दिल्ली में पैरा मेडिकल की छात्रा के साथ चलती बस में हुए गैंगरेप जैसे अमानवीय कृत्य के बाद आज हर कोई कह रहा है, बलात्कारियों को फांसी दो। सिने कलाकार अमिताभ बच्चन ने कहा है, आरोपियों को नपुंसक बना दो। मैं भी, आप भी, यह भी, वह भी, समाज का हर व्यक्ति, पुरुष, महिला, युवा, लड़के-लड़कियां, माता, पिता, भाई, बहन, बृद्ध, अधेड़ों के साथ अबोध बच्चे भी। पुलिस, प्रशासन, शिक्षक, मीडिया, फिल्मों के लोग भी, और अब तो स्वयं आरोपी भी कह चुके हैं कि उन्हें फांसी दे दो। और हास्यास्पद कि, संसद में बैठे सांसद भी कह रहे हैं, ऐसे बलात्कारियों को फांसी दी जानी चाहिए। हास्यास्पद है, क्या उन्हें नहीं मालूम कि देश में बलात्कारियों को फांसी की सजा का प्रावधान नहीं है। और ऐसा प्रावधान, कानून में संसोधन केवल वही कर सकते हैं। और ऐसा कहने वाले लोग भी केवल कहने से आगे कुछ कर सकते हैं, क्या नहीं….?
मुझे यहाँ नैनीताल में इस दरिन्दगी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रही छात्राओं द्वारा प्रदर्शित एक पोस्टर के मायने समझ में नहीं आ रहे हैं, जिसमें लिखा था, “OUR VOICES ARE HIGHER THAN OUR SKIRTS” आप अपनी आवाज ऊंची कर सकती हैं तो क्या आप अपनी स्कर्ट लम्बी नहीं कर सकतीं या ‘उन्हें’ चुनौती देना चाहती हैं, और “Dont tell us about Dresses, Know not to rape”, यानि, हम नहीं सुधरेंगे, तुम अपनी औकात में रहो..हमारे यहाँ तो अब तक ‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’ कहने का रिवाज था। दूसरी बात, कोई नहीं कह सकता कि दिल्ली की यह वारदात अपनी तरह की पहली या आखिरी वारदात है। यह भी कोई पूरे विश्वास से नहीं कह सकेगा कि बलात्कार पर फांसी या नपुंसक बनाने की सजा का प्राविधान हो जाए तो बलात्कार की घटनाओं पर रोक लग जाएगी। जैसे हत्या पर फांसी की सजा का प्राविधान है, लेकिन इस सजा से क्या हत्याओं पर रोक लग गई है?
ऐसे में अच्छा न हो कि हम सब केवल बातें करने से इतर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अपनी ओर से भी कुछ योगदान दें। ऐसी समस्या के मूल कारण तलाशें। हम माता, पिता, भाई-बहन या शिक्षक हैं तो अपने बच्चों को अच्छी नैतिक, चारित्रिक व संस्कारवान शिक्षा दें। मीडिया, फिल्मों, टीवी वाले या युवा लड़के, लड़कियां हैं तो अश्लीलता, उत्श्रृखलता से बचें, वस्त्रों, बात-व्यवहार में शालीनता बरतें। पुलिस, प्रशासन में हैं तो ऐसे आरोपियों को कड़ी सजा (मौजूदा कानूनों के कड़ाई से पालन से भी) दिलाएं। संसद में हैं तो ऐसे कड़े कानून बनाएं।
लेखक नवीन जोशी उत्तराखंड में पत्रकार हैं.


