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बाल दिवस के लिए विशेष : लौटाएं ‘छोटू ‘ का बचपन

छोटू चाय ले आ …. छोटू  पानी ले आ …… छोटू मेज साफ़ कर …….. यह आवाजें हमेशा कहीं न कहीं हमें सुनने को मिल ही जाती हैं। कभी घरों, कभी होटलों, कभी ढाबों में तो कभी किसी दुकान पर। यह वही छोटू हैं जो माँ बाप से दूर दुसरे के हुकूम पर दौड़ता रहता है। न तो उसकी कोई चाह रह पाती है न कोई अरमान। बच्चे देश के भविष्य होते हैं और जिस देश के बच्चों की ये हालत भो हो उस देश के भविष्य का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। बहुत सारे बच्चे ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं। होटल, ढाबों और घरों में काम करने वाले बच्चों का मानसिक शारीरिक उत्पीड़न इतना अधिक होता हैं कि उनके व्यक्तित्व का विकास ही नहीं हो पाता और इसी तरह के कामों में पूरी जिंदगी गुजार देते हैं।

छोटू चाय ले आ …. छोटू  पानी ले आ …… छोटू मेज साफ़ कर …….. यह आवाजें हमेशा कहीं न कहीं हमें सुनने को मिल ही जाती हैं। कभी घरों, कभी होटलों, कभी ढाबों में तो कभी किसी दुकान पर। यह वही छोटू हैं जो माँ बाप से दूर दुसरे के हुकूम पर दौड़ता रहता है। न तो उसकी कोई चाह रह पाती है न कोई अरमान। बच्चे देश के भविष्य होते हैं और जिस देश के बच्चों की ये हालत भो हो उस देश के भविष्य का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। बहुत सारे बच्चे ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं। होटल, ढाबों और घरों में काम करने वाले बच्चों का मानसिक शारीरिक उत्पीड़न इतना अधिक होता हैं कि उनके व्यक्तित्व का विकास ही नहीं हो पाता और इसी तरह के कामों में पूरी जिंदगी गुजार देते हैं।

 

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण गरीबी और अशिक्षा है। ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ के नारे उस समय बेमानी साबित होते है जब एक-एक परिवार में बिना नियंत्रण के बहुत सारे बच्चे पैदा हो जाते हैं। दो वक्त की रोटी के संकट से गुजरने के लिए माँ बाप अपने बच्चे को मजबूरन काम पर लगा देते हैं। कुछ बच्चे तो गाँव मे ही किसी  समृद्ध घर में काम पा जाते हैं तो कुछ शहरों और महानगरों में किसी न किसी  माध्यम से घरों ,होटलों और ढाबों तक पहुँच जाते हैं।  यहीं पर इनका  नाम  ‘छोटू’ पड़  जाता हैं।

शायद ही ऐसे किसी बच्चे से किसी ने उसका नाम पूछा होगा। माँ के प्यार और बाप की डांट से मरहूम ये बच्चे  अपना बचपन ही नहीं देख पाते और कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। खेलना-कूदना तो इनके नसीब में ही नहीं होता। ‘आईएम कलाम’ फिल्म में बड़े मार्मिक ढंग से गरीबी से  तंग बच्चे को ढाबे पर जीवन संघर्ष करते हुए दिखाया गया हैं। फिल्म का अंत सुखद  इसलिए होता है कि अंत उस बच्चे को स्कूल जाते दिखाया गया है। काश ऐसा हर छोटू के साथ होता तो कितना अच्छा होता।

एक तरफ तो हम अपने बच्चों को जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं उसकी जरा भी आवाज पर दौड़ पड़ते है और दुसरे के बच्चे का बचपन छीनते हैं। यह कितना दुखद है। आज जरूरत है सामजिक बदलाव की, ऐसे बच्चे जो घरों, होटलों और ढाबों में काम कर रहे हैं उन्हें बाल श्रम से मुक्त कराकर उनके बचपन को लौटने की उनको पढ़ाने की। आइये एक कदम  बढ़ाएं,  लौटाएं ‘छोटू’ का बचपन।

हरेन्द्र प्रसाद सिंह

प्रधानाचार्य

अकबरपुर

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