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बेईमान अफसरों से क्‍या नाता है सरकार का?

किसी भी सरकार के लिए यह प्रतिष्ठा की बात होती है और साथ ही सरकार का यह कर्तव्य भी होता है कि वह ईमानदार और योग्य अफसरों को उन स्थानों पर तैनात करे जहां पर तैनात होने के लिए बेईमान अफसर दिन रात एक किए रहते हैं। मायावती की पूरी सरकार सिर्फ इसीलिए बदनाम थी कि उसने उन बदनाम अफसरों को उन स्थानों पर तैनात कर दिया था जो स्थान पैसा कमाने की मशीन माने जाते हैं। अखिलेश सरकार के सभी जिम्मेदार पदाधिकारी उस समय कहते थे कि सरकार बनने पर इन बेईमान अफसरों को जेल जाना ही होगा। अखिलेश यादव अपने ईमानदारी के नारे और सुशासन की बात करके देश के सबसे बड़े सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री बन गए। मगर सिर्फ बोतल बदली और शराब वही पुरानी सिद्ध हुई। जिस तरह पिछली सरकार में बेईमान अफसरों का बोलबाला था वैसा ही बोलबाला इन बेईमानों का इस सरकार में भी दिख रहा है। नतीजा सबके सामने है। नौ महीने पूरे होने जा रहे हैं मगर अखिलेश यादव के सपने चूर-चूर हो रहे हैं और इसका सबसे बड़ा कारण नौकरशाही है।

किसी भी सरकार के लिए यह प्रतिष्ठा की बात होती है और साथ ही सरकार का यह कर्तव्य भी होता है कि वह ईमानदार और योग्य अफसरों को उन स्थानों पर तैनात करे जहां पर तैनात होने के लिए बेईमान अफसर दिन रात एक किए रहते हैं। मायावती की पूरी सरकार सिर्फ इसीलिए बदनाम थी कि उसने उन बदनाम अफसरों को उन स्थानों पर तैनात कर दिया था जो स्थान पैसा कमाने की मशीन माने जाते हैं। अखिलेश सरकार के सभी जिम्मेदार पदाधिकारी उस समय कहते थे कि सरकार बनने पर इन बेईमान अफसरों को जेल जाना ही होगा। अखिलेश यादव अपने ईमानदारी के नारे और सुशासन की बात करके देश के सबसे बड़े सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री बन गए। मगर सिर्फ बोतल बदली और शराब वही पुरानी सिद्ध हुई। जिस तरह पिछली सरकार में बेईमान अफसरों का बोलबाला था वैसा ही बोलबाला इन बेईमानों का इस सरकार में भी दिख रहा है। नतीजा सबके सामने है। नौ महीने पूरे होने जा रहे हैं मगर अखिलेश यादव के सपने चूर-चूर हो रहे हैं और इसका सबसे बड़ा कारण नौकरशाही है।

प्रदेश में प्रमुख सचिव नियुक्ति का पद बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील होता है। माना जाता है कि योग्य और ईमानदार अफसर इस जगह तैनात किया जायेगा जिससे वह प्रदेश भर के अफसरों का आंकलन करके योग्य अफसरों को ही तैनात करे। मगर जब अखिलेश सरकार बनी तो वह पहले ही कदम पर चूक गयी। प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर राजीव कुमार की तैनाती कर दी गयी। उनके खिलाफ सीबीआई नोयडा में हुए भूमि घोटाले में जांच कर रही थी। इस तैनाती के तुरंत बाद वीकएंड टाइम्स ने छापा भी था कि अखिलेश सरकार ने यह तैनाती करके गलती कर दी। मगर मदहोश सत्ता ऐसी चेतावनियों को आम तौर पर नजरअंदाज कर देती है। अखिलेश सरकार भी इससे अछूती नहीं रही। और राजीव कुमार प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर लगातार तैनात रहे। अंतत: सीबीआई के हाथ पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव समेत उन तक पहुंचे और भूमि घोटाले में उन्हें तीन साल की सजा दी गयी।

अब हाईकोर्ट ने नीरा यादव और राजीव कुमार को जमानत दे दी। अब उनके समर्थक इस बात का फिर दबाव बना रहे हैं कि राजीव कुमार को एक बार फिर प्रमुख सचिव नियुक्ति बना दिया जाये। हो सकता है वह इस दबाव में कामयाब भी हो जाएं क्योंकि इस तरह के अफसरों की पैरवी करने वालों की कोई कमी नहीं है। अखिलेश सरकार को शायद इस बात को सोचने की फुर्सत भी न मिले कि राजीव कुमार की सजा को उच्च न्यायालय ने स्थगित किया है उस सजा को खत्म नहीं किया। दूसरे शब्दों में नीरा यादव और राजीव कुमार अभी भी सजा याफ्ता मुजरिम ही हैं। अब अगर फिर से प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर राजीव कुमार की तैनाती होती है तो किस मुंह से सरकार नैतिकता की बात कर सकती है।

इसी प्रकार उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि नोयडा में तैनात आईएएस अफसर राकेश बहादुर और संजीव शरण को तत्काल वहां से हटाएं और उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तैनात न करें। मगर यह दोनों भ्रष्ट अफसर सरकार के इतने दुलारे हैं कि मानो लगता है कि अगर यह हट गए तो नोयडा तबाह हो जायेगा। मजबूरी में न्यायालय को कहना पड़ा कि या तो इन दोनों अफसरों को तत्काल हटाएं या फिर प्रदेश के मुख्य सचिव खुद पेश होकर यह बताएं कि क्यों न उनके विरूद्ध अवमानना की कार्रवाई की जाए। जाहिर है ऐसी टिप्पणी किसी भी सरकार के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा कर देती है बशर्ते कि उस सरकार के लोग इस मामले में संवेदनशील हों। मगर अफसोस की सरकारें इन मामलों में भ्रष्ट अफसरों के प्रति ही ज्यादा संवेदनशील नजर आती हैं। परिणामस्वरूप भ्रष्ट अफसरों का बोलबाला लगातार बढ़ता जा रहा है। राजीव कुमार की इस तैनाती का ही दुष्परिणाम था कि उनकी चापलूसी करने वाले कई अफसर अभी भी ऐसी जगह पर तैनात हैं जहां उन्हें किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए था। इनकी योग्यता सिर्फ इतनी है कि यह पिछली सरकार में फतेह बहादुर की भी इतनी ही चाकरी करते थे जितनी इस समय राजीव कुमार की।

अखिलेश यादव अभी नौजवान हैं। साथ ही उनमें काम करने की इच्छा भी हैं। उन्हें यह बात समझ में आना चाहिए कि नौकरशाही किसी की भी नहीं होती। जो नौकरशाह आज उनके दरबार में हाजिरी बजा रहे हैं यह सभी नौकरशाह मायावती के दरबार में भी इतनी ही तमन्ना के साथ हाजिरी लगाते थे। अब अगर इन नौकरशाहों पर भी अखिलेश मेहरबान रहेंगे तो आम जनता में इस बात का गलत संदेश ही जायेगा। जरूरत है कि ईमानदार अफसरों को अच्छी जगह तैनात करके इन बेईमान अफसरों को उन्हें उनके हश्र तक पहुंचाना ही चाहिए। इससे मुख्यमंत्री की छवि भी अच्छी बनेगी।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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