यूं तो दुनिया का दस्तूर है कि आंख बंद होते ही किसी भी इंसान के तमाम गुनाहों पर दुनिया में पर्दा डालने की कोशिश की जाती है। बड़े बड़े विरोधी भी मरने के बाद मरने वाले के लिए अच्छे शब्दों का प्रयोग करते हैं। ठीक इसी तरह बाल ठाकरे की मौत के बाद यही दुआ निकलती है कि ख़ुदा उनके परिवार को इस सदमे से उबरने के लिए ताक़त दे। बाल ठाकरे के निधन के बाद लगता है कि एक दौर का अंत हो गया। साथ ही ये दुआ भी है कि बाल ठाकरे के बनाई लीग के इस दौर का अंत हो ही जाए तो अच्छा है। समाजहित में भी और देश हित में भी। क्योंकि जिस दौर और जिस तरह की राजनीति के दम पर बाल ठाकरे ने अपनी पहचान बनाई वो राजनीति कम, बल्कि नफरत की पौधशाला ज़्यादा थी। भले ही उत्तर भारतीयों के दम पर बाल ठाकरे अपने ज़िंदगी बसर करते रहे हों, मगर उन्होंने हमेशा उत्तर भारतीयों के लिए अपमानजनक और बेहूदा शब्दों का ही इस्तेमाल किया। ये वही बालठाकरे थे जिन्होंने बॉम्बे में गुजरातियों के ख़िलाफ उठाओ लुंगी बजाओ पुंगी जैसे नारे देकर नफरत की शुरुआत की थी इसके अलावा मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीयों की कामयाबी से जलते हुए उनके खिलाफ मुहिम चलाई थी। और तो और 90 के दशक में लिट्टे जैसे संघटन को खुला समर्थन दिया, वो कहते थे कि मैं हिटलर का फैन हूं।
बाल ठाकरे ने मुस्लिमों के खिलाफ हिंदुओं का आत्मघाती दस्ता बनाने की बात कहकर समाज में नफरत के बीज बोने की नाकाम कोशिश की थी। इतना ही नहीं देश की बेहद अहम कड़ी एक समाज को ‘एक बिहारी, सौ बीमारी’ का नारा दिया था। चाहे संजय निरुपम हों या प्रेम शुक्ल जो उनके अख़बार के स्थानीय संपादक रहें, चाहे उनके समाचार पत्र और सियासत में उत्तर भारतीयों की ख़ासी तादाद रही हो, मगर उनकी ज़ुबान पर कभी उत्तर भारतीयों के लिए नरम शब्द नहीं देखे गये। ठीक ऐसे ही ज़िंदगी के आख़री पड़ाव पर जिस समाज के डॉक्टरों ने उनके लिए रात दिन एक कर दिया हो, उसको बाल ठाकरे ने हमेशा अपनी ज़ुबान से अपमानित करनी की नाकाम कोशिश की है। वैसे बालठाकरे को हिंदू हृदय सम्राट कहने वाला एक बड़ा तबक़ा भी उनकी नाकाम और नफरत की सोच को समझने के बाद उनसे काफी हद तक छिटक गया था। इतना ही नहीं उनकी संकीर्णता और पुत्रमोह के चलते उनका सबसे विश्वासपात्र और भरोसेमंद भतीजे तक का मोह भंग हो गया था। नतीजा शिवसेना के जवाब में नई पार्टी वजूद में आई। उत्तर भारतीय बनाम बिहारी, कभी गुजरातियों की पुंगी बजाने का ऐलान करने जैसे कई नारे देने वाले बालठाकरे के हाथों भीड़ को उकसाकर दंगों के दौरान, जिन लोगों ने अपनो को खोया या कोई नुक़सान झेला होगा, उनको भी अब बाल ठाकरे को माफ कर देना चाहिए।
वैसे बालठाकरे की मौत के कारण कुछ भी रहे हों, मगर कहा यही गया कि दिल का दौरा पड़ने स उनकी मौत हुई है। चूंकि बिना पोस्टमार्टम और मेडिकल रिपोर्ट के सार्वजिनक हुए बग़ैर कारणों पर बहस करना ठीक भी नहीं है। लेकिन अब उनकी मौत के बाद उनके लिए अच्छे शब्दों से उनको याद करना चाहिए। कभी महाराष्ट्र से बाहर की दुनिया से रुबरू न होने वाले बालठाकरे भले ही देश की असल तस्वीर से अंजान ही रहे हों। मगर पूरा देश उनके लिए गमगीन है। आख़िर में यही दुआ है कि में प्रेम और भाई चारे का पैगाम दें। शायद यही उनकी आत्मा की शांति के सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जिस तरह की भाषा और नफरत के दम पर उन्होंने देश और समाज को हमेशा दांव पर लगाए रखा, उसका अब अंत ही हो जाना चाहिए। अब उनके मानने वाले भी इस परंपरा को आगे ना बढ़ाते हुए देशहित में प्रेम और भाई चारे का पैगाम दें। शायद यही उनकी आत्मा की शांति के सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
लेखक आज़ाद ख़ालिद टी.वी जर्नलिस्ट हैं आजकल इंडिया न्यूज़ में सेवारत हैं।


