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दुख-सुख

जब अटलजी की सभा में जाने से रोकने के लिए मेरा मुंडन कर दिया गया

सबसे पहले तो मै आभार प्रगट करना चाहूंगा वरिष्ठ पत्रकार साथी भाई दयानंद पाण्डेय जी का कि जिनकी आज अटलजी के जन्मदिन से जुडी दो पोस्ट्स फेसबुक पर पढने के बाद अचानक तीव्र इच्छा जागृत हुई कि इस शलाका पुरुष से जुडी यादों को साथियों में बांटा जाए. सबसे पहले एक अर्ज है कि मुझे भाजपाई न समझा जाय और न ही कोई हिंदुत्व का झंडाबरदार. हां संघ का स्वयंसेवक बचपन में रहा और उसी से सम्बंधित संस्मरण हैं अटलजी से जुड़े कि जब एक १५ साल के बालक को इस शिखर पुरुष का दो दिनों तक सानिध्य मिला था. साथ ही मै खुद को क्यों कांग्रेस विरोध की संतान मानता हूँ, इसका भी इस आलेख में आपको हल्का सा ही सही, जायजा मिल जाएगा.

सबसे पहले तो मै आभार प्रगट करना चाहूंगा वरिष्ठ पत्रकार साथी भाई दयानंद पाण्डेय जी का कि जिनकी आज अटलजी के जन्मदिन से जुडी दो पोस्ट्स फेसबुक पर पढने के बाद अचानक तीव्र इच्छा जागृत हुई कि इस शलाका पुरुष से जुडी यादों को साथियों में बांटा जाए. सबसे पहले एक अर्ज है कि मुझे भाजपाई न समझा जाय और न ही कोई हिंदुत्व का झंडाबरदार. हां संघ का स्वयंसेवक बचपन में रहा और उसी से सम्बंधित संस्मरण हैं अटलजी से जुड़े कि जब एक १५ साल के बालक को इस शिखर पुरुष का दो दिनों तक सानिध्य मिला था. साथ ही मै खुद को क्यों कांग्रेस विरोध की संतान मानता हूँ, इसका भी इस आलेख में आपको हल्का सा ही सही, जायजा मिल जाएगा.

बात लगभग आधी सदी पुरानी है. पांच भाई और एक बहन में हम चार भाइयों को घरेलू परिस्थितियों के चलते पढने के लिए ननिहाल (अयोध्या से सटा गोंडा जिले का एक अत्यंत पिछड़ा क़स्बा कर्नलगंज) भेजा गया. ननिहाल की पारिवारिक पृष्ठभूमि यह कि नानाजी कस्बे के जाने-माने व्यापारी, समाजसेवक, कर्मठ कांग्रेसी और पालिका के कई बार चेयरमैन रह चुके थे. तब दो वर्ष पहले उनका निधन हो चुका था. मामा दो थे, जिनकी राजनीतिक सोच एकदम जुदा थी. बड़े मामा धतकरम की उन सभी विधाओं में पारंगत थे जो आज घृणा के पत्र बन चुके राजनीतिक दल और नेताओं में हम पाते हैं.

छोटे मामा इस लिहाज से साधु और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वह कर्मनिष्ठ स्वयंसेवक जिन्हें महत्मा गाँधी की हत्या के बाद महीनो जेल में भी बिताना पड़ा था. इन्ही छोटे मामा अर्थात पंडित गिरधारी लाल पारीक की गद्दी पर हर माह रविवार को एक छोटी सी गोष्ठी हुआ करती थी. गोंडा से संघ के एक प्रचारक आते थे. बौद्धिक में अच्छी-अच्छी देशभक्ति की बाते सुनने को मिलती थीं और अंत में हलुआ और घुघनी से होता था बैठक का समापन. काशी में विश्वनाथ मंदिर के पीछे स्थित ज्ञानवापी में संघ की विश्वेश्वर शाखा लगा करती थी. हम भाई भी उसी के स्वयंसेवक थे. एक दिन बैठक में मैंने प्रचारक महोदय से आग्रह किया कि कर्नलगंज में बंद हो चुकी शाखा फिर से शरू की जाय. पहले दिन से हम दस (चार भाई हम, चार ममेरे भाई, बड़े मामा को दो बेटियां ही थी, दो पास के गाँव के जमींदारों के घर के बच्चे जो घर में ही रह कर पढ़ रहे थे) की संख्या जुटा लेंगे. और फिर से शुरू हो गयी संघ की शाखा.

देखते ही देखते कस्बे में दो सायं और दो प्रातः, यानी चार शाखाएँ लगने लगीं और इस नाचीज को अल्पायु में ही नगर कार्यवाह का दायित्व मिल गया था. पहला बौद्धिक यादवरावजी देशमुख (स्वर्गीय नानाजी देशमुख के अनुज) का. फिर आये भाऊ राव देवरस और अंत में माननीय गुरूजी (माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर) . विशेष रूप से गुरूजी के कार्यक्रम ने तो कस्बे को ही संघमय कर दिया था….जिधर देखो उधर भगवा ही भगवा…. इस असाधारण लोकप्रियता को भुनाने में भला जनसंघ कहां पीछे रहता. आनन्-फानन में कमेटी गठित हो गयी. एक घी के व्यापारी वैश्य महोदय को विधानसभा के लिए खड़ा भी कर दिया.इधर संघ की बढ़ती सक्रियता ने बड़े मामा नेताजी सांवल प्रसाद पारीक की पेशानी पर बल डाल दिए थे. कई बार अपनी प्रत्यक्ष-परोक्ष नाखुशी मुझसे भी वह ज़ाहिर कर चुके थे. उन दिनों एक अजीब बात यह देखने को मिलती थी कि कांग्रेसियों की जनसंघ से भले ही कड़ी प्रतिस्पर्धा रह्हे हो मगर शाखा को वे उस नज़र से नहीं देखते थे.

उस ज़माने के कांग्रेसी संघ को संस्कारों की पाठशाला मानते थे. यही कारण था कि बड़े मामा खुल के विरोध नहीं कर पा रहे थे. लेकिन आम चुनाव में जनसंघ की ओर से प्रत्याशी खड़ा कर देने से उनको अपना आसन डोलता नज़र आया. उधर जनसंघ ने घंटाघर में अटलजी की चुनावी सभा रख दी. उनको दो दिनों तक कर्नलगंज में ही रहना था. तैयारी बैठक के दौरान अटल जी की सभा में वन्देमातरम गान का दायित्व मुझे सौंपा गया. बनारस से सिंगल रीड का हारमोनियम हमारे साथ गया था. वन्देमातरम गीत का उस पर रियाज़ ही मेरे लिए बवाल-ए-जान बन गया. मामाजी के गुर्गों की ओर से धमकियां मिलनी शुरू हो गईं. मै इन सबसे अविचलित अपने रियाज़ में लगा रहा. अब आया अटलजी की सभा वाला दिन.

मै सोया हुआ था कि सुबह मामाजी के चार गुर्गे उठा कर ले गए और पेश कर दिया नेताजी के सामने. उन्होंने कुछ कहा नहीं, एक नाई बुला रखा था. इशारा मिलते ही गुर्गों ने मुझे कस कर पकड़ लिया और मै चीखता-चिल्लाता रहा, उस्तरे से नाई महोदय ने मेरा मुंडन कर दिया. अपनी मूछ पर ताव देते हुए, किसी विजेता के से अंदाज में उन्होंने मुझसे पूछा, ”अब जाओगे” ? ”नहीं’- मेरा उत्तर था. मै उनके कक्ष से बाहर चला आया. बाहर दोनों मामियां क्रोध के मारे काँप रही थीं मगर विवश भी थी. हमको ऊपर लेकर आईं दोनों. मेरे कपडे इस्त्री किये और कहा, ”लालाजी तुम सभा में जरूर जाओगे और वन्देमातरम भी गाओगे. घंटाघर में जैसे ही अटलजी की जीप पहुंचेगी, हम गोदाम का दरवाजा खोल देंगी और तुम भागते हुए निकल जाना, ३० सेकेण्ड में पहुंच जाओगे. वही हुआ भी. उधर नगर कार्यवाह की गैरमौजूदगी से आयोजक चिंतित. मगर अटलजी की आगमन के साथ ही मै भी सभा स्थल पहुँच चुका था. मैंने वन्देमातरम गान आंसुओं के साथ जब समाप्त किया तब मेरा चेहरा देख कर परशान हो उठे अटलजी पूछ बैठे, ” क्या हुआ बेटे जी आपको” ? मेरे सब्र का बाँध टूट गया उनके इस सवाल पर.

मैंने जवाब में कहा, ” मुझे नहीं इनसे पूछिए, ये जो आपके साथ जनसंघ के नगर अध्यक्ष बैठे हैं श्री गिरधारी लाल पारीक, मेरे छोटे मामा हैं, आप इन्ही से पूछिए कि क्या हुआ, और वो देखिये, अपने गुर्गों के साथ हाथ में सोटा लिए अपनी बड़ी बड़ी मूछें ट़े रहा आँखों में लाल डोरे वाला शख्स मेरा बड़ा मामा है और उसने मेरा उस्तरे से बाल इसलिए मुंडवा दिया कि मै आपकी सभा में वन्देमातरम का पाठ न कर सकूं”. इस घटना से सर्वथा अनजान छोटे मामा खुद ही चकित कि यह क्या हो गया.वह तो अल सुबह ही घर से निकल पड़े थे. यह सुन आर तमतमाए अटलजी ने छोटे मामाजी को वहीं जम कर खरी-खरी सुनाई. और उधर बड़े मामा अपनी मंडली के साथ पतली गली थाम बैठे . अटलजी ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा, ” आप मेरे साथ ही दो दिन रहेंगे”.ये दो दिन मेरी अनमोल धरोहर ही हैं. उनके साथ जीप पर गाँव-गाँव घूमना, दर्जनों नुक्कड़ सभाओं में भागीदारी और अटलजी को सुनने को आप और क्या कहेंगे भी.

सोचता हूँ कि जो हुआ, अच्छा ही हुआ. ऐसे सानिध्य के लिए एक क्या सौ बार भी सर मुंडाना कम होगा. इस बात को पूरे पचास बरस बीत गए. उस चुनाव में जनसंघ का प्रत्याशी १४५ वोट से कांग्रेस के हाथों हार गया. हारे तो थे दोनों जगहों बलरामपुर और लखनऊ से अटलजी भी. लेकिन तब कौन जानता था कि एक दिन वह जग जीत लेंगे अपनी वाणी और सत्कर्मों से. बलरामपुर में संघ के लगे शिविर में अटलजी ने आते ही मेरे बारे में पूछा, तब दसवीं की मै गोंडा में परीक्षा दे रहा था. बाद में १९८० में दूसरी बार सामना हुआ मेरा अटलजी से जब वह मध्यावधि चुनाव के दौरान काशी आये थे. बेनिया बाग़ में उनकी दोपहर में सभा थी और तत्कालीन जनता पार्टी के नगर अध्यक्ष विश्वनाथ वशिष्ठ (अब स्वर्गीय) ने मुझे अटलजी को हवाई अड्डे तक छोड़ने का दायित्व सौंपा था. उनके साथ दो घंटे तक रहा मगर न उनसे और न ही फिर साथ में शाम गुजारने वाले उनके निजी सचिव शिव कुमार शर्मा (अब पारीक लिखने लगे हैं) से ही उस वाकये की कोई चर्चा की.

अटलजी को भुवनेश्वर ले जाने वाला विमान मौसम ख़राब होने से बनारस वापस लौट आया और उसी शाम उनको डीलक्स ट्रेन से दिल्ली भेजा गया.बड़े मामा का काफी पहले देहावसान हो चुका है. पालिका चेयरमैन होने की हसरत उनकी कभी पूरी नहीं हुई. छोटे मामा, जिहोने कभी पद की लालसा नहीं की, एक कौन कहे दो बार पालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुए. ८८ की उम्र में भी पूर्णतः स्वस्थ हैं. उसी उम्र के अटलजी को आज देश-विदेश से बधाइयाँ मिल रही है. देश में उनके लिए पूजा-प्रार्थना, होम आदि हो रहे हैं. जिस वाणी ने उनको देश का सर्वकालिक महानतम राजनेता बनाया, वही थम चुकी है. हे ईश्वर एक बार उनकी वह ओजस्वी-सम्मोहक वाणी उन्हें फिर से लौटा दो जिसे सुनने के लिए मेरा मंदबुद्धि अनुज भी कभी दीवानों की तरह उनकी हर सभा में दौड़ते हुए पहुँच जाया करता था.

लेखक पदमपति शर्मा जाने-माने वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं.

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