के मैदान में मीडिया की मुश्किल

कायदे से चौथी बार और सीएम के नाते तीसरी बार नरेंद्र मोदी गुजरात के चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस को गुजरात में मोदी के मुकाबले अपने भीतर कोई मजबूत आदमी नहीं मिला। पर, पिछले एक दशक से वहां मीडिया मोर्चा संभाले हुए है। कांग्रेस को इसमें मजा आ रहा है। क्योंकि उसका काम हो रहा है। बीजेपी कहती है, गुजरात में मीडिया कांग्रेस का हथियार बना हुआ है। लोगों को भी ऐसा ही लग रहा है। इसलिए, क्योंकि कोई भी न्यूज चैनल देख लीजिए, अखबार पढ़ लीजिए। मोदी खलनायक के रूप में नजर आएंगे। मतलब, मीडिया और मोदी की रिश्तेदारी बहुत मजबूत है। बाकी लोग मीडिया से घबराते हैं। भागते हैं। पर, मीडिया मोदी के पीछे दौड़ता दिखता है। और मोदी जब मिल जाते हैं, तो वह उनको बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। यह सबको लगता है।

कायदे से चौथी बार और सीएम के नाते तीसरी बार नरेंद्र मोदी गुजरात के चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस को गुजरात में मोदी के मुकाबले अपने भीतर कोई मजबूत आदमी नहीं मिला। पर, पिछले एक दशक से वहां मीडिया मोर्चा संभाले हुए है। कांग्रेस को इसमें मजा आ रहा है। क्योंकि उसका काम हो रहा है। बीजेपी कहती है, गुजरात में मीडिया कांग्रेस का हथियार बना हुआ है। लोगों को भी ऐसा ही लग रहा है। इसलिए, क्योंकि कोई भी न्यूज चैनल देख लीजिए, अखबार पढ़ लीजिए। मोदी खलनायक के रूप में नजर आएंगे। मतलब, मीडिया और मोदी की रिश्तेदारी बहुत मजबूत है। बाकी लोग मीडिया से घबराते हैं। भागते हैं। पर, मीडिया मोदी के पीछे दौड़ता दिखता है। और मोदी जब मिल जाते हैं, तो वह उनको बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। यह सबको लगता है।

 

इतिहास गवाह है। अखबारों ने, टीवी ने और सोशल मीडिया ने भी मोदी को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक दशक से भी ज्यादा वक्त बीत गया, पर गोधरा को मोदी के माथे का मुकुट बनाने से मीडिया नहीं चूकता। गोधरा में ट्रेन में सोए लोगों को जिंदा जलाने के अपराधी मुसलमानों की कोई गलती नजर नहीं आती। मीडिया ऐसा साबित करने पर तुला हुआ है,जैसे गुजरात का मुसलमान होना इस पूरे पृथ्वी लोक पर सबसे सीधी प्रजाति का परिचायक है। और बाकी गुजरातियों से बड़ा हैवान इस दुनिया में कोई नहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी एक हथियार का जब जरूरत से ज्यादा किसी के खिलाफ उपयोग किया जाए। तो वह हथियार तो अपनी धार खो ही देता है। वार सहनेवाला भी उससे बचने और उसके जरिए ही मजबूत होने की कलाबाजियां जान लेता है। फिर मोदी तो, दुश्मन के हथियार को उसी के खिलाफ उपयोग करने में माहिर हैं।

मोदी और उनके गुजरात के साथ भी मीडिया ने जो किया वह सबके सामने है। गोधरा को कलंक साबित करने की कोशिश कांग्रेसी ने की। पर, यह तो आपको भी मानना ही पड़ेगा कि, कांग्रेस की उस कोशिश को मोदी के माथे पर मढ़ने की महानता मीडिया ने की। लेकिन, इस सबने मोदी को बदनामी कम और ख्याति ज्यादा दी है। कांग्रेस के कहे – कहे, मीडिया जैसे जैसे मोदी को मुसलमानों का विरोधी बताता रहा, दूसरा वर्ग लगातार मोदी के साथ और मजबूती से खड़ा होता रहा। सत्य यही है कि मीडिया ने एक खास वर्ग में मोदी को बहुत बदनामी दी। लेकिन तथ्य यह भी है कि मीडिया के इस आचरण ने ही मोदी को दूसरे वर्ग में बहुत ज्यादा लोकप्रियता दी। देश के सारे ही राज्यों के सीएम और मनमोहनसिंह के पूरे के पूरे मंत्रिमंडल सहित बहुत सारे भूतपूर्व और अभूतपूर्व सीएम और मंत्री वगैरह देश का प्रधानमंत्री बनने के सपने पालते हैं। उनमें से ज्यादातर का तर्क यही है कि मनमोहनसिंह से तो वे ज्यादा काबिल हैं। और उनके इस तर्क में सच्चाई भी है। फिर, मोदी पीएम बनने के प्रयास में है, तो गलत क्या है। पर, मीडिया ने मोदी को  देश का सबसे बड़ा दावेदार बता बताकर भारत भर में उनको राजनीतिक निशाने पर लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन इस सबसे भी मोदी देश भर के मुख्यमंत्रियों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही ऊंचे लगने लगे। गुजरात में तो उनका कद इतना बढ़ा गया कि प्रदेश में बाकी सारे नेता उनके सामने नेता बौने लगने लगे हैं। कांग्रेस में तो खैर, वैसे भी उनके मुकाबले का कोई था ही नहीं।

अपना मानना है कि मोदी को अतिरक्षात्मक भी कांग्रेस ने नहीं, मीडिया ने ही किया है। कांग्रेस सहित बहुत सारे केशुभाई पटेलों, सुरेश मेहताओं, प्रवीण मणियारों और प्रवीण तोगड़ियाओं, जैसे लोगों ने तो विरोध में मैदान में उतरकर मोदी को मजबूत ही किया है। अपन मोदी के आभामंडल से अभिभूत प्राणी नहीं है। फिर भी यह सब इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि गुजरात, गुजरात की जनता और उस जनता के गुजरात प्रेम की तासीर से अपन वाकिफ हैं। पिछले चुनाव में भी गुजरात में मीडिया मोदी का कांग्रेस से भी बड़ा दुश्मन बना हुआ था। लेकिन क्या हुआ। इस बार भी मोदी के खिलाफ कांग्रेस से भी बड़े शत्रु के रूप में मीडिया मैदान में है। लेकिन हर मैदान की मुश्किल यह है कि बिना धूल के वह बन नहीं पाता। और गुजरात के इस मैदान की मुश्किल यह है कि उसकी धूल को चाटना मोदी विरोधियों के खाते में ही लिखा है। सो,  कुछ दिन बाद गुजरात में मीडिया एक बार फिर धूल चाटता दिखे, तो इसमें तो आप भी क्या कर सकते हैं।

लेखक निरंजन परिहार वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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