अरबपति व्यापारी चड्ढा भाइयों की हत्या के मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा उत्तराखंड अल्प संख्यक आयोग के बर्खास्त अध्यक्ष सुखदेवसिंह नामधारी की गिरफ्तारी और उसे इस चर्चित हत्याकांड का मुख्य षड्यंत्रकर्ता करार देने से एक बार फिर आपराधियों और सियासत की जुगलबंदी बेपर्दा हो गई है। नामधारी की गिरफ्तारी के बाद सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता की प्रबल पैरोकार भारतीय जनता पार्टी मौन है। इस मामले में उत्तराखंड की दूसरी सियासी पार्टियाँ भी मुँह खोलने से परहेज कर रहीं हैं। वैसे तो सियासत और आपराधियों का भाई-चारा जगजाहिर है। पर देव भूमि की सियासत और नामधारी का अपने को सबसे अलग सियासी पार्टी बताने और जताने वाली भाजपा से जुड़ा होने की वजह से यह मसला कुछ खास है। सवाल भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरे का है। नामधारी प्रकरण के बहाने लम्बे जनांदोलन और बड़ी शहादतों के बाद सिर्फ बारह साल पहले बने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का निवास माने जाने वाले उत्तराखंड के सियासी मिजाज को बखूबी समझा और परखा जा सकता है।
नामधारी उत्तराखंड में भाजपा का सक्रिय कार्यकर्ता और नेता था। प्रदेश में भाजपा की सरकार के रहते नामधारी की तूती बोलती थी। राज्य की भाजपा सरकार ने नामधारी को अल्प संख्यक आयोग के अध्यक्ष जैसे अहम ओहदे से नवाजा था। चड्ढा भाइयों की हत्या के मामले में नाम आने के बाद 20 नवंबर को राज्य की काग्रेसी सरकार ने नामधारी को अल्प संख्यक आयोग के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया। नामधारी की बर्खास्तगी पर भाजपा की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। इस बारे में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल का अख़बारों में बयान छपा कि नामधारी अब तक किसी भी प्रकरण में दोषी करार नहीं दिए गए हैं। इसलिए उन्हें अपराधी बताना गलत है। उन्होंने नामधारी को अल्प संख्यक आयोग के अध्यक्ष से हटाने को सियासी विद्वेष करार दिया था। हालाँकि दिल्ली पुलिस द्वारा नामधारी को गिरफ्तार करने के तीन दिन बाद 26 नवंबर को भाजपा को शर्मा-शर्मी नामधारी को पार्टी से निष्कासित कर उसकी प्राथमिक सदस्यता खतम करने का ऐलान करना पड़ा।
सुखदेव सिंह नामधारी उधमसिंह नगर जिले के बाजपुर के ताली गाँव का रहने वाला है। उसका स्टोन क्रेशर का कारोबार है। खनन के कारोबार में नामधारी ग्रुप एक चर्चित और जाना-पहचाना नाम है। 1995 में बाजपुर के नामी व्यापारी गुरचरण शर्मा हत्या कांड में आरोपी के रूप में नाम आने के बाद नामधारी चर्चा में आया। इसके बाद उसके अपराधों की फेहरिश्त बढ़ती चली गई। उसी अनुपात में सियासी रसूख भी। अकेले बाजपुर पुलिस थाने में उसके खिलाफ दर्जन भर अपराधिक मामले दर्ज हैं। जिनमें से दो मामले अभी भी अदालत के विचाराधीन बताए जाते हैं। दिल्ली पुलिस ने खुलासा किया है कि नामधारी के खिलाफ 1993 से 2009 के बीच बाजपुर समेत छब्बीस से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हैं। उसके पास अवैध हथियारों का जखीरा होने की बात भी दिल्ली पुलिस ने कही है।
17 नवंबर को लिकर किंग पोंटी चड्ढा और उसके भाई हरदीप चड्ढा की हत्या में नाम आने से पहले और हत्या के तीन दिन बाद तक नामधारी उत्तराखंड में वीआईपी था। नामधारी का उत्तराखंड की सियासत और मशीनरी में रसूख था। प्रशासन में जबरदस्त पकड़ थी। बताते हैं कि बाजपुर पुलिस ने साल 2003 और 2009 में नामधारी के शस्त्र लाइसेंस निरस्त करने की सिफारिश जिला प्रशासन को भेजी थी। मामला डीएम के दफ्तर में अटक गया। कहा जाता है कि करीब साल भर पहले वाणिज्य कर विभाग ने नामधारी के स्टोन क्रेशर में छापा डाला। कई गड़बड़ियाँ पकड़ीं। दबाव के बावजूद पांच करोड़ की रिकवरी निकाली। नामधारी का सियासी रसूख काम आया। मामला ठंडे बसते के हवाले हो गया। कहने को वह भाजपा में था। पर पैठ उसकी सभी पार्टियों में थी। साल 2009 में नामधारी पर हरिद्वार के निर्मल विरक्त कुटिया में जबरन कब्जा करने के आरोप लगे। कुटिया के महंत ने इस मामले में नामधारी के खिलाफ पुलिस में अलग-अलग तारीखों में दो मामले दर्ज कराए। एक मामले में पुलिस ने तभी फाइनल रिपोर्ट लगा दी। जबकि दूसरी शिकायत में इसी साल कांग्रेसी राज में फाइनल रिपोर्ट लगी। नामधारी को क्लीनचिट। नामधारी पर साल 2006 में जालन्धर, पंजाब से बनाए अपने पासपोर्ट के आवेदन-पत्र में झूठी जानकारियां देने का भी आरोप है।
लोग बताते हैं कि साल 1996-97 में एक एमएलए ने नामधारी की पोटी चड्ढा से मुलाकात कराई थी। कुछ ही वक्त में नामधारी पोंटी चड्ढा के फ्रंटमैन बन गए। उत्तराखंड में नामधारी को पोंटी चड्ढा का बिजनेस कमांडर कहा जाने लगा। नामधारी और पोंटी चड्ढा के निजी और कारोबारी ताल्लुकात जगजाहिर थे। नामधारी की आपराधिक पृष्ठभूमि भी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अपने चाल, चरित्र और चेहरे पर गुमान करते नहीं थकने वाली भाजपा ने
नामधारी को राज्य अल्प संख्यक आयोग जैसी अहम संस्था के अध्यक्ष पद से क्यों नवाजा। इसके पीछे क्या सियासी मजबूरियां थीं । पोंटी चड्ढा बंधुओं की हत्या में नामधारी का नाम आने के बाद उसका आपराधिक चिट्ठा देश के सामने खुल गया तो तीन दिन पहले नामधारी के बचाव में खड़ी भाजपा को नामधारी को बाहर का रास्ता दिखाने पर मजबूर होना पड़ा। नामधारी का भाजपा से जुड़ाव के सियासी निहितार्थ हैं। जो उसे सत्ता की दौड़ में शामिल एक आम सियासी पार्टी होने की गवाही देते हैं। ऐसे मामलों के जगजाहिर होने पर भाजपा के सिद्धांत बेमानी नजर आने लगते हैं। पोंटी चड्ढा भाइयों के हत्याकांड में नामधारी दोषी है या नहीं इसका खुलासा भविष्य में होगा। पर इस प्रकरण के सामने आने के बाद राजनीतिक पार्टियों की सुचिता पर सवालिया निशान अवश्य लग गया है।
लेखक प्रयाग पाण्डे उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा नैनीताल में निवास करते हैं.


