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‘जब तक है जान’ से बेहतर है ‘सन ऑफ सरदार’

Rahul Mahajan : सन ऑफ सरदार और जब तक है जान दोनो फिल्में देखी मै कह सकता हूं की सन ऑफ सरदार कहीं बेहतर है। केवल शारुख खान या यश चोपडा की आखिरी फिल्म होने के नाते जब तक है जान को बेहतर ठहराना गलत होगा। बहुत पकाऊ फिल्म है, ऐसा लगता है रोमांटिक फिल्म में कुछ एक्साइटमेंट डालने के लिए हॉलिवुड फिल्म हर्ट लॉकर को घुसेड दिया है। मै मानता था कि यश राज फिल्मस अपनी फिमेल लीडस को बेहतर तरीके से पेश करता है लेकिन लगता है सारा ध्यान कैटरीना पर ही दे दिया गया अनुशका को तो भूल ही गए बेहद खराब लग रही है अनुशका इस फिल्म मे।

Rahul Mahajan : सन ऑफ सरदार और जब तक है जान दोनो फिल्में देखी मै कह सकता हूं की सन ऑफ सरदार कहीं बेहतर है। केवल शारुख खान या यश चोपडा की आखिरी फिल्म होने के नाते जब तक है जान को बेहतर ठहराना गलत होगा। बहुत पकाऊ फिल्म है, ऐसा लगता है रोमांटिक फिल्म में कुछ एक्साइटमेंट डालने के लिए हॉलिवुड फिल्म हर्ट लॉकर को घुसेड दिया है। मै मानता था कि यश राज फिल्मस अपनी फिमेल लीडस को बेहतर तरीके से पेश करता है लेकिन लगता है सारा ध्यान कैटरीना पर ही दे दिया गया अनुशका को तो भूल ही गए बेहद खराब लग रही है अनुशका इस फिल्म मे।

 

म्यूज़िक खराब है, एक दर्शक की तरह बोल सकता हूं कि केवल एक गाना इश्क शवा अपनी ओर ध्यान खींचता है। शाहरुख पर उर्म दिखने लगी है, अपने से बेहद छोटी हिरोइन के साथ इश्क लडाते अब वो गले से नीचे नही उतरते। एक उदाहरण है कि कैसे बेहतर अदाकार, डायरेक्टर, म्यूज़िक के सबसे बडे उस्ताद मिलकर एक खराब फिल्म बना सकते हैं।

वहीं सन ऑफ सरदार बेहद हलकी फुल्की फिल्म है, अजय देवगन, संजय दत्त और जूही चावला का काम बेहतरीन है, कॉमेडी रोल में अजय बेहद अच्छे लगते हैं और उसे बेहतरीन तरीके से निभाते हैं। मैने सोचा था कि फिल्म में बोल बच्चन की झलक दिखाई देगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं बल्की फिल्म आपको खिलखिलाने पर मजबूर कर देती है। म्यूज़िक अच्छा है। फिल्म में बस एक ही कमी है कि हिन्दी फिल्मों में रजनीकांत स्टाइल फाईट सीन (हवा में उडते लोग और गाडियां) ज़ोर पकडते जा रहें हैं जो शायद एक दर्शक वर्ग को ही पसंद आते हैं।

यह टिप्पणी टीवी जर्नलिस्ट राहुल महाजन ने अपने फेसबुक वॉल पर की है.

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