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कसाब को फांसी चोरी-छिपे क्यों?

अजमल कसाब को सरकार ने फांसी क्या दी, मानो महान साहसिक कार्य कर दिया है| सरकारी नेतागण हर्षातिरेक से पागल हो रहे हैं| कई मंत्रिगण गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं| वे भारत की न्याय-व्यवस्था की दक्षता के गीत गा रहे हैं| यह रवैया हास्यास्पद प्रतीत होता है| कसाब की फांसी से उठे स्वाभाविक सवालों पर यह रवैया पर्दा डालने का काम कर रहा है| सबसे पहला सवाल तो यह उठता है कि कसाब को फांसी देने में इतनी गोपनीयता क्यों बरती गई? भारत सरकार किस बात से डरी हुई थी? यदि कसाब को मुंबई की चौपाटी या दिल्ली के विजय चौक पर लटका दिया जाता तो क्या होता? क्या भारत में एक भी आदमी उसका विरोध करता? क्या भारत सरकार को शक है कि कुछ लोग कसाब के लिए आंसू बहाते? यदि है तो वह उनका नाम बताए! यदि नहीं तो कसाब की फांसी सारे आतंकवादियों के लिए एक कड़ा सबक बन सकती थी लेकिन भारत सरकार ने यह सुनहरा मौका अपने हाथ से गंवा दिया|

अजमल कसाब को सरकार ने फांसी क्या दी, मानो महान साहसिक कार्य कर दिया है| सरकारी नेतागण हर्षातिरेक से पागल हो रहे हैं| कई मंत्रिगण गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं| वे भारत की न्याय-व्यवस्था की दक्षता के गीत गा रहे हैं| यह रवैया हास्यास्पद प्रतीत होता है| कसाब की फांसी से उठे स्वाभाविक सवालों पर यह रवैया पर्दा डालने का काम कर रहा है| सबसे पहला सवाल तो यह उठता है कि कसाब को फांसी देने में इतनी गोपनीयता क्यों बरती गई? भारत सरकार किस बात से डरी हुई थी? यदि कसाब को मुंबई की चौपाटी या दिल्ली के विजय चौक पर लटका दिया जाता तो क्या होता? क्या भारत में एक भी आदमी उसका विरोध करता? क्या भारत सरकार को शक है कि कुछ लोग कसाब के लिए आंसू बहाते? यदि है तो वह उनका नाम बताए! यदि नहीं तो कसाब की फांसी सारे आतंकवादियों के लिए एक कड़ा सबक बन सकती थी लेकिन भारत सरकार ने यह सुनहरा मौका अपने हाथ से गंवा दिया|

 

कसाब को चोरी-छिपे फांसी देने का अर्थ क्या है? यह अर्थ किसी भी स्वदेशी सरकार के लिए कंलक है| इस तरह की चोरी-छिपे फांसियां विदेशी सरकारें देती हैं, जिन्हें डर लगा होता है कि यदि हजारों लोगों की उपस्थिति में खुले-आम फांसी दी जाएगी तो बगावत हो जाएगी| कसाब तो विदेशी था, फिर भी उसे जो फांसी दी गई, वह इस तरह दी गई, जैसे वह भगतसिंह हो, कोई देशभक्त हो| फांसी भी कहां दी गई? पुणे की यरवदा जेल में, जहां महात्मा गांधी ने जेल काटी थी| भगतसिंह और उनके साथियों को अंग्रेज ने इसी तरह गुपचुप लटकाया था और मध्य-रात्रि में उनकी अंत्येष्टि कर दी थी| इस सरकार में जरा भी दम होता तो कसाब की फांसी को वह उतना ही गंभीर रुप देती, जो मुंबई-हमले को मिला था| अंग्रेजों ने भगतसिंह का शव-दाह मध्य-रात्रि में किया और दो साथियों के शव नदी में बहा दिए लेकिन हमारी सरकार ने क्या किया? उसने कसाब के लिए कब्र भी सजा दी| उसने अमेरिकियों से कुछ नहीं सीखा| उन्होंने उसामा बिन लादेन के शव को समुद्र की गहराइयों में बिला दिया था| क्या कसाब उसामा से भी बड़ा आदमी था?

 

कसाब के शव की राजनीति शुरु हो गई है| अब अंसार बर्नी उसे पाकिस्तान ले जाना चाहते हैं| भारत सरकार अब क्या करेगी? वह शव दे देगी तो उस शव की पूजा करनेवाले पाकिस्तान में हजारों मिल जाएंगे| भारत सरकार के अविवेक और दब्बूपन पर वे हंसेंगे| यदि शव नहीं देगी तो वह कब्र पुणे का स्थायी कलंक बन जाएगी| कसाब की फांसी और दफन की वीडियो फिल्म भी सरकार ने बनवाई है और वह इसका प्रचार भी कर रही है| कम से कम प्रचार की तो जरुरत बिल्कुल नहीं थी, क्योंकि यदि वह फिल्म यू-ट्यूब पर चली गई तो भारत सरकार के लेने के देने पड़ जाएंगे| कसाब को सरकार फांसी नहीं देती तो क्या करती? उसके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं था| अदालत के पास क्या विकल्प था? कसाब ने अपना जुर्म साफ-साफ स्वीकार किया था| उसको अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं था| पाकिस्तानी सरकार ने भी उसे अपने हाल पर छोड़ दिया था| उसके साथ दूर-दूर तक अपना कोई संबंध नहीं माना था| इसलिए भारत सरकार को पाकिस्तान से भी कोई डर नहीं था| तो फिर उसे चोरी-छिपे फांसी देने की जरुरत क्या थी?

 

कसाब को लटकाने में सरकार ने चार साल लगा दिए, इसका औचित्य सिद्ध करना कठिन नहीं है| भारत सरकार कितनी कानूनप्रिय और न्यायप्रिय है कि उसने कसाब को पूरा मौका दिया कि वह अपने आप को निर्दोष सिद्ध कर सके| सारे संसार को भारत ने मौका दिया कि वह कसाब के साथ न्याय होता हुआ देख सके| यह तर्क ठीक भी हो सकता है लेकिन कसाब जैसे आतंकवादी हत्यारे को सजा देने में चार साल का खप जाना क्या किसी भी न्याय-व्यवस्था के लिए गर्व का विषय हो सकता है? दर्जनों फांसी की सजावाले कैदी बरसों इंतजार करते रहते हैं| इस दृष्टि से कसाब के मामले को दक्षता का प्रमाण माना जा सकता है| इस मौके पर अफजल गुरू का मामला उठना स्वाभाविक है| किस डर के मारे अफजल गुरू भारत सरकार का मेहमान बना हुआ है? भारत की संप्रभुता की प्रतीक संसद पर हमला करनेवाले को सजा देने के सवाल पर सरकार की घिग्घी क्यों बंधी हुई है? यदि गुरु की फांसी पर चूं चपड़ करनेवालों के साथ यह सरकार सख्ती से पेश नहीं आ सकती तो उसे सरकार कहलाने का कोई हक नहीं है| भारत सरकार के इस दब्बू रवैए के कारण ही पड़ौस में बने हुए आतंक के अड्डे आज तक सुरक्षित हैं|

 

सिर्फ कसाब को फांसी देना काफी नहीं है| उसके जुर्म को अंजाम देनेवाले अभी भी पाकिस्तान में सुरक्षित हैं| कसाब तो आतंक की फूल-पत्ती है, उसकी जड़ें अभी भी पाकिस्तान में हरी हैं| जब तक इन जड़ों को उखाड़ने का प्रचंड संदेश पाकिस्तान नहीं जाएगा, आतंकवाद से भारत का पिंड छूटनेवाला नहीं है| यदि पाकिस्तानी सरकार अपने आतंकवादियों को नकेल पिरोने में असमर्थ है तो भारत को सीधी कार्रवाई की धमकी तो देनी ही चाहिए| अजमल कसाब को चोरी छिपे फांसी देनेवाली सरकार से मैं यह कुछ ज्यादा ही मांग कर बैठा हूं लेकिन कसाब की फांसी के बाद भारत सरकार को पता चल जाएगा कि पाकिस्तानी सरकार भारत-विरोधी आतंकवाद से निबटने का जो दावा करती है, उसमें कुछ ईमानदारी भी है या वह कोरी जबानी जमा-खर्च है| कसाब की फांसी पर बौखलानेवालों की पाकिस्तान में कमी नहीं है| इसीलिए हमारे प्रधानमंत्री ने पाक-यात्र स्थगित करके ठीक ही किया लेकिन यह दोनों सरकारों की कमजोरी का भी जीता-जागता प्रमाण है| आसिफ ज़रदारी सरकार की कमजोरी तो सबको पता है| यह भी सब जानते हैं कि भारत-विरोधी आतंकवादियों को पाकिस्तान की आईएसआई और फौज का संरक्षण प्राप्त है लेकिन कसाब को डंके की चोट पर न लटकानेवाली सरकार कितनी मजबूत है, यह भी सबको पता चल गया है|

 

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार और स्‍तंभकार हैं.

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