Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बिजनेस

लोकपाल जितना ही जरूरी है मीडिया की शक्तियों का विकेंद्रीकरण

देश में आज लोकपाल की जितनी आवश्यकता है, भ्रष्टाचार को मिटाने की जितनी जरूरत है, उतनी ही अवश्यकता है मीडिया के विकेंद्रीकरण की। जनसामान्य की पहुंच से दूर यह गणित दरअसल सरकार की सोची समझी साजिश व पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की गरज़ से चलाया जाता है। मुझे समाचार चैनलों में कार्य करते हुए करीब 17 साल हो चुके हैं एक पत्रकार से लेकर समूह संपादक तक की जिम्मेवारियां अभी तक निभा रहा हूं। कोई भी सरकार दरअसल चैनलों को मालिकाना हक ज्यादा लोगों को देने की पक्षधर कभी नहीं रही। क्योंकि अधिक लोगों को मैनेज़ करना कठिन हो जाता है। पांच-दस मीडिया घरानों को डरा-धमका कर या फिर विज्ञापनों का निवाल फेंक कर कभी भी मुट्ठी में करना आसान होता है। और यही इस देश में लम्बें अर्से से हो रहा है। सरकार के खिलाफ जो भी चैनल मुंह खोलता है सरकार उसके सामने डीएवीपी का मुंह खोल देती है और बड़े से बड़े तथा कथित चैनलों की जुबान बंद हो जाती है।

देश में आज लोकपाल की जितनी आवश्यकता है, भ्रष्टाचार को मिटाने की जितनी जरूरत है, उतनी ही अवश्यकता है मीडिया के विकेंद्रीकरण की। जनसामान्य की पहुंच से दूर यह गणित दरअसल सरकार की सोची समझी साजिश व पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की गरज़ से चलाया जाता है। मुझे समाचार चैनलों में कार्य करते हुए करीब 17 साल हो चुके हैं एक पत्रकार से लेकर समूह संपादक तक की जिम्मेवारियां अभी तक निभा रहा हूं। कोई भी सरकार दरअसल चैनलों को मालिकाना हक ज्यादा लोगों को देने की पक्षधर कभी नहीं रही। क्योंकि अधिक लोगों को मैनेज़ करना कठिन हो जाता है। पांच-दस मीडिया घरानों को डरा-धमका कर या फिर विज्ञापनों का निवाल फेंक कर कभी भी मुट्ठी में करना आसान होता है। और यही इस देश में लम्बें अर्से से हो रहा है। सरकार के खिलाफ जो भी चैनल मुंह खोलता है सरकार उसके सामने डीएवीपी का मुंह खोल देती है और बड़े से बड़े तथा कथित चैनलों की जुबान बंद हो जाती है।

सरकार ने एक सुनियोजित नीति के तहत चैनलों की लाइसेंस फीस इतनी अधिक कर दी है कि चैनल अब आम आदमी की औकात से बाहर हो गए हैं। चैनल से सरकारें डरती हैं इस बात का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि यदि आपको समाचार पत्र की रजिस्‍ट्रेशन चाहिए तो एक नम्बर व दो नम्बर में मिला कर कुल 20 से 30 लाख का खर्चा व 20 करोड़ की कम्पनी वर्थ किंतु यदि आपने समाचार पत्र खोलना है तो रजिस्‍ट्रेशन फ्री। और यहीं पर खेल खेला जा रहा है। चैनल की सैटेलाइट पर प्रतिमाह 5 लाख खर्च आता है। आफिस, स्टाफ, लीज़ लाइन मिला कर व वितरण, कुल मिला कर छोटा चैनल भी कोई चलाना चाहे तो साल का 3 करोड़ का खर्च तो तय मानिए। अब यदि सरकार इसका विकेंद्रीकरण करने की नियत बनाए तो जाहिर है इसकी दरों में कटौती तो करनी ही होगी। हमने एक छोटा सा प्रयोग कर यह जानने की कोशिश की कि सस्ते में चैनल कैसे चलाया जा सकता है। और हमने पाया कि सरकार यदि समाचार पत्रों की भांति समाचार चैनलों की रजिस्‍ट्रेशन मुफ्त कर दे तो जितने मूल्य में किसी समाचार पत्र की 1000 प्रतियां छपती हैं उतने ही मूल्य में एक चैनल को दुनिया की हर कोने तक पहुंचाया जा सकता है।

हमने इसके लिए कुछ साफ्टवेयर इंजीनियरों की मदद ली और एक ऐसा बाक्स तैयार किया जो सैटेलाइट के बिना हमारे सिग्नल को इंटरनेट के माध्यम से केबल आपरेटर के कंट्रोल रूम तक पहुंचा सके। हमारा यह प्रयोग बेहद सफल रहा। हमने एक फोटोन की मदद से सिग्नल अपलिंक किया और कुछ इसी तरह एक ब्राड बैंड के माध्यम से इसे डाउनलिंक किया। प्रयोग के तौर पर हमने शिमला में एक महीने तक केबल आपरेटर को सिग्नल देकर यहां चैनल चलाया। आज 20 लाख की लागत से कोई भी व्यक्ति हमारी तकनीकी का उपयोग कर अपना एचडी क्वालिटी का चैनल खुद खड़ा कर सकता है। और यदि ऐसा होता है तो आपको जी के रिश्वत कांड जैसी कोई हरकत कभी नहीं मिलेगी। क्योंकि अधिकांश न्यूज़ चैनल अत्याधिक खर्चों के बोझ तले इस कदर दबे हैं कि वे खर्चे पूरा करने के लिए हर वह अनैतिक कार्य करने के लिए तैयार हैं जो पत्रकारिता को गर्त में धकेल रहा है।

क्षेत्रीय स्तर पर विदेशों में मीडिया को प्रोत्साहित करने के प्रयोग कारगर साबित हुए हैं। कम खर्चे के मीडिया के भ्रष्ट होने की कम संभावना है और यदि वह छोटे स्तर पर भ्रष्ट होने भी लगे तो उस पर सहजता से नकेल कसी जा सकती है, किंतु बड़े समूहों का भ्रष्टाचार यदा-कदा  ही उजागर हो सकेगा। बड़े मीडिया समूहों में भ्रष्टाचार का आजाद भारत में अब तक का पहला बड़ा मामला जी का ही सामने आया तो क्या आज तक मीडिया में भ्रष्टाचार हुआ ही नहीं? दरअसल ऐसा अक्सर होता है किंतु मीडिया पर हाथ डालने की हिमाकत न तो अधिकारी कर पाते हैं और न ही राजनेता इनसे पंगा ले पाते हैं। इसीलिए मीडिया में सब कुछ जायज़ है। लोग सिस्टम को तो खूब गालियां देते हैं किंतु समाधान नहीं दे पाते। यह लेख एक समाधान है मीडिया के अन्दर पनप रही गंदगी को साफ करने का, इलेक्ट्रानिक मीडिया की शक्तियों के विकेंद्रीकरण का।

लेखक गोपाल शर्मा लाइव टुडे सैटेलाइट चैनल के मुख्य संपादक व न्यूज़ लाइव नाऊ रिसर्च टीम के निदेशक हैं।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...